भंडाफोड़ करने को किताब ही क्यों
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अगर किसी नेता का भंडाफोड़ ही करना है, तो किताब क्यों लिखी जाए? नई तकनीक आ गई है, नए साधनों का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन नेताओं का भंडाफोड़ ही ऐसा विषय रह गया है, जिसमें पुराने तौर-तरीकों का प्रयोग हो रहा है। अरे भाई, किताबें तो जमाने से लिखी जा रही हैं। किताबों को पढ़ता कौन है? पांच सौ रुपये खर्च कर एक किताब खरीदो और उसे पढ़ने में पांच दिन लगाओ। लोगों के पास अखबार पढ़ने तक की तो फुरसत है नहीं और आप किताबें लिख रहे हैं। सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है, प्रचार के नए-नए तरीके आ गए हैं, छवि बनाने-बिगाड़ने के लिए बड़ी-बड़ी पीआर एजेंसियां दुकान खोले बैठी हैं और आप किताबें लिखने में लगे हैं।
जनाब, जमाना डेढ़ सौ कैरेक्टर में अपनी बात कहने का है, किताब लिखने का नहीं। और अगर आपको किसी नेता की असलियत ही बतानी है, तो किताब लिखकर ही क्यों? सीडी बनाकर कीजिए न। वह सचमुच धमाकेदार होगा। सारे चैनल दिखाएंगे। कम से कम दो दिन तो हंगामा रहेगा ही। जी हां, मान लिया कि आप उस नेता के बहुत करीब रहे हैं, आप उसकी हर कमजोरी से वाकिफ हैं। तो सीडी बनानेवाले ही कौन से पराए होते हैं। वे भी अपने ही होते हैं। और सीडी नहीं बना सकते, तो रिकॉर्डिंग तो कर सकते हैं। स्टिंग तो कर सकते हैं। स्टिंग कर किसी भी चैनल को दे दीजिए। वैसे तो नेताओं के भंडाफोड़ का यह कामयाब तरीका तहलका ने खोज निकाला था। पर अब इसके नए चैंपियन केजरीवाल जी हैं, जो कहते हैं कि स्टिंग करो और भंडाफोड़ करो।
अगर आपको इस पर भी भरोसा नहीं है, तो फेसबुक पर बहस चलाइए। किसी नेता को नाकारा साबित करना है, तो फेसबुक है, ट्वीटर है। उनका इस्तेमाल कीजिए। इसके लिए किताब लिखने की क्या जरूरत है? और वैसे भी सरकार के घोटालों का पर्दाफाश करने के लिए खोजी पत्रकारिता तो है ही। पर समस्या यह है कि आप तो खुद नेता रहे हैं, नौकरशाह रहे हैं, आपको अपनी लेखन कला भी दिखानी है। सो किताब लिखना जरूरी है।