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तार-तार होती छवि: आखिर कब लागू होंगे पुलिस सुधार

Fri, 23 Jul 2021 03:33 AM IST
Shivdan Singh शिवदान सिंह
Updated Fri, 23 Jul 2021 03:33 AM IST
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When will police reforms be implemented, read Shivdan Singh article
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक सुनवाई के दौरान पुलिस को निर्देश दिए हैं कि वह आपराधिक मामलों में कार्रवाई के दौरान निजी स्वतंत्रता व सामाजिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखे। इसके संदर्भ में न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का भी हवाला दिया है। न्यायालय को यह निर्देश देने की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि अक्सर पुलिस अपने आप को सर्वोपरि समझते हुए मनमर्जी से किसी की भी स्वतंत्रता का हनन करने लगती है। 


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अक्सर भारतीय पुलिस का व्यवहार आम जनता के प्रति उपनिवेशवादी या सामंती होता है, जिसमें पुलिसकर्मी खुद को जनता के प्रति उत्तरदायी न मानते हुए, केवल सरकार के प्रति ही अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। जबकि विकसित पश्चिमी देशों में पुलिस जनता की पुलिस की तरह व्यवहार करती है। हमारे यहां आज भी उपनिवेशकालीन पुलिस ऐक्ट, 1861 जारी है और इसका प्रभाव पुलिस के तौर-तरीकों में नजर आता है। अंग्रेजों ने यह ऐक्ट भारतीयों का दमन करने के लिए बनाया था। इस ऐक्ट में वे सब प्रावधान हैं, जिनके द्वारा पुलिस किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता का हनन कर सकती है। और नागरिकों को अपने ये अधिकार दोबारा प्राप्त करने के लिए अदालतों की शरण लेनी पड़ती है, जहां अदालती कार्यवाही में बरसों लग जाते हैं। इसलिए देश का आम नागरिक पुलिस से भयभीत रहता है।

अपनी इस छवि का प्रयोग पुलिसकर्मी भ्रष्टाचार और संगठित अपराधियों को संरक्षण देने के लिए करते हैं। और इन कर्मियों को कानून का भी संरक्षण प्राप्त है, जिसका प्रावधान अंग्रेजों ने अपनी पुलिस और नौकरशाहों को सुरक्षा देने के लिए किया था। वहीं भारतीय सेना एक समर्पित बल है, जिसको हर देशवासी श्रद्धा और आदर से देखता है, क्योंकि सेना सीमाओं पर तो दुश्मन को रोकती ही है, प्राकृतिक आपदाओं और कानून व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति में इसे दोबारा लागू करने में अपना सहयोग भी देती है। यह सब सेना जनता के प्रति सद्भाव की भावना रखकर करती है।

पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक पुलिसकर्मी द्वारा महिलाओं के साथ किए गए अपराधों की खबरें आई हैं। इसमें एक पुलिसकर्मी द्वारा एक युवती का जबरन धर्म परिवर्तन कर उसके साथ विवाह करने से लेकर एक डिप्टी एसपी के आपत्तिजनक आचरण तक की खबरें शामिल हैं। दो साल पहले उत्तर प्रदेश के ही उन्नाव में बलात्कार की एक घटना के बाद पुलिस अपने व्यवहार और सबूतों को मिटाने में अपराधियों की मदद करने को लेकर चर्चा में रही थी। कानपुर के बिकरू कांड के बारे में सब जानते हैं कि कैसे मुठभेड में मारे गए कुख्यात अपराधी विकास दुबे को लंबे समय तक पुलिस का संरक्षण मिलता रहा था। उसका साम्राज्य और ताकत इतनी बढ़ गई थी कि उसने और उसके साथियों ने आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी। पुलिस और अपराधियों का गठजोड़ जब तक खत्म नहीं होगा, ऐसे अपराधी पनपते रहेंगे। आश्चर्य होता है कि अपराधियों को संरक्षण देने वाले पुलिसकर्मी अक्सर विभागीय और अदालती कार्रवाई से बच निकलते हैं।
 
हमारे राजनीतिक शासक स्वयं को जनता का सेवक बताते हैं, परंतु जनता पर शासन करने के उनके नियम-कानून वही गुलामों वाले हैं। 1977 में जनता पार्टी के शासन के समय पुलिस कार्यप्रणाली में सुधार के लिए आयोग गठित किया गया था। इसकी अध्यक्षता देश के प्रसिद्ध पूर्व पुलिस अधिकारी जूलियो रिवेरा ने की थी। मगर उनकी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई। 2006 में उत्तर प्रदेश के एक पूर्व पुलिस डीजीपी प्रकाश सिंह ने उच्चतम न्यायालय में इसे लागू करने के लिए गुहार लगाई, जिस पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने 12 सूत्री पुलिस सुधार पूरे देश में लागू करने का आदेश जारी किया। परंतु आज तक केवल कुछ सरकारों ने दिखावे के लिए कुछ किया है, जबकि असली पुलिस सुधारों को देश में कहीं भी लागू नहीं किया गया है। अब समय आ गया है, जब देश की सरकारों को शासन व्यवस्था की आधारभूत इकाई नौकरशाही और पुलिस के स्वरूप में बदलाव लाना चाहिए, ताकि वे बिना किसी दबाव के स्वतंत्र रूप से काम कर सकें।

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