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पेनरोज को मिले नोबेल से क्यों खुश हैं भारतीय? 

Sun, 11 Oct 2020 04:58 AM IST
गौतम चटर्जी गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी Published by: गौतम चटर्जी Updated Sun, 11 Oct 2020 04:58 AM IST
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Why are Indians happy with the Nobel prize given to Penrose?
रोजर पेनरोज, रेनहर्ड गेंजेल और एंड्रिया घेज - फोटो : twitter.com/NobelPrize

इस साल भौतिकी का नोबेल जिन तीन लोगों को संयुक्त रूप से मिला है, उनमें से रोजर पेनरोज गणितीय भौतिक विज्ञान यानी मैथेमेटिकल फिजिक्स के प्रोफेसर रहे हैं। उन्हें पिछले दो दशकों से हॉकिंग-पेनरोज सिंगुलरिटी थियोरम के लिए जाना जाता है, जिसके अनुसार वह ब्लैकहोल की प्रतिष्ठा आइंस्टीन के ‘सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत’ के आधार पर करते हैं। पेनरोज वर्ष 2011 में एक व्याख्यान देने जब कोलकाता आए थे, तब उनसे एक मुलाकात हुई थी। कोलकाता के कुछ वैज्ञानिक साथियों के साथ पेनरोज से करीब दो घंटे की उस बातचीत में जो बातें मुझे स्पष्ट हुई थीं, उन्हें अद्यतन सामाजिक संदर्भ में साझा करने का यह अवसर बना है।


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स्टीफेन हॉकिंग, पॉल डेविस और रिचर्ड फेनमैन के समकालीन पेनरोज गणितज्ञ, खगोल विज्ञानी और दार्शनिक हैं। उनकी दो मुख्य किताबें  शैडोज ऑफ द माइंड और द लार्ज, द स्मॉल ऐंड द ह्यूमन माइंड , जो क्रमशः 1994 और 1999 में प्रकाशित हुई थीं, आपको बोधगम्य लगने लगेंगी, यदि आप उनके इन तीन समकालीन विज्ञानियों की किताबें पहले पढ़ लें। पेनरोज की दो अन्य किताबें एम्परर्स न्यू माइंड  और साइकल्स ऑफ टाइम का उल्लेख यहां इसलिए जरूरी है कि समय और प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को समझने की उनकी दृष्टि को हम मनुष्य चेतना के संदर्भ में समझ पाते हैं। यही संवाद का प्रस्थान भी बना था।

संवाद के तीन हृदय संदर्भ थे। एक था प्रकृति का अबूझ रहस्य, दूसरा था मनुष्य चेतना का सामाजिक उत्तरण, और तीसरा था, दोनों के बीच छिपे संबंध को खगोल विज्ञान की नजर से देखना और उसे गणित के समीकरण में रखना, ताकि यह अमूर्त न रहकर मूर्त शुद्धता में व्यक्त हो सके। इस प्रस्थान त्रयी के प्रथम दोनों संदर्भ हमारे लिए नए नहीं हैं। इससे पहले रवींद्रनाथ और आइंस्टीन के बीच कई चरणों में इस पर सार्थक संवाद हो चुके हैं। भारतीय विज्ञान की ऋषि मनीषा यह अनुभव करती थी कि प्रकृति के दो ही काम हैं। एक है सत्य पर आवरण डाल देना और दूसरा है, दूसरी चीजों की ओर ध्यान भटकाना। इसे माया कहा गया। संसार में जो कुछ भी यथार्थ है, वह सामाजिक सत्य है। सत्य की सामाजिक छटा को हम यथार्थ कहते हैं। यथार्थ यानी रियलिटी वह है, जो भौतिक स्तर पर किसी देशकाल में विकसित हुआ हो। जैसे इन दिनों सभी चिकित्सालयों को कोविड सेंटर के तौर पर बरता जा रहा है। इन सेंटरों में उन मरीजों को प्राथमिक तौर पर देखा जा रहा है, जिनमें कोरोना के लक्षण हैं। यह यथार्थ है। ऐसे में अन्य बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की चिकित्सा इन जगहों पर या तो बिल्कुल नहीं हो रहीं या न्यूनतम हो रही या सामान्य तौर पर हो रही है। यह दूसरा यथार्थ है। 130 करोड़ की आबादी में स्वास्थ्य का यह मुख्य और नित्य संदर्भ आम जनचेतना से छिप गया है।

विज्ञानी कहते हैं कि प्रकृति एक रहस्य उद्घाटित करती है, तो उसी समय दूसरा यथार्थ छिपा लेती है। कुछ छिपेगा, तभी कुछ दिखेगा। या 'कुछ प्रकट है’ का एकमात्र अर्थ है ‘कुछ छिप गया है।’ यथार्थ पर पड़ते पर्दे का उदाहरण देकर या इसे रूपक के तौर पर दृष्टांत बनाकर हम सत्य पर पड़े माया या प्रकृति के आवरण को भारतीय ढंग से समझते हैं। पश्चिमी ढंग सत्य को यथार्थ कहकर या सत्य का प्रसंग छोड़ अबूझ प्रकृति संकेतों को प्रकट साक्ष्य से प्रस्तावित और सत्यापित करता है। भारतीय दृष्टि इस तर्कशीलता को बुद्धि कहती है और पश्चिमी प्रविधि इसे अंतिम युक्ति मानती है। ऐसी तर्क युक्ति से प्रकाश और सापेक्षता के स्थापित अंतर्संबंध को पेनरोज सिंगुलरिटी कहते हैं।

ब्लैकहोल और डार्क मैटर इसी सिंगुलरिटी या एकाक्ष के आकाश में प्रक्षिप्त गह्वर हैं। देशकाल का ऐसा क्षेत्र, जहां अत्यधिक गुरुत्व के कारण प्रकाश तो क्या, किसी भी स्तर का इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन संभव नहीं। ऐसे घनेरे क्षेत्र के घनत्व पदार्थ का नाम है डार्क मैटर। भारतीय मनीषा के कई प्रज्ञा सूत्र इसी अंधेरे के पीछे स्थित प्रकाश को स्पष्ट देखते हैं। जैसे मौन शब्द में व्यक्त नहीं हो सकता, उसी तरह यह प्रकाश चेतना के अंधेरे में अव्यक्त है। चेतना या कॉन्शसनेस को बौद्ध दर्शन में विज्ञान कहा गया है और इसके पांच स्कंधों में इसे बहुत नीचे स्थान दिया गया है, जो पेनरोज के लिए सर्वोच्च महत्व का है। पेनरोज कहते हैं कि हम खगोल विज्ञान की गणितीय भाषा में प्रकृति के शाश्वत रहस्य को समझ सकते हैं। यह मनुष्य चेतना को समझने में उसी तरह सहायक है, जैसे प्रकृति की आत्यंतिक संरचना को, जो हमें भौतिक स्तर पर जटिल लगती है।

वर्ष 1996 में द कॉन्शस माइंड  किताब लिखकर पेनरोज के बाद लोकप्रिय हुए ऑस्ट्रेलिया के दार्शनिक डेविड चाल्मर्स कहते हैं, यदि हम प्रथम पुरुष की जगह अन्य पुरुष के तौर पर प्रकृति और इसके मन को देखें, तो विराट चेतना का कुछ अंश हमारी पकड़ में आ सकता है। क्वांटम भौतिकी इस दृष्टि को पहले अपना चुकी है। विराट और सूक्ष्म को सह अस्तित्व के तौर पर अपनाकर भी अभी तक कोई अर्थपूर्ण सफलता उन्हें नहीं मिल सकी है। इसके बावजूद पेनरोज अपने तात्विक वातायन में क्वांटम फिजिक्स को साथ संजोते हैं। वह कहते हैं कि यदि कम से कम छिपे और अधिक से अधिक प्रकट हों, तो इसमें हर्ज क्या है! अव्यक्त को गणितीय कल्पना में उकेरना पेनरोज का रहस्य मन है, जो बौधायन, मानव, आपस्तम्ब और कात्यायन की भाषा से बिल्कुल अलग है। पेनरोज को उनके दो अन्य साथी विज्ञानियों के साथ नोबेल पुरस्कार मिलने से आधुनिक भारतीय मनीषा भी उत्साहित है।

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