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दलाई लामा से क्यों डरता है चीन

Thu, 30 Mar 2017 06:52 PM IST
मनोज जोशी
मनोज जोशी Updated Thu, 30 Mar 2017 06:52 PM IST
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Why china afraid from Dalai Lama
मनोज जोशी

दलाई लामा की आगामी तवांग यात्रा ने पहले से ही तूफान खड़ा कर दिया है।  चीन ने चेतावनी दी है कि भारत-चीन संबंधों पर इसका गहरा असर पड़ेगा। इस बीच उल्फा ने दलाई लामा को चेतावनी दी है कि वह पूर्वोत्तर की यात्रा न करें या चीन के खिलाफ कुछ न बोलें। इसमें हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि उल्फा प्रमुख परेश बरुआ अभी चीन में ही रह रहा है।

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जब केंद्रीय तिब्बत प्रशासन के प्रधानमंत्री लोबसांग सांगेय को 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया गया, तब अनेक लोगों ने सोचा था कि नई दिल्ली फिर तिब्बत कार्ड चलने की योजना बना रही है। दो साल बाद उस प्रारंभिक संकेत ने किसी नई नीति का रूप नहीं लिया है। दलाई लामा के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोई नाटकीय बैठक भी नहीं हुई है, जो बौद्ध धर्म के गढ़ के रूप में भारत की भूमिका को प्रोत्साहन देने की बात करते हैं और जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर तिब्बत के इस धार्मिक नेता से मुलाकात की थी।
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दलाई लामा और अमित शाह के बीच होने वाली एक बैठक मई, 2016 में अंतिम क्षण में रद्द कर दी गई, क्योंकि आशंका थी कि मोदी के चीन दौरे की पूर्व संध्या पर चीन इससे परेशान होगा। अप्रैल-मई, 2016 में एक और अजीब प्रकरण सामने आया, जब भारत सरकार ने अंतिम क्षण में दलाई लामा और केंद्रीय तिब्बत प्रशासन के मुख्यालय धर्मशाला में होने वाले चीन-विरोधी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में भाग लेने वाले कुछ लोगों को अनुमति देने से मना कर दिया, जिसमें उइघुर नेता डोलकुन इसा भी शामिल थे। कुछ भागीदारों को आने की अनुमति दी गई और वहां बैठक आयोजित भी हुई, पर सरकार ने दावा किया कि वहां कोई सम्मेलन नहीं हुआ।
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अक्तूबर, 2016 में भारत सरकार ने 2017 की शुरुआत में दलाई लामा को एक धार्मिक उत्सव में भागीदारी के लिए तवांग यात्रा की मंजूरी दी। दलाई लामा को यह अनुमति तब दी गई, जब अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा अरुणाचल प्रदेश और बौद्ध मठ के शहर की यात्रा कर रहे थे। वह किसी अमेरिकी राजदूत की वहां की पहली यात्रा थी। इन दोनों घटनाओं का बीजिंग ने विरोध किया।

बीते दिसंबर में कैलाश सत्यार्थी फाउंडेशन द्वारा आयोजित सम्मेलन में दलाई लामा ने राष्ट्रपति भवन में अलग से प्रणब मुखर्जी से साथ मुलाकात की थी। हालांकि वह सम्मेलन गैर-राजनीतिक था, पर दशकों बाद दलाई लामा और किसी सेवारत भारतीय राष्ट्रपति की वह पहली मुलाकात थी। उसके करीब एक हफ्ते बाद चीन ने अपना असंतोष व्यक्त किया, पर भारत ने जोर देकर कहा कि वह एक गैर-राजनीतिक मुलाकात थी।

यदि मोदी सरकार तिब्बत कार्ड खेल भी रही है, तो वह दृढ़तापूर्वक प्रकट नहीं हो रहा। आखिरकार वह मनमोहन सिंह की ही सरकार थी, जिसने ल्हासा से तिब्बत निर्वासन के ठीक पचास वर्ष बाद; जब दलाई लामा बौद्ध मठ के इस शहर से होकर गुजरे थे, 2009 में पहली बार दलाई लामा को तवांग जाने की अनुमति दी।

तिब्बत भारत का पड़ोसी है और भारत के साथ उसका ऐतिहासिक संपर्क है। 1959 में चीन के दखल के बाद तवांग के रास्ते ही दलाई लामा ने तिब्बत से पलायन किया था। भारत का कहना है कि उसने एक ऐसे आध्यात्मिक नेता को शरण दी है, जो भारत में काफी सम्मानित हैं और तिब्बतियों को भारत में राजनीतिक गतिविधि  चलाने की अनुमति नहीं है। चीन मानता है कि दलाई लामा राजनीतिक निर्वासित व्यक्ति हैं, जो धर्म के नाम पर चीन को विभाजित करने की गतिविधियों में शामिल थे। यह दलाई लामा के बार-बार उद्धृत वक्तव्य के खिलाफ है कि वह चीन की संप्रभुता के भीतर अपने देश के लिए स्वायत्तता चाहते हैं।

लेकिन तवांग पांचवें दलाई लामा (1617-1682) का जन्मस्थल है और चीन को भय है कि जब यह दलाई लामा (जो 81 वर्ष के हैं) गुजर जाएंगे, तो वह फिर तवांग में अवतार ले सकते हैं। इसलिए चीन जोर देकर कहता है कि भारत किसी भी सीमा समझौते के तहत तवांग उसे सौंप दे। एक शीर्ष चीनी वार्ताकार ने हाल ही में कहा कि भारत द्वारा इसे स्वीकार करने से इन्कार करने के चलते ही सीमा समझौता नहीं हो रहा है। भारत का अरुणाचल प्रदेश पर दावा उस त्रिपक्षीय समझौते पर टिका है, जो 1914 में ब्रिटिश, तिब्बत और चीन के बीच हुआ था। जहां तिब्बत ने मैकमोहन रेखा पर सहमति जताई, जिसे भारत सीमा बताता है, वहीं चीन ने उस दस्तावेज को स्वीकार तो किया, पर उस पर हस्ताक्षर नहीं किया।

तो तिब्बत पर अपनी नई नीति से मोदी सरकार को क्या हासिल होने की उम्मीद है? वैसे भी, इसकी मौजूदा चीन नीति गड़बड़ है-सीमा वार्ता के संबंध में कुछ नहीं हो रहा है और ऐसा लगता है कि नई दिल्ली का एकमात्र लक्ष्य परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता को लेकर चीन को राजी करने का प्रयास या मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की आतंकी सूची में शामिल करवाना है। चीन संबंधी इस नीति का खतरा यह है कि इसमें भारत की अपनी कमजोरियां हैं। यदि भारत तिब्बत में दखल देता है, तो इससे चीन को परेशानी होने लगेगी, उसके पास कश्मीर में अपने हाथ-पांव मारने का विकल्प भी है और वह खुलेआम पाकिस्तान के समर्थन में आ जाएगा। और सबसे बुरी बात यह है कि एक निर्वासित सरकार को मान्यता देने से भारत को खुद उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।


तिब्बत पर चीन का नियंत्रण दृढ़ता से बना हुआ है। इसमें बदलाव की एकमात्र उम्मीद चीन के घटनाक्रम से हो सकती है, जहां कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली सैन्य तानाशाही वैधता की चुनौतियों का सामना कर रही है। खुफिया एजेंटों और सेना से कहीं ज्यादा चीन विचार से डरता है। बहुत संभव है कि उसकी मौजूदा सत्ता व्यवस्था ध्वस्त हो जाए, जैसे सोवियत संघ में हुआ। यही वजह है कि बीजिंग दलाई लामा से डरता है, जिसके साथ भले सेना नहीं है, पर तिब्बत और भारत के लोग उनका सम्मान करते हैं।

-लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं।

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