हिमालय की परवाह कौन करता है
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देश की स्वतंत्रता के करीब सात दशक बाद भी हिमालय अपने को स्वतंत्र महसूस नहीं कर पाता। सौ साल पहले के हिमालय से आज की स्थितियों की तुलना की जाए, तो हिमालय का शायद एक भी हिस्सा ऐसा नहीं बचा, जिसे बेहतर हालत में कहा जा सके। पर यह सब कुछ नीतिकारों और राजनेताओं की समझ से बाहर की बात है या फिर वे समझना नहीं चाहते। पिछले पचास वर्षों में हिमालय में ऐसा बहुत कुछ हुआ, जिनसे उम्मीद बनी थी कि शायद इसके दिन फिरेंगे, क्योंकि इसी काल में हिमालय के सभी कोनों में राज्य बनने की शुरुआत हुई थी। राज्यों की मांग को लेकर उस समय कोई पर्यावरणीय चिंता नहीं थी, पर बेहतर जनजीवन की आशा थी। इससे भी अधिक राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं। इसलिए हिमालय का कोई कोना नहीं बचा, जहां सत्ता ने पैठ न बनाई हो, और नौ राज्य खड़े हो गए। पर हिमालय का एक भी राज्य ऐसा नहीं, जिसने अपने विकास का खाका पर्यावरण पर केंद्रित कर खींचा हो।
तमाम राज्यों की चिंता मात्र एक मुद्दे पर केंद्रित रही कि राज्य को आर्थिकी में सर्वसंपन्न कैसे किया जाए। अब चूंकि आर्थिक चमत्कार उद्योग ही ला सकते थे, इसलिए इन राज्यों में उद्योगों के लिए सारे रास्ते खोल दिए गए और राज्यों की पारिस्थितिकी को विकास की भेंट चढ़ा दिया। कई विनाशकारी योजनाओं की भी शुरुआत हुई। हिमालय में बांधों को लेकर एक क्रांतिकारी कार्य की शुरुआत की गई। इस सोच के पीछे लक्ष्य था कि देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने का एक रास्ता हिमालय की नदियों के गर्भ में है। हिमालय में 500 से अधिक बांध बन रहे है। पूरा हिमालय इसके घावों से छलनी है। अरुणाचल, उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश इनमें अग्रणी हैं।
कभी सर्वेक्षण नहीं हुआ कि इन बड़े बांधों का क्या विकल्प हो सकता है। न ही इस पर बहस हुई कि बांधों की विनाशकारी भूमिका के क्या नतीजे होने वाले हैं। आज हिमालय का बड़ा लाभ जिनके हिस्से में आता है, वही इसके प्रति उदासीन हैं। हिमालय के नौ राज्य और इनके लगभग 40 सांसद हिमालय की आवाज आज तक नहीं बन पाए। संसद में हिमालय पर चिंता नहीं होती। कभी-कभार एक-आध हिमालयी सांसदों को छोड़ इस पर बहस नहीं छेड़ी जाती।
आज हिमालय में संसाधनों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। प्राकृतिक वनों से अच्छादित हिमालय में अब चीड़ का बोलबाला है या निचले इलाकों में खर-पतवारों ने जगह बना ली है। इन दोनों प्रजातियों से वनों की आग बढ़ती जाती है। बीती सदी के सत्तर के दशक में वनों की चिंता के मद्देनजर चिपको आंदोलन ने झकझोरा था। पर इसके बदले सरकारें एक ऐसा वन कानून लेकर आई, जो न वनों का हितैषी है, न लोग ही इससे जुड़ सके। 1980 से पहले वनों की आग बुझाना हर गांव का दायित्व था। अब जंगल की आग बुझाने कोई नहीं आता। ग्लेशियरों और नदियों को भी जलवायु परिवर्तन की मार झेलनी पड़ रही है। बरसात में टनों के हिसाब से हिमालय की बहती मिट्टी एक दूसरे बड़े नुकसान की तरफ इशारा करती है।
हम यह भूल रहे हैं कि हिमालय दुनिया का सबसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है, लिहाजा इससे छेड़छाड़ और इसके संसाधनों पर नियंत्रण करने की लालसा सब कुछ मटियामेट कर देगी। केदारनाथ की त्रासदी इसका बड़ा उदाहरण है। अगर अब भी सबक नहीं लिया गया, तो हिमालय में और बड़ी त्रासदी होगी, क्योंकि तब तक हम हिमालय का और बड़ा नुकसान कर चुके होंगे।