बहस से क्यों डरते हैं

सुभाषिनी सहगल अली Updated Sun, 14 Jan 2018 11:06 AM IST
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पिछले साल के आखरी दिनों में सबसे अधिक हल्ला भूख से मौत, भीमा-कोरेगांव के पास दलितों पर हुए हमले या फिर उत्तर प्रदेश के आलू किसानों की दुर्दशा पर नहीं, बल्कि लोकसभा द्वारा पारित एक समय में बोले जाने वाले तीन तलाक के खिलाफ विधेयक पर ही हुआ। इस विधेयक के जल्दबाजी में पारित किए जाने वाले राजनीतिक कारणों पर टिप्पणी न करते हुए इस विधेयक के बारे में कुछ बात करना आवश्यक है।
जब भी कानून में परिवर्तन करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है, तो उस पर चर्चा करवाना आवश्यक समझा जाता रहा है। 1977-78 में जब बलात्कार और दहेज संबंधी कानूनों में बड़े परिवर्तन किए गए थे, तब इन परिवर्तनों की मांग उठाने वाली सुशीला गोपालन, अहिल्या रान्गानेकर जैसों की अगुवाई में सांसदों ने पूरे देश का भ्रमण कर महिला कार्यकर्ताओं, वकीलों, समाज-सेवकों की राय लेने का काम किया था।

याद रखने की जरूरत है कि ‘इज्जत के नाम पर’ होने वाले अपराधों के खिलाफ आज तक कानून नहीं बन पाया है, जबकि इस पर बहस हो चुकी है और इसके मसौदे पर महिला और बाल कल्याण मंत्रालय की मोहर भी लग चुकी है।

तीन तलाक की प्रथा एकतरफा है और इसमें समझौते के लिए गुंजाइश नहीं होती। हालांकि 1950 के बाद से लगातार उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों ने इस तरह के तलाक को गलत ठहराया है। पर इस तरह के अधिकतर मामले न्यायालय तक नहीं पहुंचते और उलेमा का एक हिस्सा और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी इसके खिलाफ नहीं बोलते। हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम महिलाओं की विनती स्वीकार कर इस प्रथा को गैरकानूनी ठहराया है। इस फैसले को अमली जामा पहनाने के लिए सरकार ने आनन-फानन में विधेयक तैयार कर लोकसभा में पारित कर दिया।

जल्दबाजी में पेश किए जाने वाले इस विधेयक का असर भी वही होगा, जो जल्दबाजी में तीन बार तलाक कहने पर शादी को तोड़ देने का है। विधेयक एक दीवानी मामले को फौजदारी के मामले में परिवर्तित कर इकठ्ठा तीन बार तलाक कहने वाले पति को अपराधी ठहराकर उसे जेल भेजने का पूरा इंतजाम करता है।

अपराध को गैर संज्ञेय और गैर जमानती बनाकर इस बात की छूट दे दी गई है कि कोई भी किसी मुस्लिम पुरुष के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सकता है कि उसने उसे तीन बार तलाक कहते हुए सुना है। पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है और चाहे आरोपी ने कहा हो या न कहा हो, उसे जेल भेजे जाने की पूरी आशंका है। फिर शादी को बचाने का काम कैसे किया जाएगा? पत्नी और बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित करने की बात कैसे की जाएगी? 

इन्हीं खामियों को दूर करना जरूरी है और इसके लिए विधेयक पर चर्चा की जरूरत है। हमारा संगठन, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति, तीन तलाक के खिलाफ है। पर ऐसा कानून अगर मुस्लिम महिलाओं की चिंता कम कम करने के बजाय बढ़ाएगा, तो हम उसका विरोध करेंगे।

सरकार से हमारा सवाल है-आप बहस से क्यों डरते हैं? दरअसल भाजपा के मंत्री और नेता इस बहस को इस तरह प्रस्तुत कर रहे हैं, जैसे वे मुस्लिम महिलाओं के सबसे ईमानदार पक्षधर हैं और विधेयक की आलोचना करने वाले उनके शत्रु। तीन तलाक की प्रथा समाप्त होनी चाहिए, पर उसे खत्म करने के नाम पर प्रभावित महिलाओं के लिए नई समस्याएं पैदा नहीं की जानी चाहिए।

-माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य

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पेशावर की साझा विरासत

पहली बार एक पाकिस्तानी टीवी चैनल ने किसी सिख महिला को बतौर रिपोर्टर नियुक्त किया है, तो पख्तूनख्वा में सिखों ने मुस्लिमों के लिए इफ्तार का आयोजन कर धार्मिक सद्भाव की मिसाल कायम की।

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