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इस शर्म से हमें कब मिलेगी मुक्ति
हेमेन्द्र मिश्र
Updated Sun, 03 May 2015 12:51 PM IST
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अक्तूबर, 2013 तक पश्चिम बंगाल के नदिया जिले की एक-तिहाई से अधिक आबादी खुले में शौच करती थी। मगर अब यह देश का पहला खुले में शौच मुक्त जिला बन गया है। यह उपलब्धि बिना 'सबार जन्य शौचागार' (सबके लिए शौचालय) और 'वाल ऑफ शेम' (शर्म की दीवार) से संभव नहीं था। सबार जन्य शौचागार के तहत सभी के लिए शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया और 'शर्म की दीवार' पर उन लोगों की तस्वीरें टांगी गईं, जिन्हें खुले में शौच करना 'सुविधाजनक' लगता था।
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कुछ इसी तरह की कोशिश केरल के कोझिकोड़ जिले में भी हुई है। वहां के डीएम ने 'त्रिमूर्ति' प्रतियोगिता के तहत लोगों को खुले में मूत्र त्याग करने वालों की तीन तस्वीर सोशल साइट पर पोस्ट करने को कहा। नतीजतन, वहां का बस अड्डा 'खुला पेशाबघर' जैसी उपमाओं से मुक्त हो गया। मध्य प्रदेश की अनीता बाई नर्रे (इन्होंने शौचालय नहीं होने के कारण ससुराल छोड़ दी) जैसे प्रयास भी 'स्वच्छ भारत' की दिशा में हो रहे हैं।
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मगर तब भी दुनिया भर में सर्वाधिक लोग भारत में ही खुले में शौच करते हैं। यहां 97 करोड़ से अधिक हाथ मोबाइल से तो खेलते हैं, जबकि करीब 60 करोड़ आबादी खुले में शौच जाती है। सार्वजनिक शौचालयों की कमी इसकी बड़ी वजह तो है ही, मगर यही एकमात्र कारण नहीं। नदिया में ही हालात तब बदले, जब स्कूली बच्चों को स्वच्छता की शपथ दिलाकर उनके अभिभावकों को झकझोरा गया। हरियाणा में तो यह मानसिकता है कि रोजाना खुले में शौच जाने से न सिर्फ सैर हो जाती है, बल्कि इसी बहाने वे खेत भी देख आते हैं! यह सोच बदलनी होगी।
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हमें समझना होगा कि हमसे गरीब होने के बाद भी बांग्लादेश में चार फीसदी आबादी ही खुले में शौच जाती है। इतना ही नहीं, इससे पांच वर्ष तक के बच्चे अकाल मृत्यु को प्राप्त हो सकते हैं, और कई जलजनित बीमारियों के हम शिकार हो सकते हैं। महिलाओं तथा लड़किओं की सुरक्षा भी इससे जुड़ी हुई है। इसलिए जरूरत इस 'सबसे बड़ी शर्म' को महसूस करने की है। इसकी शुरुआत बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से की जा सकती है, क्योंकि खुले में शौच करने वाली विश्व की एक तिहाई आबादी यहीं बसती है।
- हेमेन्द्र मिश्र