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वेयर डू आई बिलॉन्ग

Sat, 30 Aug 2014 09:47 PM IST
देव प्रकाश चौधरी
देव प्रकाश चौधरी Updated Sat, 30 Aug 2014 09:47 PM IST
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where do i belong

भाषा में अपने पीछे छूट गई भूमि की तलाश, पीछे छूट गए वक्त से वर्तमान का एक रिश्ता और प्रकृति को समझने की कोशिश को देखकर अर्चना पेन्यूली के रचनात्मक संसार से आप परिचय की शुरुआत कर सकते हैं। उनके स्मृतिपटल पर देहरादून की अनगिनत यादें हैं, तो डेनमार्क के वर्तमान पर उनकी रचना का कारखाना खड़ा है। वे उत्तराखंड की ऐसी पहली लेखिका हैं, जिनके हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद किया गया है। बात 'वेयर डू आई बिलॉन्ग' की हो रही है। पहले हिंदी में 'ज्ञानपीठ' से यह किताब आई थी और अब इसे 'रूपा पब्लिकेशन' ने छापा है।

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अर्चना के इस उपन्यास में आप आत्मप्रदर्शन तो नहीं पाएंगे, हां इसका आत्मविस्तार आपको एक साथ लोकल और ग्लोबल लगेगा। विदेश की धरती पर अप्रवासियों की उम्मीदों, संघर्षों और डरों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ती हुई उपन्यास की कथा में अभिव्यक्ति की जो छटपटाहट है, वह रचनात्मक स्तर पर लेखिका को अपनी दुनिया में संकरेपन के अहसास से लगातार मुक्त रखती है। 'वेयर डू आई बिलॉन्ग' उपन्यास एक भारतीय अप्रवासी की तीसरी पीढ़ी की युवती रीना और उसके शांडिल्य परिवार पर केंद्रित है, जो विदेश में जीवन की वास्तविकताओं से परिचित भी हैं, लाचार भी हैं लेकिन उनकी आंखों में सपने भी हैं।
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डेनमार्क में रहने वाली रीना जेनेटिक इंजीनियरिंग पढ़ रही है। वह दुनिया को खुद अपने अनुभवों से जानना चाहती है। इसी दौरान वह भारत आकर अपने पूर्वजों के देश से परिचित भी होना चाहती है।
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ऐसे में रीना के भीतर और बाहर एक लड़ाई सी चलती दिखती है। फिर भी एक कहानी की अनिवार्य पात्र होने के बावजूद उसकी दुनिया कभी रूमानी अतिरंजना से घिरी नहीं दिखती है और न ही उस पर लेखक ने शब्दों की फिजूलखर्ची की है। एक विचित्र बहुलता कुछ हद तक आश्चर्यजनक और समृद्धिकारी संस्कृति वाले देश की अर्चना के पास खुद के अनुभव और परिस्थितयों की जो बहुलता है, उससे इस उपन्यास में घटनाओं की उत्सुक्तता पाठकों को बांधे रहती है और कहीं भी प्रेम अतिरंजित नहीं दिखता। खुद लेखिका अर्चना कहती है, "प्रेम चाहे कितना ही असीम व अनन्त क्यों न हो, सब कुछ जीत नहीं सकता। किसी भी रिश्ते को बनाने के लिए मन की भावनाओं के अलावा कई अन्य तथ्य इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें उपेक्षित नहीं किया जा सकता।” यही वजह है कि उपन्यास संस्कृतियों के संघर्ष की कहानी अपनी तरह से विकसित करता है।


एक और बात इस उपन्यास के संदर्भ में याद रखने की है कि टेक्नॉलॉजी और मीडिया की मदद से दुनिया आज बहुत ज्यादा हमारे करीब आ गई है। किसी को पसंद हो या न हो, हर कोई एक विश्व संस्कृति का अंग है। फिर भी इतिहास उसे कभी मुक्त नहीं करता और भूगोल हमेशा उसे बंदी होने का अहसास दिलाता है। ऐसे में अर्चना पेन्यूली ने कोशिश की है कि उनका यह उपन्यास उपन्यास सार्वभौमिकता पाने के लिए सांस्कृतिक संदर्भ में प्रासांगिक भी रहे और सार्थक भी। ऐसे में इस उपन्यास की पठनीयता बढ़ जाती है।

वेयर डू आई बिलॉन्ग-अर्चना पेन्यूली
रूपा पब्लिकेशन, मूल्य-495 रुपए

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