जनता कौन है आखिर?

प्रेम प्रकाश पांडेय Updated Wed, 29 Jan 2014 06:35 PM IST
Who is public?
भारत के संविधान में लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना का स्पष्ट विधान है, जिसमें जन-प्रतिनिधियों, लोक-सेवकों और समूचे तंत्र को लोकहित में काम करने का स्पष्ट निर्देश भी है। 'सरकार' शब्द की कल्पना और अवधारणा ही इसी आधार पर टिकी हुई है। समाज ने जब पहली बार अपने लिए सरकार की जरूरत महसूस की होगी, तो उसके पीछे लोकहित, लोक सुरक्षा और लोकानुराग ही प्रमुख तत्व थे। इस बार 25 जनवरी को गणतंत्र-दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्रपति ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा कि सरकार का काम परोपकार करना नहीं है। राष्ट्रपति के इस एक वाक्य ने न केवल एक उलझन, बल्कि एक सांविधानिक संकट भी उपस्थित कर दिया है।

26 जनवरी 1950 को अंगीकृत किए गए संविधान की शुरुआत में ही एक शब्द आता है 'जनता', जिसे 'हम भारत के लोग' कहकर परिभाषित किया गया है। बहुत बार ऐसा होता है कि निश्चित शब्दों में बांधी गई परिभाषाएं उस पारिभाषिक शब्द की संपूर्ण व्यंजना करने में अक्षम हो जाती हैं। आखिर यह 'जनता' है कौन? यह प्रश्न इसलिए भी उठता है कि इसी जनता के मत से चुनी हुई सरकारें इसी संविधान के नाम पर पद और गोपनीयता की शपथ उठाती हैं। पद के साथ जुड़ा यह दूसरा शब्द 'गोपनीयता' आखिर किसके सापेक्ष है? जनता के लिए जनता द्वारा चलाई जा रही जनता की शासन व्यवस्था जनता से ही किसी किस्म की गोपनीयता आखिर कैसे बरत सकती है? पिछले दिनों अरविंद केजरीवाल द्वारा दिए गए धरने के दौरान देखा गया कि सड़क से ही सरकार चलाने का उपक्रम किया गया। तमाम विभागों और कार्यालयों की फाइलों और कागजात पर मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। अदालत में प्रश्न उठाया गया कि मुख्यमंत्री ने गोपनीय फाइलें सड़क पर मंगवाकर पद से जुड़ी गोपनीयता की शपथ का उल्लंघन किया है। अहम प्रश्न यह है कि वहां सड़क पर जो उपस्थित थी, वह जनता ही तो थी। शासन जब जनता का ही है, तो जनता से गोपनीयता कैसी?

भारत के चुनाव आयोग में पंजीकृत छोटे-बड़े चार हजार के आसपास राजनीतिक दलों में से एक भी ऐसा नहीं है, जिसने अपने विजन में गांधी विचार और उनकी परिकल्पनाओं को लिखित रूप में स्वीकार न किया हो। बाद में सत्ता-शीर्ष पर पहुंचे दलों ने इन आदर्शों को छूना भी मुनासिब नहीं समझा। महात्मा गांधी सरकारी गांधी में तब्दील कर दिए गए। पिछले अड़सठ वर्षों में हमने सरकार और समाज की हैसियत से कई टुकड़ों में गांधी का विखंडन किया है। लोहिया ने गांधी के ये विखंडन भांपे थे-एक था सरकारी गांधी, एक था मठी गांधी, एक था कुजात गांधी। ये टुकड़े वृहत्तर समाज ने नहीं, समाज के एलीट तबके और सरकारी तत्वों ने मिलकर किए थे। लेकिन अब तो गांधी हजारों टुकड़ों में बिखर गए हैं-अब तो हठी गांधीवादी भी हैं, सरकारी के अलावा राजनीतिक गांधीवादी भी हैं।

टुकड़ों में बिखरे इस गांधी के किसी भी अंश को अगर कोई सरकार व्यवहार में अपनाती है, तो सड़क से सरकार चलाने का यह दृश्य तो असल में गांधी की स्थापना का कार्य है। इस आधार पर तो सभी राजनीतिक दलों को दिल्ली सरकार को समर्थन देना चाहिए। जनता के शासन में जनता के बीच बैठकर जनता की फाइलें खुलने लगें, तो लोकतंत्र अपनी परिपूर्णता पा लेगा। रही बात वैदेशिक और सुरक्षा संबंधी सावधानियों और गोपनीयता की, तो यह गोपनीयता किनसे बरती जानी है, उन्हें चिह्नित तो कीजिए।

दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार से यह अपेक्षा जरूर है कि वह समुचित कार्य योजना के साथ अपने कार्यक्रमों को अंजाम देगी। आप से हमें राम राज चाहिए। स्वराज की टोपी पहनकर आप ने दिल्ली में स्वराज लाने का वायदा किया है और पूरे देश को यह सपना दिखाया है। तनी हुई रस्सी पर चलकर पहाड़ पार करने की योजनाएं घातक हो सकती हैं। यद्यपि इस रस्सी पर चलने का साहस करना और व्यवस्था से इस तरह टकराना अभिनंदनीय है, किंतु सारी ताकत इस दिशा में केंद्रित होनी चाहिए कि सत्ता का स्वरूप विकेंद्रित हो। ज्योंही सत्ता विकेंद्रित होगी, उसी क्षण से हर दिशा में संपूर्णता से विकास दिखेगा।

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