इस नुकसान का जिम्मेदार कौन
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खुफिया विभाग के एक संयुक्त निदेशक द्वारा तैयार की गई गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट ने इन दिनों बड़ी बहस पैदा कर दी है। वह बहस यह है कि आर्थिक विकास दर के नौ फीसदी (2010-11) से घटकर 4.7 फीसदी (2013-14) रह जाने के पीछे क्या पर्यावरणीय आंदोलन भी कमोबेश जिम्मेदार था? गैर इरादतन ही सही, खुफिया विभाग की यह रिपोर्ट यूपीए सरकार के कामकाज के तरीके पर भी टिप्पणी करती है कि वह पर्यावरण एवं विकास के बीच सही संतुलन बनाने में किस तरह विफल रही। ऐसा लगता है कि जयराम रमेश और जयंती नटराजन जैसे शक्तिसंपन्न पर्यावरण मंत्री भी दो खेमों में बंटे यूपीए नेतृत्व से कोई स्पष्ट संकेत नहीं पा सके कि वनक्षेत्रों के नीचे दबे कोयले के बड़े भंडारों को कैसे विकास के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि, स्वयंसेवी संगठनों ने जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का आह्वान किया, तब यूपीए सरकार यह जताने की कोशिश करती दिखाई पड़ी कि वह पर्यावरण संबंधी मसलों के प्रति ज्यादा सहानुभूति रखती है। यहां तक कि कांग्रेस नेतृत्व ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी जैसे वरिष्ठ नेताओं की इस चेतावनी को भी अनसुना कर दिया कि पर्यावरण का ज्यादा ध्यान रखते हुए विकास की बलि चढ़ाई जा रही है।
ताजा विवाद में खुफिया विभाग (आईबी) की रिपोर्ट ने ऊर्जा क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद में कमी के लिए ग्रीनपीस जैसे स्वयंसेवी संगठन को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की है। खुफिया विभाग का अध्ययन बताता है कि कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ ग्रीनपीस के आंदोलन के कारण देश को दो फीसदी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का नुकसान हुआ होगा। मगर अनजाने में ही यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे यूपीए ने विकास दर को आठ फीसदी से अधिक बनाए रखने का सुनहरा अवसर गंवा दिया।
अगर कोई खुफिया विभाग द्वारा पेश किए गए आंकड़े का बारीकी से अध्ययन करे, तो पता चलेगा कि उसने ग्रीनपीस जैसे एनजीओ के मुकाबले यूपीए सरकार को ज्यादा दोषी ठहराया है। आईबी के मुताबिक, 2007 की शुरुआत में 500 गीगावाट की कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं की योजना बनाई जा रही थी, जिनमें 2013 से बिजली उत्पादन शुरू करना था। यदि इन तमाम कोयला आधारित विद्युत परियोजनाओं से पूरा उत्पादन होता, तो राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि होती, जिससे जीडीपी की दर छह फीसदी हो जाती। हाल के दो-तीन वर्षों में चरणबद्ध तरीके से छह फीसदी जीडीपी यदि देश के उत्पादन में जुड़ती, तो इस आर्थिक चक्र के दौरान कुल जीडीपी के आठ फीसदी से ज्यादा होने की संभावना बनती।
गौरतलब है कि आईबी की रिपोर्ट में 2008 से चल रही 500 गीगावाट क्षमता की परियोजनाओं के मात्र 20 प्रतिशत को प्रभावित करने का आरोप ग्रीनपीस पर लगाया गया है। तो बाकी 80 फीसदी बिजली परियोजनाओं के, जिन्हें कोयले की आपूर्ति नहीं हो रही थी, कामकाज में बाधा डालने का जिम्मेदार कौन है? सीधे तौर पर यह यूपीए सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी थी। तो फिर उन गैरसरकारी संगठनों को दोषी क्यों ठहराया जाए, जो पर्यावरण के मुद्दे पर इन परियोजनाओं का विरोध कर अपना काम ही कर रहे थे?
यह तो सरकार का काम था कि वह गैर सरकारी संगठनों की दलीलों को गलत ठहराती और लोगों को बताती कि विकास एवं पर्यावरण चिंताओं के बीच जरूरी संतुलन रखा जा रहा है। जाहिर है, यूपीए सरकार ऐसा करने में विफल रही। इसके बदले वह कोयला खदानों के आवंटन संबंधी अनेक प्रक्रियागत घोटालों में भी पकड़ी गई। निश्चित रूप से कोल ब्लॉक आवंटन संबंधी गड़बड़ियों में गैर कांग्रेसी राज्य सरकारें भी बराबर की भागीदार थीं, जिन्हें कोयला आधारित विद्युत परियोजनाओं के एनजीओ के विरोध से कोई लेना-देना नहीं था।
हो सकता है कि खुफिया विभाग कोयला खदान आवंटन घोटाले के कारण जीडीपी को हुए नुकसान का भी आकलन करे। इसमें विद्युत परियोजनाओं के लिए हुए आवंटन तो शामिल हैं ही, स्टील एवं सीमेंट परियोजनाओं के लिए हुए आवंटन भी हैं। इस समय 195 से ज्यादा कोल ब्लॉक सीबीआई जांच के दायरे में हैं और इनका आर्थिक गतिविधियों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यदि केंद्र एवं राज्य सरकारें पारदर्शी ढंग से कोयला भंडारों का आवंटन करतीं, तो देश की जीडीपी दर ऊंची हो सकती थी।
योजना आयोग के पूर्व सदस्य सौमित्र चौधरी 500 गीगावाट की बिजली परियोजनाओं में हुई देरी के चलते जीडीपी को हुए नुकसान के साथ एक और आयाम जोड़ते हैं। चौधरी बताते हैं कि अगर इनमें से कुछ विद्युत परियोजनाएं उत्पादन कर पातीं, तो इसका सेवा क्षेत्र पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता। रेल और सड़क परिवहन जैसे सेवा क्षेत्र को फायदा होता, क्योंकि इन परियोजनाओं के लिए कोयला एवं अन्य कच्चे मालों का परिवहन होता। इससे निर्विवाद रूप से सकल घरेलू उत्पाद पर सकारात्मक असर पड़ता।
इसलिए देश की कोयला आधारित विद्युत परियोजनाओं में अनुचित देरी की वजह से जीडीपी को हुए नुकसान की मुख्य जिम्मेदारी केंद्र एवं राज्य सरकारों पर डाली जानी चाहिए। यह देखने वाली बात होगी कि अभी-अभी सत्ता संभालने वाली भाजपा सरकार इस स्थिति में सुधार कैसे लाती है, क्योंकि भाजपा शासित राज्य सरकारें भी कोयला खदानों के अपारदर्शी ढंग से आवंटन में शामिल थीं। खुफिया विभाग की यह रिपोर्ट हमें इस बात की याद दिलाती है कि राजनीतिक वर्ग की अदूरदर्शिता के कारण किस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ है।