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अस्वस्थ होते जा रहे 'मातृत्व' को 'संजीवनी' की जरूरत

Wed, 20 Nov 2019 07:01 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Wed, 20 Nov 2019 07:01 AM IST
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Poor condition of Pregnant women and new mothers in India
पत्रलेखा चटर्जी, वरिष्ठ पत्रकार

भारत में मां का आदर करने की दीर्घकालीन परंपरा है। यहां तक कि बॉलीवुड भी भारतीय माताओं को याद करने में पीछे नहीं रहा है। फिल्म दीवार के उस चर्चित संवाद को भला कौन भूल सकता है। फिल्म के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन कहते हैं, आज मेरे पास बिल्डिंग है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है... क्या है तुम्हारे पास? इसके जवाब में शशि कपूर कहते हैं, मेरे पास मां है! लेकिन वास्तविक जिंदगी में भारतीय माताओं और उनके बच्चों की स्थिति कोई अच्छी नहीं है, जैसा कि एक-एक कर आए सर्वेक्षणों में खुलासा हो रहा है।


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पहले समग्र राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (सीएनएनएस) ने मां और बच्चे दोनों की पोषण की स्थिति की स्तब्ध कर देने वाली तस्वीर पेश की है। इससे यह भी पता चला कि प्रजनन की उम्र में महिलाएं, जिनमें से कई तो गर्भवती भी हैं, कितनी बुरी स्थिति में हैं। बहुत सी माताओं, भावी माताओं के साथ ही बच्चों की पूरे भारत में स्थिति में कोई साम्य नहीं है। कुछ राज्यों में स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बेहद खराब है। सर्वे दिखाता है कि पांच वर्ष तक के 35 फीसदी बच्चे नाटे कद के हैं, 17 फीसदी क्षीण हैं, 33 फीसदी का वजन कम है और 11 फीसदी भयंकर कुपोषित हैं। अंतरराज्यीय स्तर पर जिस तरह का अंतर है, उससे असली कहानी पता चलती है। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में तकरीबन 37 से 42 फीसदी बच्चे नाटे हैं और इसकी व्यापकता राष्ट्रीय 35 फीसदी के औसत से अधिक है।

सीएनएनएस के सर्वे में दो चीजें स्पष्ट तौर पर बाहर आती हैं। पहली, बच्चे की पोषणता की स्थिति और मां की पोषणता और शैक्षणिक स्तर के बीच अंतर्संबंध। सर्वे में मां द्वारा प्राप्त की गई स्कूली शिक्षा और घरेलू समृद्धि के स्तर से बच्चे के उपभोग के पैटर्न का निर्धारण किया गया था। हैरत नहीं होनी चाहिए कि जिन राज्यों में असाक्षरता खासतौर से महिलाओं की असाक्षरता का स्तर अब भी उच्च है, वे बच्चों और माताओं से संबंधित संकेतकों में काफी पीछे हैं। साक्षरता और घर की संपत्ति के अलावा मां और बच्चों के स्वास्थ्य तथा पोषण स्तर पर जो चीज प्रभाव डालती है, वह है महिलाओं की हैसियत। जिन राज्यों में महिलाओं की हैसियत अपेक्षाकृत बेहतर है, उनकी स्थिति इस मामले में बेहतर है।

इसी हफ्ते एक अन्य अपेक्षाकृत छोटे सर्वे ने जमीनी हकीकत की चौंकाने वाली झलकियां पेश की हैं और अनेक असहज करने वाली सचाइयों की पुष्टि की है। स्टूडेंट्स वॉलिंटियर्स ने जून 2019 में छह राज्यों छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में जच्चा-बच्चा सर्वे (जेएबीएस) किया, जिससे अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आईं। इस सर्वे में विद्यार्थियों का समूह प्रत्येक राज्य में दस से बारह आंगनवाड़ियों में औचक सर्वे के लिए पहुंचा और उन्होंने वहां जितना संभव हो सका गर्भवती महिलाओं तथा छह महीने पहले मां बनीं महिलाओं से बात की। उन्होंने पाया कि गर्भवती महिलाओं की जरूरतों पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। इसमें पर्याप्त पौष्टिक भोजन, अतिरिक्त आराम और स्वास्थ्य सुरक्षा शामिल है। न तो परिवार के सदस्यों को न ही खुद महिलाओं को एहसास है कि भावी मांओं को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है।

देश की सबसे अधिक आबादी वाले और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की स्थिति खासतौर से परेशान करने वाली है। जच्चा-बच्चा सर्वे ने खुलासा किया कि 48 फीसदी गर्भवती महिलाओं और छह महीने के दौरान मां बनी 39 फीसदी महिलाओं को इस बात का एहसास ही नहीं कि गर्भावस्था में उनका वजन बढ़ा या घटा। इसी तरह से इस जानकारी का भी अभाव है कि प्रसव के बाद मां को अतिरिक्त आराम की जरूरत होती है। सर्वे से पता चला कि कमजोर आहार के कारण गर्भावस्था के दौरान वास्तव में वजन में कम वृद्धि हुई जिसका प्रभाव बच्चे पर पड़ेगा। कम बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) की महिलाओं का वजन गर्भावस्था के दौरान 13 से 18 किलोग्राम तक बढ़ना चाहिए, मगर सर्वे में शामिल महिलाओं का वजन सिर्फ सात किलोग्राम बढ़ा। उत्तर प्रदेश में स्थिति और बदतर है, जहां वजन में सिर्फ चार किलोग्राम की बढ़ोतरी हुई। ऐसा नहीं है कि इसे सुधारने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है।

सच्चाई यह है कि मातृत्व से संबंधित नीतियों पर ठीक से अमल नहीं हो रहा है, जिससे समुचित लाभ नहीं मिल रहा है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत पूरे देश में गर्भवती महिलाएं छह हजार रुपये मातृत्व लाभ पाने की हकदार हैं, जब तक कि उन्हें औपचारिक क्षेत्र में रोजगार की वजह से पहले से कोई लाभ न मिल रहा हो। लेकिन शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों ने जमीनी स्तर पर पाया कि केंद्र सरकार ने तीन वर्षों तक इसकी उपेक्षा की। 2017 में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई) प्रस्तुत की, लेकिन इस योजना का लाभ प्रति महिला एक शिशु तक सीमित है और राशि भी छह हजार से घटाकर पांच हजार रुपये कर दी गई है। शोधकर्ता कहते हैं कि आधिकारिक स्तर पर स्पष्टीकरण दिया गया कि संभवतः केंद्र की एक अन्य योजना जननी सुरक्षा योजना के लाभ को समायोजित करने के लिए किया गया।

अलबत्ता कुछ राज्यों ने सकारात्मक संकेत दिए हैं। मसलन ओडिशा में सुव्यवस्थित मातृत्व लाभ योजना 'ममता' काम कर रही है। इस राज्य में गर्भवती महिलाओं और दुधमुंहे बच्चों की मांओं को राशन में अंडे जैसे पोषक खाद्य देने की व्यवस्था है। हिमाचल में मातृत्व सुरक्षा के लिए अच्छी सार्वजनिक सेवा है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा में व्यवस्थित आंगनवाड़ियों, बच्चों के लिए पौष्टिक नाश्ते, प्री-स्कूल पाठ्यक्रम के साथ ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय है। झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को माताओं, बच्चों और भावी माताओं पर बहुत अधिक निवेश करने की आवश्यकता है।

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