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कोरोना वायरस: तीसरी लहर की आशंका से कौन डरता है?

Sun, 17 Oct 2021 09:37 AM IST
Baby Halder बेबी हलदर
Updated Sun, 17 Oct 2021 09:37 AM IST
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सार
कोरोना के कारण लोगों को बहुत भीषण अनुभव हुए। इसलिए यह उम्मीद करनी चाहिए कि लोग थोड़ा संभलेंगे और दोबारा लॉकडाउन जैसी स्थिति कतई नहीं आने देंगे। महामारी ने मानवता का नुकसान किया है, तो उसने हमें बहुत कुछ सिखाया भी है।
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Who is afraid of third wave
लॉकडाउन - फोटो : पीटीआई

विस्तार

कोविड का कहर अब भले ही खत्म हो रहा है, लेकिन दिवाली के दौरान उसकी तीसरी लहर की आशंका अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। ऐसे में, मेरे जैसे अनेक लोगों को यह डर सताता है कि अगर कोरोना की तीसरी लहर आई, तो शायद फिर से लॉकडाउन लगेगा, जिसकी मार सबसे अधिक एक बार फिर गरीब लोगों पर ही पड़ेगी। सच कहूं, तो लॉकडाउन की स्मृति अब भी बीच-बीच में ताजा हो जाती है।



कोविड से मारे गए लोगों के विवरण सामने आ चुके हैं, लेकिन सच्चाई यह भी है कि कोविड और लॉकडाउन के दौरान जो लोग भोजन के अभाव में मारे गए, और मेरे हिसाब से उनकी संख्या एकदम कम नहीं थी, उनके ब्योरे भी तो रखे जाने चाहिए थे। एक लेखिका के तौर पर नहीं, एक कामकाजी महिला के तौर पर पश्चिम बंगाल में रहते हुए लॉकडाउन का मेरा कसैला अनुभव रहा। जमीनी स्तर पर मैंने देखा कि गरीब लोगों को जितनी मदद की जरूरत थी, उन्हें उतनी सहायता नहीं मिल पाई।


जैसे कि मदद के लिए आगे आने वाली संस्था का लक्ष्य अगर पांच सौ लोगों को राहत देने का था, तो हजार लोग मदद पाने के लिए कतार में खड़े थे। यह भी देखा गया कि जरूरतमंदों को सतत सहायता नहीं मिली। जब सबके सामने अनिश्चित भविष्य था, तब कौन किसकी और भला कितने दिन मदद कर पाता? जरूरतमंदों की भीड़ देखकर कई जगह मददगार लोगों और संस्थाओं ने धीरे-धीरे अपने हाथ खींच लिए। मदद करने का दायित्व सरकार पर सर्वाधिक था। गरीबों के बूते ही तो सरकार चलती है, लेकिन उस दौरान गरीब ही सबसे अधिक परेशान रहे। जैसे कि अनेक गरीबों के बैंक खाते में सरकारी मदद का पैसा नहीं पहुंचा। ऐसे ही, राशन की दुकानों से जरूरतमंदों को उतना राशन नहीं मिला, जितने के वे हकदार थे। ऐसा हमेशा ही होता आया है कि सरकार द्वारा गरीबों को दी जाने वाली मदद का एक हिस्सा बिचौलियों की जेबों में चला जाता है। महामारी के कारण असंख्य लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।

लॉकडाउन के दौरान लोगों की बढ़ी बेचैनियां
पिछले साल के लॉकडाउन के दौरान मैंने पाया कि गरीबों को इसका मतलब ही मालूम नहीं था। मालूम होता भी कैसे? इसका अनुभव तो उन्हें कभी था नहीं। इसलिए उस दौरान अनेक लोग कामकाज के लिए घर से निकले और सड़कों पर पुलिस की पिटाई खाकर उन्हें वापस घर लौटना पड़ा। पश्चिम बंगाल देश का वह राज्य है, जहां सड़कों पर संभवतः सबसे अधिक जुलूस निकलते हैं। पश्चिम बंगाल देश का वह राज्य भी है, जहां के लोगों को 'बंद' का सबसे अधिक अनुभव है। 'बंद' के दौरान सड़कों-बाजारों में सन्नाटा आम बात है, क्योंकि सड़कों पर निकलना ही जैसे जोखिम को दावत देना है। लेकिन लोगों ने चूंकि इतने दिनों तक बंद और सन्नाटे का अनुभव नहीं किया था, इसलिए उनमें से बहुतों को घबराहट होने लगी थी। उस दौरान सिर्फ पशु-पक्षियों पर ही कोई प्रतिबंध नहीं था।

लॉकडाउन की वजह से कई मुसीबतें झेलनी पड़ी
दुनिया भर में लॉकडाउन के दौरान दुर्लभ पशुओं तक को सड़कों और बाजारों में देखा गया और प्रदूषण का तो नाम-ओ-निशान नहीं था। हालांकि इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि लॉकडाउन के दौरान दुकान-बाजार बंद रहने के कारण बड़ी संख्या में आवारा पशु भूख से मर गए। कोविड और लॉकडाउन के दौरान लोगों को हुई परेशानियों के बारे में बहुत कुछ सामने आ चुका है। लेकिन वास्तविकता यह है कि उस दौरान आवारा पशुओं को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, उस पर कम ही लिखा गया है। यह भी सच है कि मैंने उस दौरान अनेक लोगों को घरों में भोजन तैयार कराकर सड़कों के कुत्तों और गायों के बीच बांटते हुए देखा। तब मुझे इसका भी एहसास हुआ कि महामारी के बीच मानवता भी कुछ हद तक बची हुई है। वैसे तो लूट-खसोट और हिंसा-हत्या इस दुनिया की सच्चाई है। लेकिन महामारी के भीषण दौर में मानवता का जो थोड़ा-बहुत परिचय मिला, वह भी कम नहीं था।

राजनीतिक अनिवार्यता से इतर देश के दूरस्थ इलाकों में जिन लोगों ने गरीबों की मदद की, वह मानवता के तकाजे के कारण ही की। जैसे, पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों तक में सोनू सूद की मदद की चर्चा थी। और आम लोग ऐसा नहीं मानते कि उन्होंने राजनीतिक लाभ या प्रचार के लिए लोगों की मदद की है। महामारी के दौरान गरीबों की ऐसी ही नि:स्वार्थ मदद रतन टाटा जैसे लोगों ने की।

महामारी ने हमें बहुत कुछ सिखाया
पर कुल मिलाकर, कोरोना के कारण लोगों को बहुत भीषण अनुभव हुए। इसीलिए इस बार दुर्गापूजा में सड़कों पर निकलने के बावजूद मेरे जैसे अनेक लोग सशंकित थे कि इतनी भीड़ के कारण स्थिति कहीं बिगड़ न जाए। वैसे भी विशेषज्ञ कहते आए हैं कि त्योहारों के दौरान सावधानी न बरते जाने पर हालत खराब हो सकती है। महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन जरूरी है। लेकिन मनुष्य को घर की दीवारों में बंद नहीं रखा जा सकता। उसे खुला आसमान और ताजा हवा चाहिए। यही कारण है कि तीसरी लहर की आशंका के बीच कुछ दिन पहले तक भी मेरे पास इस तरह के फोन आते रहे कि फिर से तो सब कुछ लंबे समय के लिए बंद नहीं हो जाएगा! इसकी वजह यह है कि रोज कमाकर खाने वाले असंख्य लोगों के लिए पेट की भूख मिटाने की चिंता सबसे अधिक होती है। इसलिए यह उम्मीद करनी चाहिए कि लोग थोड़ा संभलेंगे और दोबारा लॉकडाउन जैसी स्थिति कतई नहीं आने देंगे। महामारी ने मानवता का नुकसान किया है, तो उसने हमें बहुत कुछ सिखाया भी है।

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