राजनीति का यह दाग कब मिटेगा
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
जब वैश्विक परिस्थितियां बेहद नाजुक हैं और भारत भी इनका सामना कर रहा है, तब राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वे अपने पक्षपातपूर्ण रवैये से देश की तरक्की के रास्ते में बाधक न बनें। पर, जब करीब एक तिहाई जनप्रतिनिधियों पर आपराधिक मामले दर्ज हों, तब उनसे ऐसी उम्मीद करना बेमानी लगता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यों के 34 और केंद्र के 31 प्रतिशत मंत्रियों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। राज्यों के 609 मंत्रियों में से 210 (34 प्रतिशत) मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं, तो केंद्रीय मंत्रिपरिषद के 78 मंत्रियों में से 24 (31 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों का खुलासा किया है। यह जानना आश्चर्यजनक है कि राज्य सरकारों के 113 मंत्रियों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के प्रति हिंसा समेत गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं, लोकसभा और राज्यसभा से केंद्र सरकार में मंत्री बनाए गए 78 सदस्यों में से 14 ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों का खुलासा किया है। जिन राज्यों के मंत्रियों के खिलाफ सबसे अधिक गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, उनमें झारखंड के नौ, दिल्ली के चार, तेलंगाना के नौ, महाराष्ट्र के 18, बिहार के 11 और उत्तराखंड दो मंत्री शामिल हैं। इस मामले में त्रिपुरा और केरल का रिकॉर्ड ही अपेक्षाकृत साफ-सुथरा है। जाहिर है कि हमारे ये जनप्रतिनिधि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सबसे उपयुक्त लोग तो नहीं हैं। एडीआर पिछले करीब 15 साल से न केवल आपराधिक छवि के राजनेताओं का रिपोर्ट कार्ड पेश कर रहा है, बल्कि इसने उनके चुनावी खर्च, राजनीतिक दलों के चंदे और संपत्ति से जुड़े आंकड़े भी उजागर किए हैं। पर राजनीतिक दलों को इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जनता को भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा। सवाल यह है कि अगर कोई उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि का है, तो लोग उसे वोट क्यों देते हैं। या राजनीतिक दल ऐसे नेताओं को टिकट क्यों देते हैं? वास्तव में लोगों के पास बेहतर नेता चुनने के विकल्प ही नहीं होते, क्योंकि राजनीतिक दल भी उन्हीं लोगों को टिकट देते हैं, जिन्हें जिताऊ समझा जाता है। नोटा भी प्रभावी विकल्प तब तक नहीं बन सकता, जब तक जीतने वाले उम्मीदवार से ज्यादा वोट उसे नहीं मिल जाते। अगर ऐसा हो जाए, तब भी आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति में आने से रोकने के लिए जन दबाव बनाया जा सकता है।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
सच यह है कि ज्यादातर निर्वाचन क्षेत्रों में दो या तीन जिताऊ उम्मीदवार होते हैं और जनता का फोकस भी उन्हीं पर बना रहता है। ये उम्मीदवार भी इसलिए जिताऊ नहीं होते कि उन्होंने अपने क्षेत्र में प्रभावी तरीके से काम किया, बल्कि उन्हें धन, बल और ग्लैमर के आधार पर जिताऊ माना जाता है। यानी जनता के पास अपना नेता चुनने के विकल्प सीमित ही होते हैं। विभिन्न राज्यों में लोगों के पास दो या तीन दलों को चुनने का ही विकल्प रहता है, जो सरकार बनाने की क्षमता रखते हैं। एडीआर ने ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों को रेड अलर्ट श्रेणी में रखा है, जहां तीन या अधिक उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि के होते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि हमारे आधे से अधिक संसदीय क्षेत्र रेड अलर्ट की श्रेणी में ही आते हैं।
राजनीतिक दलों का तर्क यह होता है कि दूसरे दल भी ऐसा करते हैं। मगर, उनसे कोई पूछने वाला नहीं है कि गलत काम करने की यह कैसी होड़ लगी है। आखिर क्या कारण है कि सवा अरब की आबादी में हमें 575 जनप्रतिनिधि ऐसे नहीं मिल पाते, जो बेदाग छवि के हों! अनेक नेताओं का तर्क होता है कि उनके विरोधी ने उन पर फर्जी मुकदमे कर दिए हैं। यह तर्क हजम नहीं होता, क्योंकि चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति इतना सामान्य तो नहीं हो सकता कि पुलिस उस पर फर्जी मुकदमा करने की हिम्मत कर सके। अगर ऐसा होता भी है, तो राजनीतिक दलों को ही इसका हल खोजना होगा।
दरअसल राजनीतिक दल टिकट देते वक्त उम्मीदवार के काम के बजाय धनबल, बाहुबल और प्रभाव को तरजीह देते हैं। ऐसे में सामाजिक सरोकार रखने वाले नेता पीछे छूट जाते हैं। इस स्थिति में सुधार तभी हो सकता है, जब दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र हो। लेकिन पार्टियों के शीर्ष पर बैठे मुट्ठी भर नेता ऐसा होने नहीं देना चाहते, क्योंकि आंतरिक लोकतंत्र उन्हें शिखर से जमीन पर पटक सकता है। चुनाव के वक्त राजनीतिक दलों के स्थानीय कार्यकर्ता वोटिंग कर अपनी पार्टी का उम्मीदवार चुनाव लड़ने के लिए चुनें, तो स्थिति बदल सकती है। तब साफ-सुथरी छवि के जमीनी नेता सामने आ सकेंगे। पर स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका उम्मीदवार चुनने में नगण्य होती है और शीर्ष नेतृत्व द्वारा ही किसी नेता को चुनाव लड़ने के लिए भेज दिया जाता है।
राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा और वित्तीय लेन-देन भी पारदर्शिता के प्रश्न से जुड़ा है। कुछ समय पूर्व सूचना के अधिकार कानून के तहत राजनीतिक दलों के आयकर रिटर्न के बारे में जानकारी जुटाने के प्रयास पर भी सियासी जमात ने एतराज जताया था। पर तीन साल के संघर्ष के बाद केंद्रीय सूचना आयोग ने राजनीतिक दलों के आयकर रिटर्न को आम लोगों की पहुंच के भीतर ला दिया। निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराई गई सूचना और इनकम टैक्स रिटर्न की पड़ताल से पता चला कि राजनीतिक पार्टियों की कुल आमदनी का 20 से 25 फीसदी ही ज्ञात स्रोतों से आता है, जबकि 75 से 80 फीसदी आमदनी के स्रोत के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। राजनीतिक दलों का वास्तविक मकसद चुनाव जीतना ही रह गया है। ऐसे में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति से दूर रखना आसान नहीं होगा। प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव से पहले भ्रष्टाचार, गवर्नेंस, काला धन आदि के खिलाफ कदम उठाने के वायदे किए थे। उन पर अभी तक अमल नहीं किया जा सका है, जबकि बिना सख्त पहल के राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रवेश पर लगाम नहीं लगाई जा सकती।
-लेखक एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) से जुड़े हैं