संसदीय वाम की गुमशुदगी की तहरीर
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लोकसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है। पार्टी में नई तब्दीलियों के साथ कांग्रेस चुनावी तैयारियों में मशगूल है, तो भाजपा नमो का राग अलापने में ही अपनी नैया पार लगने का ख्वाब बुन रही है। सपा के मुखिया प्रधानमंत्री बनने का सपना खुली आंखों से देखने लगे हैं। दूसरी ओर रालोद, लोजपा और जद (यू) जैसी पार्टियां तय नहीं कर पा रही हैं कि सत्ता में हिस्सेदारी करने के लिए वे किसके साथ गठजोड़ करें। राकांपा अभी कांग्रेस के साथ बनी हुई है, पर तृणमूल कांग्रेस, बीजद, तेदेपा, द्रमुक जैसे दलों की पक्षधरता का अनुमान कोई राजनीतिक पंडित भी नहीं लगा सकता। इन सबका ऊंट किस करवट बैठेगा, किसे पता। जबकि आम आदमी पार्टी अकेले ही लोकप्रियतावाद के हथकंडों के बल पर चुनाव में कूदने का ऐलान कर चुकी है।
कांग्रेस और भाजपा से इतर ये तमाम दल अपनी चुनावी लड़ाई के लिए खाका बना रहे हैं। लेकिन इस चुनावी समर के बीच वाम दल कहां हैं? पूरे संसदीय परिदृश्य के भीतर उत्तर भारत में वाम की उपस्थिति विगत लंबे समय से अदृश्य हो गई जान पड़ती है। ले-देकर इसके अवशेष पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में ही चीन्हे जा सकते हैं। वाम का इस कदर दयनीय हो जाना भारतीय राजनीति के लिए शोकगीत की तरह है। यह इसलिए भी चिंतनीय है कि कुछ लोग अब भी राजनीति का आधार विचार को मानते हैं। जबकि आप के आकस्मिक उभार ने यह शिद्दत से साबित कर दिया है कि राजनीति का अखाड़ा अब विचारहीनता की गिरफ्त में आ गया है।
लंबे समय से तीसरा मोर्चा बार-बार चर्चा में आता है, फिर किसी दुःस्वप्न की तरह हमारी स्मृति से विलीन होने को अभिशप्त है। कई नेतागण अनेक अवसरों पर यह राग अलापते हैं कि तीसरी ताकत चुनाव के बाद आकार लेगी। इनमें वे दल भी शामिल हैं, जो अपनी राजनीति का आधार किसी विचार को समर्पित मानने की घोषणाएं करते नहीं थकते। पर वे यह उत्तर क्यों नहीं देते कि किन न्यूनतम वैचारिक मुद्दों पर इस मोर्चे के बनने की संभावनाएं हैं, और यदि ऐसा है, तो चुनाव से पूर्व वे जनता के समक्ष एक विश्वसनीय विकल्प पेश करने की ओर अग्रसर क्यों नहीं हो रहे हैं।
इनमें सबसे बड़ा दोष वाम पार्टियों का है, जो आगे बढ़कर किसी पहल के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसा लगता है कि उनके भीतर राजनीतिक जोखिम उठाने का साहस छीज चुका है और उन्होंने अपने को अशक्त मान लिया है।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने का श्रेय उन्हें इतिहास में प्राप्त नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी के पहले विभाजन के बाद अनेक टुकड़ों में विभक्त होने पर वे एक बार भी वाम एकता के जरूरी और प्राथमिक कार्यभार को पूरा करने की दिशा में आगे नहीं बढ़े हैं। और न ही किसी-न-किसी मध्यमार्गीय संसदीय दल के पिछलग्गू बने रहने की अपनी विवशताओं के लिए वे शर्मिंदा हैं। विगत में देश के राजनीतिक परिदृश्य पर जितने भी आंदोलन उभरे, चाहे वह दलित आंदोलन हो अथवा पिछड़े वर्गों की पक्षधरता का या भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनांदोलन, लोकपाल बिल जैसी चालू संसदीय कवायद, महंगाई का मसला या किसानों की समस्याएं-इन सबसे वामपंथी पार्टियां बहुत हद तक निरपेक्ष बनी रहीं।
वाम दलों की जनपक्षधरता को कोई नकार नहीं सकता। इस बात से भी इन्कार नहीं कि उनके पास विचारों की असंदिग्ध पूंजी है तथा उनकी नीतियां सर्वहारा के जीवन के लिए सर्वाधिक कल्याणकारी हो सकती हैं। मजदूरों और गांवों का जीवन बदलने, गरीबी मिटाने और शोषणमुक्त समतामूलक समाज बनाने के महान उद्देश्य के लिए उनके पास योजनाबद्ध ढांचा है। फिर वे अपनी नीतियों और आदर्शों को आम जनता के बीच क्यों नहीं ले जा पाए और अपनी जमीन निरंतर खोते कैसे चले गए?
कॉरपोरेट जगत अब राजनीतिक दलों की बहुत-सी नीतियां तय करने लगा है। वाम पार्टियों की कमजोर स्थिति के चलते ट्रेड यूनियनें भी झंडे-बैनर तक सिमट कर रह गई हैं। वाम दलों के खिलाफ रहा कॉरपोरेट जगत अपने हित के लिए आप जैसी पार्टियों के साथ तो खड़ा हो सकता है, लेकिन वहां नहीं, जहां से सर्वहारा के पक्ष में वास्तविक लड़ाई लड़ी जा सकती है। अपने सम्मुख उपस्थित चुनौतियों को वाम दल आखिर कब तक नजरंदाज करते रहेंगे?