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आराधना की मौत का जिम्मेदार कौन

Thu, 20 Oct 2016 06:16 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Thu, 20 Oct 2016 06:16 PM IST
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Who responsible for death of Aradhana
पत्रलेखा चटर्जी

विश्व कन्या दिवस (11 अक्टूबर) के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संदेश दिया था, मैं चाहता हूं कि लोग लड़कियों के प्रति भेदभाव खत्म करें और हमारे घरों की सीता की रक्षा करें। प्रधानमंत्री बार-बार बेटियों को बचाने की अपील करते हैं, जो स्वागतयोग्य है। वह जब हमारे घरों की सीताओं को बचाने की बात कर रहे थे, तब हैदराबाद में एक धार्मिक परंपरा के नाम पर 68 दिन से उपवास कर रही एक बच्ची की मौत हो गई, जिस पर राजनीतिक वर्ग ने हैरान करने वाली चुप्पी ओढ़ ली।

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तेरह वर्ष की आराधना समदरिया हैदराबाद के एक स्कूल की आठवीं की छात्रा थी। जैन समुदाय से ताल्लुक रखने वाली यह बच्ची उपवास पर थी, ताकि उसके परिवार के गहनों का कारोबार घाटे से उबर सके। उसके परिजन, पड़ोसी, उसका स्कूल या फिर कोई धार्मिक संत किसी ने भी उसे ऐसा चरम कदम उठाने से नहीं रोका। उसकी मौत के बाद उसके परिजनों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया गया है। उनके खिलाफ बाल न्याय अधिनियम के तहत भी जुर्म दर्ज किए गए हैं। धार्मिक परंपरा और आस्था की आड़ में किसी ने भी उसे ऐसा करने से नहीं रोका। अलबत्ता अखबारों और सोशल मीडिया में इस किशोरी की मौत के बाद काफी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। बेटी बचाओ जैसे अभियान के बावजूद राजनीतिक वर्ग की उदासीनता यही बताती है कि वह कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाएगा, जिससे प्रभावशाली वोट बैंक को नाराज करे। जाहिर है, कुछ दिनों बाद आराधना की कहानी खबरों से जुदा हो जाएगी। लेकिन हमें इस मुद्दे को ऐसे ही नहीं जाने देना चाहिए। धार्मिक नेताओं को इसमें कुछ गलत नहीं दिखता कि 68 दिनों के उपवास के कारण एक किशोरवय बच्ची की मौत हो गई, बल्कि वे तो यह कहते हैं कि अपने धर्म और अपनी परंपराओं का पालन करना तो मौलिक अधिकार है। मगर उस बच्ची को भी तो जीने का मौलिक अधिकार था, और देश का संविधान उसके इस अधिकार को छीनने की किसी को इजाजत नहीं देता।
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आराधना एक बच्ची थी और यदि उसके मन में यह गलत धारणा थी कि उपवास रखकर ही वह अपनी आस्था का प्रदर्शन कर सकती है, तब तो उसे ऐसा करने से रोका जाना चाहिए था। आराधना के साथ जो हुआ, उसने राजस्थान के देवराला में 1987 में रूप कुंवर के सती होने की घटना की याद दिला दी है। उस वक्त मैं देवराला गई थी और वहां मैंने गांव के लोगों को रूप कुंवर के अपने पति के प्रति समर्पण के बारे में बोलते सुना था। पर वहां ऐसी भी आवाजें थीं, जो कह रही थीं कि रूप कुंवर ने सामाजिक और पारिवारिक दबाव में ऐसा कदम उठाया था। रूप कुंवर के सती स्थल पर स्मारक बना दिया गया था। जयपुर में एक आईएएस अधिकारी ने मुझे बताया था कि वहां से आने वाले सिंदूर की दक्षिणी दिल्ली जैसे पॉश इलाके तक में भारी मांग थी। आरंभिक जांच में जिन लोगों को आरोपी बनाया गया था, वे सब छूट गए। उसके बाद दबाव पड़ने पर राज्य के कुछ राजनेताओं समेत 11 लोगों को सती प्रथा को महिमामंडित करने का आरोपी बनाया गया, जिन्हें 2004 में जयपुर की विशेष अदालत ने बरी कर दिया। क्या आराधना का मामला इसकी पुनरावृत्ति साबित होगा? भारत बाल अधिकारों से संबंधित संधि का हस्ताक्षरकर्ता है। इसके मुताबिक किसी भी बच्चे को नुकसान पहुंचाने वाला कोई भी कृत्य दंडात्मक है, फिर यह कृत्य किसी परंपरा या धार्मिक कर्म से क्यों न जुड़ा हो। ऐसी किसी भी परंपरा को उचित कैसे ठहराया जा सकता है, जिसमें एक बच्ची की जान चली जाए?

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