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शोध का है समृद्ध इतिहास, विज्ञान में अग्रणी कब बनेंगे

Sat, 03 Oct 2020 02:26 AM IST
कल्लोल चक्रवर्ती कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Published by: कल्लोल चक्रवर्ती Updated Sat, 03 Oct 2020 02:26 AM IST
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when will India become a leader in science
bhabha atomic research centre

नेचर संस्था ने इस साल दुनिया की सौ साइंस सिटीज की सूची जारी की है, जिनमें भारत के दो शहर बंगलूरू और कोलकाता हैं। पिछले साल बंगलूरू की रैंकिंग 93 थी, इस बार 97 वीं है, जबकि कोलकाता की रैंकिंग 99 है, जो पिछले साल 121 वीं थी। पिछली बार 169 वीं रैंकिंग वाला पुणे इस साल दो सौ शहरों में जगह नहीं बना पाया। दुनिया की शीर्ष पांच साइंस सिटीज हैं-बीजिंग, न्यूयॉर्क, बोस्टन, सैनफ्रांसिस्को और शंघाई। साइंस सिटीज की रैंकिंग शहरों में शोध और विकास में होने वाले खर्च, शोध संस्थानों और वैज्ञानिक सुविधाओं की स्थिति तथा वैज्ञानिक प्रतिभाओं को आकर्षित करने की क्षमता पर तय होती है। शीर्ष 82 साइंस जर्नल में छपी शोध सामग्रियों के आधार पर-जिनका चयन 58 शोधकर्ता करते हैं और जिनका अनुमोदन दुनिया भर के 6,000 वैज्ञानिक करते हैं, साइंस सिटीज की रैंकिंग तय होती है। इस बार के सौ शहरों में अमेरिका के 57 और चीन के 26 शहर हैं, पिछले साल अमेरिका के 78 और चीन के 23 शहर थे। यानी चीन अमेरिका को कड़ी टक्कर दे रहा है। 


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अपने देश में आजादी के बाद विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम हुआ। आईआईटीज तथा परमाणु व अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्रों की शुरुआत हुई, बांध बने व स्टील प्लांट स्थापित हुए। पर विज्ञान और वैज्ञानिक शोध को महत्व देने की कोशिश कम हुई। प्रतिभा पलायन से सबक नहीं लिए गए। जबकि विज्ञान में भारत जैसी स्थिति वाले चीन में बीती सदी के 70 के दशक में देंग श्याओ पिंग के नेतृत्व में विज्ञान को महत्व मिलना शुरू हुआ। चीनी छात्र दुनिया की अग्रणी प्रयोगशालाओं में काम करने गए। वहां वैज्ञानिक और तकनीकी शोध के लिए ढांचा और खर्च बढ़ा। इसलिए बीजिंग, शंघाई और नानजिंग विज्ञान और टेक्नोलॉजी के वैश्विक केंद्र हैं।

कोलकाता देश में विज्ञान के अध्ययन-शोध का पुराना केंद्र है, जिसके साथ सत्येंद्रनाथ बोस, मेघनाद साहा, जगदीशचंद्र बसु, प्रफुल्लचंद्र राय, चंद्रशेखर वेंकट रमण, देवेंद्र मोहन बोस, असीमा चटर्जी आदि का जुड़ाव रहा और जहां इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस-जहां सीवी ने रमण इफेक्ट पर काम किया था, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन ऐंड रिसर्च, बोस इंस्टीट्यूट, साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स, एस एन बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साइंसेज, इंडियन सेंटर फॉर स्पेस फिजिक्स जैसी अग्रणी संस्थाएं हैं, तो भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे बड़ी साइंस सिटी है। कोलकाता की सुभारती दास अमेरिका में कोविड रिसर्च टीम का हिस्सा हैं। 

बंगलूरू में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रो फिजिक्स, इंटरनेशनल सेंटर फॉर थ्योरिटिकल साइंस, जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंस, रमण रिसर्च इंस्टीट्यूट, एम एस रमैया इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लायड साइंस, विश्वेश्वरैया इंड्रस्ट्रियल ऐंड टेक्नोलॉजिकल म्यूजियम आदि हैं, तो इसरो और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के मुख्यालय भी हैं। विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए वहां जवाहरलाल नेहरू प्लेनेटेरियम और उसमें बंगलूरू एसोसिएशन फॉर साइंस एजुकेशन जैसा मंच भी है। बंगलूरू ने देश को पी एस अय्यास्वामी, वी के आत्रे, रमण अथरेया, अनुराधा टीके, वीएसआर अरुणाचलम जैसे वैज्ञानिक दिए।

भारत में अब शोध के लिए फंड की कमी नहीं है। वैज्ञानिक शोध का दायरा बढ़ा है और नए संस्थान खुले हैं। शोध सामग्री की प्रस्तुति में अमेरिका, चीन के बाद भारत तृतीय है। 2008 से 2018 के बीच वैज्ञानिक शोध सामग्री दो फीसदी से बढ़कर पांच फीसदी हुई। पर नई खोज और साझेदारी में शोध के मामले में भारत पीछे है। वैज्ञानिक शोध में होने वाला खर्च जीडीपी का 0.7 फीसदी है, जो ब्रिक्स देशों में सबसे कम है। बेहतर माहौल के अभाव में विज्ञान के छात्र सिविल सर्विसेज में जाते हैं। संस्कृति को महत्व देने के दौर में वैज्ञानिक शिक्षा पर जोर भी नहीं है। पिछले साल भारतीय विज्ञान कांग्रेस में रावण की उपलब्धियों का बखान हुआ! ऐसे में, प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि 2030 तक भारत विज्ञान और तकनीक में दुनिया का तीसरा देश होगा। यह कैसे संभव होगा, इस बारे में कुछ साफ नहीं है।


 
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