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मेरा दरद न जाणे कोय

Mon, 07 Oct 2013 07:03 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
सुधीर विद्यार्थी Updated Mon, 07 Oct 2013 07:03 PM IST
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who knows my pain

साधो, एक प्रतियोगिता में राजनीति के शीर्षस्थ व्यक्तियों के आत्मकथ्य मंगाए गए। जिन तीन सर्वश्रेष्ठ निबंधों को पुरस्कृत किया गया, उन पर लिखने वालों के नाम अंकित नहीं थे। वे तीनों हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। इन्हें किस नेता ने लिखा है, यह बताने वाले को भी अब पुरस्कृत किया जाएगा।

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एक- प्रेम दीवाणी का दरद कौन जाणे। जिसके पैर में बिवाई नहीं फटी, वह दूसरे के पैरों की तकलीफ को नहीं समझ सकता। मुझे वेटिंग रूम से बाहर फेंक दिया गया और आप हंस रहे हैं। मेरी वर्षों की साधना बेकार चली गई। आज मेरी आंखों में आंसू हैं, लेकिन इन्हें पोंछने वाला कोई नहीं। जिनके लिए मैं रात-दिन जीता-मरता रहा, वे आज मुंह फेरकर खड़े हो गए हैं।
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मेरे जीवन भर की तपस्या बेकार चली गई। मैंने इस उम्र तक वक्त की प्रतीक्षा की। वक्त ने कहा, थोड़ा धैर्य रखो, मैं आता हूं। वह नहीं आया, तो मैंने प्रतीक्षा और बढ़ा दी। वह बोला, कुछ देर और लगेगी। मैंने कहा, सौ-सौ जन्म प्रतीक्षा कर लूं, यदि मिलने का वचन भरो तो। मुझे भरोसा था कि इस बार वह जरूर आएगा। वह इतना निष्ठुर नहीं हो सकता। बारह साल बाद घूरे के भी दिन बहुरते हैं। क्या मैं घूरे से भी गया गुजरा हूं। मैं लाइन में सबसे आगे था। सो भरोसा था कि इस बार बाजी मेरे हाथ ही लगेगी। पर मुझे पीछे धकेल कर कोई और आगे निकल गया। मैंने यहां तक पहुंचने की कितनी कवायद की। सेक्यूलर बाना पहना, पर कोई युक्ति काम नहीं आई।
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दो- मुझे क्या-क्या कह कर बदनाम नहीं किया गया। शीला की जवानी गाकर मेरा मजाक उड़ाया गया। फिर भी मैं विचलित नहीं हुई। देश के हृदय प्रदेश को सुंदर बनाने में लगी रही। पर जनता को तो रोने की आदत है न। आज वह प्याज के छिलके उतार कर रोती है। प्याज नासपीटा होता ही ऐसा है, जो सीधा आंखों पर अटैक करता है। पर इससे लाभ यह होता है कि आंखें निर्मल हो जाती हैं। उनसे दूर तक का दिखाई देने लगता है। मुझे भी तो अब अगले चुनाव का नतीजा साफ-साफ दिखाई पड़ने लगा है। खुदा खैर करे।


तीन- मैं दिन में पीएम बनने के सपने देख रहा था। पर सूबे में दंगा ऐसा हुआ कि मुझे भरी दुपहरी में तारे दिखाई पड़ने लगे। खेल बिगड़ता जा रहा है और मैं कुछ कर नहीं पा रहा हूं। थर्ड फ्रंट अब थर्ड डिग्री टार्चर लगने लगा है। 'समाजवाद' बबुआ का कबहूं नाहि आई...?

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