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चीन भारत के खिलाफ क्यों है
चिंतामणि महापात्र
Updated Thu, 23 Jun 2016 07:18 PM IST
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चिंतामणि महापात्र
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अमेरिका लंबे समय से परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता का समर्थन करता रहा है, खासकर तबसे, जब राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी पहली भारत यात्रा के दौरान भारतीय संसद में इसकी घोषणा की थी। और चीन तभी से इसको लेकर असहजता दिखा रहा है। चीन के इस रवैये का मतलब क्या है?
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पहली बात तो यह है कि परमाणु क्षमता वाला एकमात्र एशियाई देश होने का रुतबा चीन ने वर्ष 1998 में खो दिया, जब भारत ने सिलसिलेवार परमाणु परीक्षण कर खुद को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित किया। तीस वर्षों से ज्यादा समय तक चीन यह रुतबा हासिल किए हुए था। पर पहले भारत, और बाद में पाकिस्तान ने परमाणु क्षमता हासिल कर तस्वीर बदल दी।
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दूसरी बात, चीन को उम्मीद थी कि अमेरिका और परमाणु अप्रसार के हिमायती अन्य देश मौजूदा परमाणु अप्रसार व्यवस्था के उल्लंघन के लिए भारत को अलग-थलग कर देंगे। पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अमेरिका और अन्य देशों को भारत यह समझाने में सफल रहा कि अपने पड़ोस में परमाणु खतरे को देखते हुए भारत को परमाणु परीक्षण करना पड़ा। गौरतलब है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार विकास कार्यक्रम को खुद चीन प्रत्यक्ष मदद करता था। अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर भारत की उल्लेखनीय कूटनीतिक उपलब्धि रहा। शीघ्र ही भारत के परमाणु हथियार विकास कार्यक्रम को परोक्ष रूप से अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए एक वैध कदम के रूप में मान्यता दे दी गई। इसके अलावा, भारत अन्य देशों के साथ परमाणु व्यापार करने में सक्षम हो गया। भारत के परमाणु हथियारों पर निश्चिंतता और इसके असैन्य परमाणु कार्यक्रम के संभावित विस्तार की मौन स्वीकृति को चीन ने अपने लिए उभरती चुनौती के रूप में माना।
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तीसरी बात, चीन इस तथ्य को पचा नहीं पा रहा कि भारत एक वैश्विक खिलाड़ी के रूप में उभर चुका है, जबकि उसका सहयोगी पाकिस्तान पिछलग्गू बनकर ही रह गया। उसकी अर्थव्यवस्था खराब है, आंतरिक सुरक्षा को आतंकी संगठनों से चुनौती मिल रही है और अपने परमाणु हथियार भंडार को लगातार बढ़ाने की उसकी कोशिश वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है।
चौथी बात, छोटे पैमाने पर ही सही, चीन की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से आगे बढ़ रही है। ऐसे में, प्रमुख एशियाई शक्ति बनने की बीजिंग की महत्वाकांक्षा को आगे झटका लग सकता है। वैश्विक मंदी ने पहले ही चीन के आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचाया है, पर चीन ने जैसे ही अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए खपत आधारित अर्थव्यवस्था में अपने निवेश और निर्यात के नेतृत्व वाली रणनीति में संशोधन की शुरुआत की, विश्व अर्थव्यवस्था पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा। जो देश चीन को अपना सामान बेचते थे, उन पर चीन की मांग घटने का प्रभाव पड़ा। यूरोपीय संघ और आर्थिक संकट से जूझते अन्य देश चीनी वस्तुएं खरीदने में विफल रहे।
इस पृष्ठभूमि में भारतीय अर्थव्यवस्था ने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया। बढ़ते श्रम खर्च के कारण कंपनियों को चीन में निवेश करना मुनासिब न लगा और वे अगले बेहतर निवेश गंतव्य के रूप में भारत की तरफ देखने लगीं। जाहिर है, चीन वैश्विक मामलों में अधिक प्रभुत्व हासिल करने के भारत के अभियान को रोकने की कोशिश करेगा।
पांचवीं बात, भारत और अमेरिका के बीच बेहतर संबंधों से भी चीन का संकट बढ़ गया। यह चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की पृष्ठभूमि में हुआ, चाहे वह पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर के पानी का मसला हो या चीन की आर्थिक नीति और साइबर सुरक्षा कार्यक्रम को लेकर वाशिंगटन की बढ़ती चिंता। ऐसे में, आश्चर्य नहीं कि अमेरिका भारत के विशिष्ट असैन्य परमाणु क्लब में प्रवेश का आगे बढ़कर समर्थन कर रहा है और चीन एनएसजी में भारत की सदस्यता के खिलाफ खलनायक की भूमिका में है।
छठी बात, चीन यह भी मानता है कि एशियाई मंच पर उसके प्रभुत्व को चुनौती देने वाला भारत ही है। भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के चीनी प्रस्ताव की आलोचना की है। भारत-प्रशांत क्षेत्र में एक नए सुरक्षा तंत्र बनाने के लिए अमेरिका के साथ भारत के गठजोड़ से भी चीन चिंतित है। भारत को चीन द्वारा 21वीं सदी के समुद्री सिल्क रोड के आह्वान की भी आशंका है। चीन भारत-जापान-अमेरिका के मालाबार शृंखला के नौसैनिक अभ्यास को लेकर चिंतित है, तो के चारों तरफ चीन द्वारा बंदरगाह बनाए जाने से भारत परेशान है।
ऐसे में, समाधान क्या है? भारत वास्तव में व्यवस्थित ढंग से चीन के साथ अपने संबंधों में सुधार करना चाहता है। भारत न तो चीन को नियंत्रित करना चाहता है, न ही चीन के प्रतिद्वंद्वी के रूप में खुद को खड़ा करना चाहता है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने चीनी नेतृत्व को समझाने के लिए बीजिंग की यात्रा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी समय-समय पर चीनी राष्ट्रपति से बात करते रहे हैं। विदेश सचिव भी चीन के संपर्क में हैं। भारत ने बार-बार यह संकेत दिया है कि नई शक्ति के रूप में उभरने के लिए भारत और चीन, दोनों के पास पर्याप्त गुंजाइश है और वे वैश्विक मामलों में रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं। भारत की इन कोशिशों का कोई फायदा नहीं हुआ, फिर भी उम्मीद कायम है। चीन संभवतः एनएसजी में भारत और पाकिस्तान, दोनों के प्रवेश का समर्थन कर सकता है।
एनएसजी के बहुत से देश जहां भारत की सदस्यता का समर्थन करते हैं, वहीं बहुत से देश पाकिस्तान की सदस्यता का विरोध भी करते हैं। जनसंहारक हथियारों के प्रसार में पाकिस्तान का रिकॉर्ड जग जाहिर है, और परमाणु अप्रसार में भारत का रिकॉर्ड भी सबको मालूम है। यह देखने वाली बात होगी कि क्या चीन और पाकिस्तान (संदिग्ध अप्रसार साख वाले देश) भारत को एनएसजी की सदस्यता से रोकते हैं या पाकिस्तान को भी इस क्लब में प्रवेश मिलता है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एवं रेक्टर (प्रो-वायस चांसलर), जेएनयू