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प्रतिशत का दबाव और कोमल उम्र: क्यों इतनी कठोर हैं प्रतियोगी परीक्षाएं?

Wed, 18 Feb 2026 07:13 AM IST
देवेश त्रिपाठी नन्दितेश निलय
नन्दितेश निलय Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Wed, 18 Feb 2026 07:13 AM IST
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सार
जहां एक ओर कई छात्र जेईई मेन में सौ पर्सेंटाइल हासिल करते हैं, वहीं कुछ 98 प्रतिशत को कम मान बैठते हैं। आखिर जेईई, नीट या यूपीएससी जैसी परीक्षाएं उन्हें क्यों नहीं समझा पातीं कि जीवन का उद्देश्य अंततः जीना है। अगर जीवन गणित है, तो छात्रों का 360 डिग्री जैसा व्यक्तित्व विकास होना भी उतना ही जरूरी है।
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why competitive exams so harsh percentage pressure student life NEET exam stress UPSC preparation challenges
प्रतियोगी परीक्षाएं - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मान लिया जाए, अगर जीवन का आकलन कभी गणित करे, तो यह हर छात्र से पूछेगा कि दसवीं या बारहवीं की परीक्षा में उसे कितने प्रतिशत अंक मिले थे! सिनेमा के परदे पर कोई नायक बारहवीं फेल हो जाए, तो कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि कला में फेल-पास या प्रतिशत जैसा कुछ नहीं होता। लेकिन गणित के छात्र को अक्सर गौरव, मेधावी या ताज माना जाता है और उसे अन्य संकायों के छात्रों से अधिक श्रेष्ठ समझा जाता है।


यह गणित ही तो है, जो हर माता-पिता को यह यकीन दिलाता है कि इस विषय की संगत में रहने वाले उनके बच्चे, ऐकिक नियम और कैलकुलस की गलियों में समय व दूरी की गणना कर अपने भविष्य को कुछ ज्यादा ही चमकदार और रोशन कर सकते हैं। भले ही वे स्वाभाविक रूप से प्रतिभाशाली हों, लेकिन यह समाज जब छात्र को ज्यामितीय कोणों से अपने भाग्य की दशा-दिशा नापते देखता है, तभी यह मानता है कि उसके जीवन के सफर और संगत की रेखा सही है। और सही है वह सब कुछ, जो वह छात्र अपनी आदतों में लाता है, क्योंकि गिनना, महसूस करने से ज्यादा उपयोगी है।


हो सकता है कि भविष्य के सफर में गणित के संग भौतिकी व रसायनशास्त्र भी यह कहते नजर आएंगे कि अंकों और सूत्रों से बंधा वह छात्र जब वयस्क हो जाएगा, तो शायद बीजगणित (अलजेब्रा) के साथ रहकर अपने और अपने रिश्तों के भावों का वर्गमूल निकालना सीख जाएगा। आखिर मानने में हर्ज ही क्या है? सब कुछ गणित ही तो है। उसके बाद ही हैं सारे विज्ञान, सारी कलाएं। अगर ये गणित के पहले आना भी चाहेंगे, तो भी गणित की उपेक्षा संभव नहीं, क्योंकि यह जीवन की जीवन से अपेक्षा है।  

यह और बात है कि कॉलेज से निकलते ही रिश्तेदारों के माफिक गणित और उसके संगी-साथी अपनी निष्ठुरता तथा श्रेष्ठता को लिए समाज के किनारे रसूखदार बन खड़े रहते हैं और जीवन के संबंधों की खुशी, जीवन के उद्देश्यों की समझ व इन्सानियत का प्रश्न अन्य विषयों के मत्थे मढ़ दिया जाता है। हां, गणित अपनी श्रेष्ठता लिए फिर आता है और बैलेंस शीट के हर खाने को भर जाता है।
जहां एक ओर कई छात्र जेईई मेन में सौ पर्सेंटाइल हासिल करते हैं, वहीं कुछ अपने अनठानबे प्रतिशत को कम मान बैठते हैं। चूंकि, छात्रों के पास अन्य सामाजिक विज्ञानों और कला के विषयों की उपयोगिता नहीं रहती, इसलिए प्रतिशत का फंदा उन्हें यकीन दिला बैठता है कि वे दो प्रतिशत से छूट गए और उस छोटी-सी उम्र में ही छूट गया वह सब कुछ, जिसे उनके जीवन से बड़ा होना चाहिए था। लेकिन छात्रों की निराशा, कश्मकश और आत्महत्याओं के बीच परीक्षा तथा नतीजे का प्रतिशत अपनी हुंकार लिए उन सभी को अनुपयोगी कर देता है, जो सौ प्रतिशत से दूर रह गए। प्रधानमंत्री भी इस प्रतिशत से दूर रहने की सलाह देते हैं, फिर भी परीक्षा की कठोरता कम नहीं होती। हमारी शिक्षा प्रणाली में जेईई मेंस की परीक्षा तो छात्रों से न जाने क्या चाहती है, यह समझ से परे है। पता नहीं, इतने दुरूह पेपर और सौ प्रतिशत के यक्ष प्रश्न से यह जीवन की कौन-सी गौरवपूर्ण गाथा लिखना चाहती है। और तो और, इसके बाद जो छात्र जेईई एडवांस के पड़ाव तक पहुंचते हैं, तो वे न जाने कितने हिस्सों में बंट चुके होते हैं। कहीं प्रतिशत, कहीं आरक्षण, कहीं आईआईटी के छूटने का दुख, तो कहीं वह गुम श्रेष्ठता-बोध, जो जेईई मेंस के हिस्से जाती है।

गणित और विज्ञान को संभालने के चक्कर में छात्र यह समझ नहीं पाता कि जीवन के कुरुक्षेत्र में जब उसके रिश्तेदार उसे घेरकर पूछेंगे कि मेंस और एडवांस में उसकी रैंकिंग क्या आई है, तो कहां से वह सामाजिक विज्ञान, साहित्य व दर्शन का तर्क लेकर आएगा कि उन प्रश्नों का जवाब दे सके। उसके लिए तो अब प्रश्नों को इतना कठिन बनाया जाता है, मानो आईआईटी की दीवारें पहले से ही उन्हें तीखी तपिश देना चाहती हैं, जिससे वह अपने जीवन में और सख्त व बेसुरे हो सकें। अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों इन परीक्षाओं को इतना हौआ बना दिया गया है कि बच्चे किसी कोचिंग संस्थान में प्रतिशत और पर्सेंटाइल को पाने के लिए भागते रहते हैं। सूखे चेहरे, उलझे मन और सपनों की कैद में फंसे उन छात्रों को चेतावनी दी जाती है कि अगर उनकी कोचिंग की एक भी क्लास छूटती है, तो छूट जाता है जीवन, वे सपने, जो वे देखते हैं और वह मशीनी प्रतिबद्धता। क्लास से जेट की स्पीड से भागते बच्चों को स्पाइडरमैन की तरह कोचिंग की दीवारों से चिपके रहने की सलाह दी जाती है।

जनवरी से लेकर अप्रैल-मई तक उस दरिया, उस नदी, उस सागर को पार करने के लिए किनारे लाखों की भीड़ खड़ी है, जिसकी पहचान कोई न कोई कोचिंग संस्थान है। उस किनारे खड़े रहते हैं मां-बाप भी, जिन्हें यह समाज पहले ही उस तृष्णा से लबालब कर चुका होता है कि जेईई के रास्ते सिर्फ प्रतिभाशाली ही जाते हैं और जो गणित के वियोग को झेल लेते हैं, वे नीट की मंजिल पर पहुंचने के लिए गणित को सम्मान देते हुए समानांतर चलते रहते हैं। जिनके पास आरक्षण है, वह भी इसी भीड़ में हैं और जिनके पास कुछ नहीं है, वे भी सब कुछ पाने निकल पड़ते हैं। ऐसे में, दो प्रतिशत कम नंबर फेल होने के माफिक होता है। इसलिए, उस छात्र ने अपने जीवन को इतना कम नंबर दिया होगा।

स्कूलों में ही इतना पढ़ाया जाता है कि बच्चों की बुनियाद सही हो जाती है। आखिर प्रतिशत के रास्ते पर चलकर कोई छात्र कैसे समझेगा कि जीवन और उसकी उपलब्धि सिर्फ अंकों में नहीं है। जीवन महसूस करने का दर्शन है। वह जोड़ने की कला है, जो गणित को संबंधों की सामाजिक दुनिया में ले जाती है। प्रतिशत तभी सौ बनता है, जब अन्य सामाजिक विषय यह समझाते हैं कि हर दिन सुख व शांति से जीना एक-दूसरे तक पहुंचना होता है और वह प्रतिशत से नहीं पाया जा सकता।

यह जेईई, नीट या यूपीएससी नहीं समझा पाता कि संघर्ष जरूरी है, पर जीवन का उद्देश्य अंततः जीना है। जीवन का दर्शन अहिंसा है, कोई गलाघोंटू परीक्षा नहीं। इन परीक्षाओं को समझना होगा कि सोलह-सत्रह की उम्र में कोमल बच्चों की कोमलता की परीक्षा इतनी कठोरता से नहीं ली जाती। उन्हें इस कदर मुरझाया नहीं जाता। वे भविष्य हैं, उन्हें संभाला जाए। अगर जीवन गणित है, तो तीन सौ साठ डिग्री जैसा व्यक्तित्व विकास हो। उन्हें यह समझ में आ जाए कि रिश्तों और जरूरतों की भागदौड़ में जीवन वह दर्शन बन जाता है, जो तमाम कठिनाइयों के बीच उस एक-दो प्रतिशत को संभाल कर रखने की सीख देता है। और फिर गणित का वह ‘मान लिया जाए’ उस संघर्ष, उस ज्ञान, उस जीवन-दर्शन को सिद्ध भी करता है।  
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