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मतदाता निर्णायक कब होगा
अनिल प्रकाश जोशी
Updated Sun, 20 Oct 2013 05:50 PM IST
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देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के साथ ही राजनीतिक हलचल तेजी से बढ़ रही है। तीन महीने के राजनीतिक घमासान के परिणाम के बाद किसी एक दल का भाग्य खुलेगा। चुनाव अभियान के दौरान सुशासन और विकास के दावे किए जाएंगे। लेकिन सत्ता में आने के बाद सब कुछ भुला दिया जाएगा।
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पिछले करीब साढ़े छह दशक से ऐसा ही हो रहा है कि हमने एक पार्टी को वोट दिया और उससे ऊब जाने के बाद दूसरी पार्टी को। ऐसी राजनीतिक उठापटक के चलते मतदाता भ्रमित भी हुए। सच तो यह है कि मत देते समय हमने विवेक का उपयोग कम ही किया। इसे अपने मत के प्रति बेमानी ही कहा जाएगा। यह भी देखा गया है कि मतदान करना कर्तव्य से ज्यादा फुर्सत पर निर्भर करता है। मतदान के दिन को लोग अवकाश मानकर ही ज्यादा चलते है।
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बिगड़े हुए हालात के लिए हम सरकार को दोषी बनाकर कठघरे में खड़े तो करते हैं, लेकिन खुद अपने दायित्वों के प्रति सजग नहीं है। जबकि हम वोट देकर जिनको चुनते हैं, उनके भले-बुरे कार्यो के प्रति हमारी भी उतनी ही जवाबदेही बनती है। राजनीतिक दल तो आम आदमी की ही भाषा बोलने को मजबूर हैं, चाहे वे सत्ता में आने के लिए परिश्रम कर रहे हों या फिर किसी सामाजिक आंदोलन का सामना कर रहे हों। लेकिन उन्हें सत्ता पर काबिज करने वाला आम मतदाता भी बेहतर राजनीतिक बदलाव के लिए कटिबद्ध नहीं दिखता।
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अक्सर सत्ता विशेष से खिन्न होकर ही हम बदलाव का निर्णय लेते हैं, जो किसी पार्टी विशेष के पक्ष में जाता है। लेकिन इस तरह के मतदान को हमारा विवेकपूर्ण निर्णय नहीं समझा जा सकता, क्योंकि हम एक पार्टी के पक्ष में वोट न डालकर उसे दंडित करते हैं, तो लगभग उस जैसी ही एक पार्टी को सत्ता में लाने का काम करते हैं। ऐसे में आम आदमी की परेशानी वहीं की वहीं रह जाती है।
वर्तमान चुनावी प्रक्रिया में मतदाता का योगदान एक बार वोट डालने के अलावा और कुछ नहीं है। उसके बाद वह चुने हुए प्रतिनिधियों से सवाल पूछने की स्थिति में भी नहीं होता। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी नहीं है, जिसमें मतदाता का अधिकार चयनित प्रतिनिधि पर हो। अगर ऐसी व्यवस्था हो जाए, तो हम कई तरह की राजनीतिक कुरीतियों पर अंकुश लगा सकते हैं। हमें चुनाव का आधार मुद्दों को बनाना होगा, ताकि बाद में पछताना न पड़े।
अब तक तो यही देखने में आया है कि हम चुनाव में किसी एक पार्टी को विजयी तो बना देते हैं, बाद में अपेक्षाएं पूरी न होने पर उसके प्रति मोहभंग शुरू हो जाता है। हमारे जितने भी मुद्दे हैं, चाहे वह सड़क हो या अस्पताल, स्कूल हो या फिर भ्रष्टाचार से संबंधित, यह सब चुनावों से पहले ही चर्चाओं में होने चाहिए। सभी दलों पर बराबर दबाव डालकर आम आदमी को भी आवश्यकताओं व प्राथमिकताओं पर उनकी प्रतिक्रिया सुनिश्चित कर अपने मत का निर्णय लेना होगा।
राजनीतिक दलों का घोषणापत्र इनकी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होता है। इन घोषणापत्रों में दल बढ़-चढ़कर अपने वायदे का लंबा चिट्ठा पेश करते हैं। इन घोषणापत्रों में आम जनता की बेहतरी के बारे में कोई ठोस चीज नहीं होती। मसलन, गांवों के विकास या ग्रामीण समस्याओं के समाधान की कोई प्रतिबद्धता इनमें शायद ही कभी होती हो।
ऐसे घोषणापत्र किसी सर्वेक्षण या विकास पद्धतियों पर आधारित भी नहीं होते। राजनीतिक दलों के घोषणापत्र न तो कभी पढ़े जाते हैं और न ही ये देश की स्थिति सुधारने में कभी कोई भूमिका अदा करते हैं। यह कभी देखने-सुनने में नहीं आया कि किसी गांव के मतदाताओं ने घोषणापत्र के आधार पर दल विशेष के पक्ष में मतदान किया हो।
राजनीतिक दलों ने आजादी के बाद से ही जनता को बेवकूफ बनाया है। ऐसे में समय का तकाजा यही है कि राजनीति आम आदमी की शर्तों पर हो। ऐसा तभी होगा, जब सामाजिक संगठन और गांव-शहर मिलकर अपना घोषणापत्र तैयार करें। यह जन घोषणापत्र हर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र के लिए हो और वहां की प्राथमिकताओं के आधार पर हो।
इसमें विगत वर्षों में प्रतिनिधियों द्वारा जो कार्य न किए गए हों, उसका ब्योरा तो हो ही, आने वाले समय में जो कदम उठाए जाने जरूरी हों, उसका भी विवरण हो। ऐसे घोषणापत्रों से प्रत्याशियों की स्थानीय जिम्मेदारी तय होगी। यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जन घोषणापत्रों के मुद्दों को दल विशेष ने कितनी गंभीरता से लिया, ताकि अगले चुनाव तक चयनित प्रत्याशी को तौला जा सके।
लंबे अरसे से एक ऐसी पहल की आवश्यकता महसूस की जाती रही है कि किस तरह अपने चुने प्रतिनिधियों और उनके राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय की जाए। जन घोषणापत्र इस दिशा में एक प्रभावी कदम होगा। यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि पिछले करीब पैंसठ वर्षों में देश के हालात बदतर ही हुए हैं। कृषि प्रधान देश में किसानों के हालात सुधरने तो दूर, लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। गरीबी मिटाने के आंकड़ों में धोखाधड़ी है।
आज हवा, मिट्टी, पानी, जंगल और जमीन का मुद्दा चुनाव का आधार नहीं है। ऐसे में एक ही रास्ता सामने है, और वह है, अपने मत का सही निर्णय। आम जनता को ऐसी व्यवस्था बनानी ही होगी, ताकि अगली पारी में प्रत्याशी जवाब देने के योग्य रहे। सामाजिक संगठन ऐसे में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं। चेते जाने का समय आ चुका है, वरना हम चुनाव के बाद अगले पांच वर्षों तक घुटते रहने के सिवाय कुछ नहीं कर पाएंगे।