फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Why are the issues wandering in election

देश और राजनीतिक पार्टियों को देख कह सकते हैं कि मुद्दों से भटक रहे हैं चुनाव

Mon, 29 Apr 2019 05:37 AM IST
Raman Singh डी एस असवाल
डी एस असवाल Published by: Raman Singh Updated Mon, 29 Apr 2019 05:37 AM IST
विज्ञापन
Why are the issues wandering in election
मतदाता (फाइल फोटो)

विभिन्न दलों के प्रत्याशी सत्रहवीं लोकभा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव कराना एक कठिन काम है। यह हमारी विशाल चुनावी मशीनरी, जिसमें बदनाम कर दी गई नौकरशाही भी शामिल है, और लोगों में इस बात की बढ़ती प्रतीति के कारण संभव है, कि बूथ पर कब्जा और फर्जी मतदान कारगर नहीं हो सकता।


loader

स्वतंत्र, निष्पक्ष और समय पर चुनाव होने के कारण, जो किसी भी लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है, हम अपने लोकतंत्र पर गर्व कर सकते हैं। चुनाव किसी भी लोकतंत्र का जीवन रक्त है, क्योंकि स्वतंत्र और गुप्त मतदान के जरिये मतदाता अप्रिय नेताओं को खारिज करते हैं, अपनी ताकत बहाल करते हैं और लोकतंत्र में हमारे विश्वास को पुनः मजबूत करते हैं। इसके बावजूद देश और राजनीतिक पार्टियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारी पूरी चुनावी प्रक्रिया बदतर और बेहद खर्चीली हो गई है।
      
हमारे जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों और पीड़ित जनता के कल्याण, बेरोजगारों, कमजोरों, संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र, लगातार सूखा प्रभावित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय हमारी राजनीतिक पार्टियां खजाना लुटा रही हैं और मीडिया का ध्यान गैर-मुद्दों की तरफ खींच रही हैं।

हर मतदाता को लुभाने के लिए चुनावी घोषणापत्र बड़ी सावधानी के साथ तैयार किए जाते हैं, लेकिन फिर उन पर चर्चा या बहस नहीं होती। पारंपरिक राजनीतिक विमर्शों और सिद्धांतों को बड़ी होशियारी से राष्ट्रवाद के नाम पर सीमित कर दिया गया है और संकीर्ण सांप्रदायिक पहचान संविधान में निहित हमारी लोकतांत्रिक बहुलता की नींव को कमजोर कर रही है।

सोलहवीं लोकसभा के महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे कई मामलों में अधिक स्पष्ट हो गए हैं तथा विशाल आयामों तक पहुंच गए हैं, खासकर बेरोजगारी और कृषि तथा लघु, मध्यम व सूक्ष्म उद्यमों को, जिन्हें हमारी अर्थव्यवस्था का पहिया माना जाता है, संकट ने घेर लिया है। लेकिन ये अतीत की बातें हैं और यकीनन हमारी सार्वजनिक स्मृति कम हो रही है। ऐसा लगने लगा है कि वे ज्यादा शक्तिशाली राष्ट्रीय चिंताओं के कर्कश शोर में गुम हो गई हैं।

 राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र की एकता और अखंडता पर कथित सर्वोपरि खतरे तथा राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रद्रोही की बहस में (जहां विचारों की असहमति को राष्ट्र विरोधी कहा जाता है) रोजगार की मांग करने वालों को हमने यह सिखाया है कि राष्ट्र सबसे पहले आता है।

रोजगार सृजन, समावेशी विकास, लैंगिक न्याय, धार्मिक और सामाजिक सद्भाव, स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे पारंपरिक चुनावी वादों को मिथकीय राष्ट्रवाद और मैं, राष्ट्र का रक्षक बनाम अन्य की बहस में दबा दिया गया है। प्रसिद्ध कवि टी एस इलियट ने कहा है, 'पिछले साल के शब्द पिछले साल की भाषा के हैं। और अगले साल के शब्द दूसरी भाषा की प्रतीक्षा करते हैं।'

इसके अलावा चुनाव अभियानों का संचालन असली मुद्दों के जरिये नहीं, बल्कि आम जनता की भारी भीड़ और रोड शो के जरिये किया जाता है। रोड शो शब्द हालांकि अंग्रेजी शब्दकोश में बहुत नया और शानदार नहीं है, फिर भी चुनावी प्रभुत्व की घातक रणनीति का यह एक गुप्त मंत्र बन गया है।

हाल के वर्षो में यह माना जाने लगा है कि जिसका रोड शो जितना बड़ा होगा, उसकी जीत की संभावना और चुनावी जीत का अंतर उतना ही बड़ा होगा। रोड शो को चुनावी प्रभुत्व के रूप में सिद्ध किया जाने लगा है और भीड़ जुटाने को नेता की करिश्माई सामूहिक अपील के रूप में पेश किया जाता है, जिससे यह संदेश दिया जाता है कि राजनीतिक विरोधी चुनावी मुकाबले में कहीं नही है।

रोड शो हालांकि प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन भारी रोड शो अति समृद्ध लोगों की शादियों की तरह नागरिक जीवन को पंगु बना देते हैं। इसलिए लोकतंत्र की सेहत और दृढ़ता के लिए बहस और कुछ नहीं, बल्कि लोकतंत्र के त्योहार के नाम पर सत्ता का घोर दुरुपयोग और दिखावा है।

ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जापान या कनाडा जैसे विश्व के कुछ अग्रणी और परिपक्व लोकतंत्र में, जो भारतीय लोकतंत्र से पुराने हैं, चुनाव कोई कम उत्सुकता से नहीं लड़े जाते, लेकिन वहां लोकतंत्र के पहिये को पंगु बनाने वाले रोड शो नहीं होते। इसके बजाय उन देशों में स्वतंत्र मीडिया के जरिये खुलकर मुद्दों पर चर्चा और बहस होती है, न कि गैर पत्रकारों द्वारा पहले से तैयार इंटरव्यू के जरिये।

लोगों को ध्रुवीकृत करने के लिए सांविधानिक गारंटी या आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन को लोगों और ज्यादा से ज्यादा प्रतिस्पर्धी राजनीतिक दलों द्वारा सख्ती से देखा जाना चाहिए, ताकि मतदाताओं को अटपटे ढंग से जुनूनी बनाए बिना पूरी चुनावी प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराई जा सके। हमारे धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र के ताने-बाने की रक्षा और मजबूती के लिए तथा भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा तथा चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को बचाने के लिए और कोई उपाय नहीं है।

किसी भी पीढ़ी के नेताओं को यह सोचने की छूट कतई नहीं दी जा सकती कि वह अकेले हमारे लोकतंत्र के उद्धारकर्ता हैं। हमारा लोकतंत्र 'बनाना रिपब्लिक' (राजनीतिक रूप से अस्थिर देश, जो किसी एक उत्पाद के निर्यात पर निर्भर होता है) नहीं है, क्योंकि आम आदमी समझदार है, रोड शो से अलग सोचता है और समस्याओं के निवारण और समावेशी विकास व समृद्धि को बढ़ाने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है।

-लेखक संविधान व तुलनात्मक राजनीति के विशेषज्ञ हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed