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बहिष्कार से किसे फायदा

Tue, 18 Sep 2018 07:03 PM IST
सुधांशु रंजन
सुधांशु रंजन Updated Tue, 18 Sep 2018 07:03 PM IST
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Who benefits from boycott
सुधांशु रंजन

स्थानीय निकायों के चुनावों को लेकर कश्मीर इन दिनों सुर्खियों में है। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के बाद अब माकपा ने भी इस चुनाव के बहिष्कार की घोषणा कर दी। इन राजनीतिक दलों की मांग है कि पहले केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 35ए पर अपना रुख स्पष्ट करे। जाहिर है, यह एक गैर मुद्दे को मुद्दा बनाना है, क्योंकि राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने पदभार ग्रहण करते ही निर्णय लिया कि अनुच्छेद 35ए पर राज्य सरकार शीर्ष अदालत में अपना पक्ष रखेगी।


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गौरतलब है कि फारूक अब्दुल्ला ने पहले स्थानीय निकायों के चुनाव का समर्थन करते हुए कहा था कि यह चुनाव न दिल्ली के लिए है, न श्रीनगर के लिए है, बल्कि यह जनता के लिए है। अभी सांविधानिक व्यवस्था के तहत बड़ी धनराशि सीधे स्थानीय निकायों को जाती है। परंतु थोड़े दिनों पहले यू-टर्न लेते हुए उन्होंने चुनाव के बहिष्कार की घोषणा कर दी। दरअसल उनके साथ अस्तित्व का संकट है। ऐसे ही पीडीपी को भी अपनी खोई जमीन की तलाश है।

मगर इन राजनीतिक पार्टियों के विरोधों को नजर अंदाज कर वहां चुनावों की घोषणा हो गई। ये चुनाव अक्तूबर-नवंबर में होने वाले हैं। यह सही है कि 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद से घाटी में हालात अच्छे नहीं है। पिछले साल श्रीनगर लोकसभा क्षेत्र के लिए हुए उपचुनाव में केवल 7.14 फीसदी मतदान हुआ था, जिसमें फारूक अब्दुल्ला जीते थे। फारूक को इसका जवाब देना चाहिए कि मतदान का प्रतिशत इतना कम होने के बावजूद उन्होंने सांसद बने रहना क्यों पसंद किया। ऐसे ही मुख्यमंत्री बनने के बाद महबूबा मुफ्ती ने अनंतनाग लोकसभा सीट से इस्तीफा दिया था, परंतु आज तक वहां उपचुनाव कराना संभव नहीं हो पाया। यानी कानून-व्यवस्था की समस्या वहां है। ऐसे में, वहां के मुख्य राजनीतिक दलों द्वारा स्थानीय निकायों के चुनावों के बहिष्कार से स्थिति और जटिल ही होगी। क्या चुनाव का बहिष्कार किसी समस्या का हल है? राज्यपाल मलिक का कहना है कि निष्पक्ष चुनाव न होने के कारण ही राज्य में अलगाववाद की समस्या पनपी है। इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता।
 
बेशक 35ए एक गंभीर मुद्दा है, जो राज्य सरकार को राज्य का स्थायी निवासी घोषित करने का अधिकार देता है। यह बेहद संवेदनशील मसला है, जो सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इस अनुच्छेद के समर्थकों का तर्क है कि ऐसी व्यवस्था महाराजा हरि सिंह ने ही 1927 में की थी। लेकिन जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, तब राजनीतिक पार्टियों को इसे विवाद का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। गौरतलब है कि 73वां एवं 74वां संविधान संशोधन जम्मू एवं कश्मीर पर लागू है और राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा सीधे स्थानीय निकायों को जाता है।
 
चूंकि प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है, इस कारण 90 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार देती है और बाकी 10 प्रतिशत भी उसे कर्ज के रूप में प्राप्त होता है। स्थानीय निकायों के चुनाव न होने से वहां विकास कार्य प्रभावित होंगे। इसके अलावा यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वहां ये चुनाव 10 साल के बाद हो रहे हैं, लेकिन कुछ पार्टियां राजनीतिक नफा-नुकसान को देखते हुए उसका बहिष्कार कर रही हैं। संभव है कि चुनाव में जनता भारी संख्या में मतदान करे। हालांकि दक्षिण कश्मीर के कुछ जिलों में समस्या हो सकती है। बेशक केंद्र सरकार के सामने निष्पक्ष एवं हिंसामुक्त चुनाव कराने की चुनौती तो है ही।

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