किसकी राजनीति, किसकी यात्रा?
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फैजाबाद के मखौड़ा से शुरू होकर अयोध्या के इर्द-गिर्द छह जिलों—फैजाबाद, बस्ती, बाराबंकी, गोंडा, बहराइच और आंबेडकर नगर से गुजरने वाली विश्व हिंदू परिषद की 84 कोसी यात्रा राज्य सरकार के इजाजत नकारने के बाद उसकी योजना के मुताबिक नहीं चल पाई। हालांकि सरयू का तट और उसका पाट इतना बड़ा है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े एक प्रमुख साधु ने कुछ समर्थकों के संग सरयू का पूजन कर लिया और यात्रा पर जाने वाला एक जत्था मखौड़ा से निकल भी पड़ा। बड़े नेताओं-कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद विहिप की यात्रा भले प्रतीकात्मक रह गई हो, लेकिन यात्रा रोकने के सरकारी इंतजाम प्रतीकात्मक नहीं थे।
अयोध्या की परिक्रमा के लिए तीन यात्राएं परंपरागत रूप से होती रही हैं-84 कोसी यात्रा, 14 कोसी, जो अयोध्या की 25 किलोमीटर परिधि में होती है और पंचकोसी यात्रा, जिसमें आठ किलोमीटर का दायरा पूरा किया जाता है। 14 कोसी और पंचकोसी यात्राओं में श्रद्धालुओं की भारी संख्या होती है, जबकि 84 कोसी यात्रा गिने-चुने साधु-संत करते हैं। विहिप इसी यात्रा को ‘राम जन्मभूमि पर मंदिर के लिए जनजागरण’ का जरिया बनाना चाहती थी। इसकी इजाजत पाने के लिए विहिप नेता कई वर्षों बाद सपा प्रमुख और मुख्यमंत्री से मिले और जैसा कि विहिप का दावा है, सपा प्रमुख ने यात्रा पर अनुकूल रुख अपनाया था। बाद में यात्रा की अनुमति नकारे जाने का ठीकरा विहिप नेताओं ने वरिष्ठ मंत्री आजम खान पर फोड़ा। इसकी कई वजहें हैं।
राज्य में हाल के अरसे में सांप्रदायिक तनाव की 20 से अधिक वारदातें हुई थीं, जिनमें कुछ जगहों पर दंगे भी हुए थे। इनमें से कई स्थानों पर पार्टी वोट बैंक के ही दो प्रमुख धड़ों में हुई भिड़ंत पार्टी के लिए चिंता का सबब होनी ही थी। चिंता यह भी थी कि पिछले चुनाव में बसपा के खिलाफ हवा होने के बावजूद सपा को मुस्लिम वोटों का 50 फीसदी से अधिक नहीं मिला। दलित और निचली जातियों के मुस्लिम वोट वैसे भी बसपा की झोली में जाते हैं। फिर केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस भी अल्पसंख्यकों के कल्याण की कई योजनाएं लेकर राज्य में मुस्लिम वोटों की एक और गंभीर दावेदार है, जबकि राज्य में अल्पसंख्यक कल्याण के लिए मिलने वाला केंद्र का फंड पिछले कई वर्षों से पूरा इस्तेमाल हुए बिना वापस जा रहा है।
इसलिए विहिप की यात्रा पर समुदाय के कुछेक परंपरागत पैरोकारों के अलावा सामान्य मुस्लिमों की कोई तीखी प्रतिक्रियाएं या जैसे को तैसा जवाब सामने नहीं आया। कइयों को ताज्जुब है कि आखिर 84 कोसी यात्रा पर पाबंदी से बिन बात बखेड़ा खड़ा करने की क्या वाकई कोई जरूरत थी? इसकी एक बानगी 25 अगस्त की सुबह फैजाबाद में दिखी, जब राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले के सबसे पुराने पत्रकार हाशिम अंसारी से टीवी पत्रकार मुखातिब हुए। अंसारी ने उम्मीद के मुताबिक विहिप को तो कोसा, लेकिन इशारे-इशारे में सपा की वोट बैंक राजनीति पर तंज कसा। ‘मुसलमान तो सबको वोट देते हैं’ कहकर उन्होंने अपनी बात और साफ कर दी। इसलिए जरूरी नहीं कि महज यात्रा पर पाबंदी लगाने से अल्पसंख्यक सपा के पक्ष में गोलबंद हो जाएं। लेकिन विहिप को यात्रा की इजाजत देकर पार्टी बसपा-कांग्रेस को फायदा उठाने और वामपंथियों जैसे अपने पुराने ‘स्वाभाविक सहयोगियों’ को नाराज होने का मौका भी नहीं दे सकती थी।
विहिप की यात्रा को कांग्रेस और दूसरे कुछ दलों ने ‘राजनीतिक यात्रा’ करार दिया, तो इसकी वजह भाजपा का विहिप के समर्थन में उतरना है। राम मंदिर भले ही भाजपा के लिए प्रतिबद्धता का मुद्दा है, लेकिन 1989 से राम मंदिर के लिए लगातार जनजागरण अभियान 47 बरस पहले स्थापित विहिप ही चला रही है। 90 के दशक के राम मंदिर आंदोलन के अलावा भाजपा की भूमिका कम ही रही है। अभी पूरे एक वर्ष विहिप ने देश भर में घर-घर रामनाम जप का अभियान सफलता से संचालित किया। लेकिन तब भाजपा को उसके पीछे खड़े होने की जरूरत नहीं पड़ी। पार्टी को विहिप के समर्थन में तभी उतरना पड़ा, जब विहिप राजनीतिक या सरकारी प्रतिरोध से मुकाबिल हुई। पार्टी नेताओं के इन बयानों में कुछ दम तो है ही कि राम मंदिर उसके लिए वोटों का मामला नहीं है, हालांकि 90 के दशक में पार्टी रामनाम की महिमा का फल चख चुकी है।
ऐसे में यात्रा राज्य में 10 लोकसभा सीटें रखने वाली पार्टी के लिए हद से हद कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने का जरिया जरूर हो सकती है, वरना भाजपा जानती है कि मध्यवर्ग और आबादी में बहुसंख्यक युवा वर्ग के लिए विकास, सुशासन और मजबूती के प्रतीक बन चुके नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में भी उतने ही कारगर हो सकते हैं। यात्रा से ज्यादा मुश्किल कांग्रेस को हो सकती है, जिसे पिछले चुनाव में अप्रत्याशित रूप से मिली 21 लोकसभा सीटें बचाए रखना जरूरी है। इसलिए यात्रा पर पार्टी नेताओं की प्रतिक्रिया सावधानी भरी है। वे इसके लिए भारतीय राजनीति में सबसे ज्यादा बेजा इस्तेमाल किया गया विशेषण—सांप्रदायिक—लगाने से बच रहे हैं, ताकि आबादी के दोनों समुदाय नाराज न हों।
राम जन्मभूमि का मामला, जो अब भी अदालत में है, केंद्र सरकार, अदालत या साख वाले किसी मध्यस्थ के सुलझाए जाने तक राख में दबे अंगारे-सा दहक सकता है। विहिप के एक नेता के हवाले से आई मुलायम सिंह यादव से मध्यस्थता का अनुरोध किए जाने की खबर यदि सच होती, तो शायद वह एक अच्छा कदम होता। लेकिन रामभरोसे चलने वाले देश में रामनाम का दांव चलना आसान है, उसकी जोखिम उठाना मुश्किल।