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जब कोई मशहूर होता है
पुष्पेश पंत
Updated Tue, 28 May 2013 01:59 PM IST
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अंग्रेजी शब्द ‘सेलिब्रिटी’ का अनुवाद ‘मशहूर हस्ती’ पूरी तरह सटीक न होते हुए भी हमारे काम चलाने के लिए फिलहाल पर्याप्त लगता है। इस विषय में विस्तार तथा गंभीरता से सोचने के लिए हमें श्रीसंत प्रसंग ने मजबूर किया है। पर यह समझने की जरूरत है कि मामला मात्र आईपीएल की फिक्सिंग तक सीमित नहीं।
बहरहाल उस इनसान की अक्ल पर तरस ही खाया जा सकता है, जिसे लगता है कि अरबों रुपये की इस शानदार-जानदार तिजारत का नाता किसी खेल से है या यह मासूम मनोरंजन है या आम लोगों के दुख-दर्द भरे जीवन को कुछ लम्हों के लिए रोमांचक बनाता है। मशहूर शख्सियतें क्रिकेट के मैदान तक ही सीमित नहीं, अनगिनत फिल्मी सितारे, शौकीन अय्याश उद्योगपति, ताकतवर राजनीतिक परिवारों के शहजादे इस बिरादरी में शुमार किए जा सकते हैं।
मशहूरियत की प्रवृत्ति किसी को भी ‘वीआइपी’ बना देती है-आज के हिंदुस्तान में कानून के राज से ऊपर! श्रीसंत जब मुंबई में धर लिए गए, तब उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया पुलिस को हड़काने वाली थी, जानते नहीं, किस पर हाथ डाल रहे हो? मैं केरल के मुख्यमंत्री का मित्र हूं, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मुझे पहचानते हैं! इस तरह के तेवर दिखलाने वाले वह अकेले नहीं।
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पिछली बार वानखेडे स्टेडियम में अपना कर्तव्य पालन कर रहे सुरक्षा कर्मचारी से गाली-गलौज करते दो-दो हाथ करने के लिए शाहरुख खान आमादा थे। इसी दुर्व्यवहार के कारण अभी तक वहां उनका प्रवेश निषिद्ध है। मशहूर हस्ती होने का मद ही सजायाफ्ता संजू बाबा से जेल की कोठरी में घर के खाने, नर्म गद्दे तथा पंखे की मांग करवाता है। जब अदालत यह रियायत कुबूल करती है, तब हम यह सोचने को विवश होते हैं कि क्या वास्तव में सब नागरिक कानून की नजर में बराबर हैं?
मयप्पन अगर बड़े बाप का बेटा और क्रिकेट में सर्वशक्तिमान व्यक्ति का दामाद नहीं होता, तो ज्यादा पढ़ा-लिखा न होने के बावजूद पैसे और प्रसिद्धि के इस मोड़ पर नहीं होता। दरअसल बड़े बाप के बेटों के सामने यह समस्या नहीं है कि वे क्या करें। अगर वे एक काम में विफल होते हैं, तो दूसरा पेशा हाजिर है।
विंदू दारा सिंह ग्लैमर के व्यवसाय में बहुत सफल नहीं हुए, तो सट्टेबाजी में सेट्ल हो गए। कोई किसी का बेटा-बेटी होने की वजह से तो कोई दामाद के रिश्ते से लाल बत्ती एवं जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है, तो किसी को पुरखों के बलिदान के कारण यह मुगालता होने लगता है कि उसको करिश्मा विरासत में मिला है।
मशहूर हस्ती को पूजने की मानसिकता ने ही इस देश का बेड़ा गर्क किया है। हमें यह सोचने की फुर्सत ही नहीं कि किसी भी हस्ती की मशहूरी की बुनियाद कितनी खोखली और छल-कपट से भरी है। चौबीस घंटे ‘ब्रेकिंग न्यूज’ दिखाकर प्रतिस्पर्धा में दूसरों से आगे रहने के लालच में खासकर टेलीविजन चैनल किसी न किसी सेलिब्रिटी के पीछे पड़े रहते हैं।
कुछ यार लोग इसका भी फायदा उठाना जानते हैं- बदनामी गुमनामी से बेहतर मानकर! यह मौका भी मिल जाता है कि मीडिया ट्रायल के कारण न्यायालय के विचाराधीन सुनवाई में उनको नुकसान हो रहा है या यह सब विपक्ष की साजिश है, उन्हें बदनाम करने के लिए। कलमाडी से लेकर वाड्रा, पूर्व वायुसेनाध्यक्ष त्यागी, कोलगेट से जुड़े मंत्रीगण, नौकरशाह, उद्यमी, पवन बंसल आदि यही तर्क देते हैं।
सार्वजनिक जीवन में सक्रिय कोई भी व्यक्ति उस तरह के एकांत तथा निजता का सुख नहीं भोग सकता, जो आम लोगों को नसीब है। ‘मीडिया ट्रायल’ या ‘कंगारू कोर्ट’ कहकर हर भंडाफोड़ को खारिज नहीं किया जा सकता। विधायकों-सांसदों तथा कार्यरत न्यायाधीशों के विशेषाधिकारों के अपवाद को छोड़ किसी को यह छूट नहीं दी जानी चाहिए कि वह निजी एकांत को बुनियादी अधिकार बना ढाल की तरह इस्तेमाल करे।
मजेदार और दुखदाई कड़वा सच यह है कि देश में मशहूर शख्सियतें-हस्तियां एक-दूसरे का इस्तेमाल परस्पर लाभप्रद ढंग से सुनियोजित साजिश की गंध के साथ करती दिखलाई देती हैं। कल तक गुल्ली-डंडा खेलने वाले पलक झपकते पोलो प्रेमी या गोल्फ के शौकीन बन जाते हैं।
जो उजड़े रजवाड़े या मुसीबतजदा पूंजीपति सहारे की तलाश में होते हैं, वे इन उदीयमान राजनेताओं, बिचौलियों और सत्ता के दलालों को मुंहमांगा दाम देने को तैयार रहते हैं। पिछले दशक से यह खेल पर्दे के पीछे नहीं, बल्कि खुला खेल फर्रुखाबादी शैली में सबके सामने खेला जा रहा है।
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बेलगाम घोड़ा नजर आता है, तो सिर्फ इसीलिए कि उसकी कमान देश के चोटी के राजनेताओं के हाथ है। दूसरे खेलों का हाल कुछ बेहतर नहीं। पानसिंह हों या फूलन देवी, जो लोग अपनी हस्ती या मशहूरी को भुनाना नहीं जानते, वे भून दिए जाते हैं या भुला दिए जाते हैं। जो सुपर स्टार नवकुबेरों की शादियों में किन्नरों को पछाड़ते हुए नाचने में नहीं सकुचाते, वे कभी कष्ट नहीं पाते।
इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिए कि नौजवान हिंदुस्तानियों में बहुतों की दिलचस्पी ईमानदारी से कुछ हासिल करने की नहीं रह गई है। लॉटरी खुलने की तरह या जात-बिरादरी-धरम का छींका टूटने से अचानक शोहरत और दौलत पा जाने का सपना करोड़ों होनहारों को नशेड़ी की तरह गाफिल बना चुका है। एक बार दाढ़ में थोड़ा-सा खून लग जाए, तो मासूम, विपन्न और उत्पीड़ित को भी आदमखोर बनते देर नहीं लगती। क्रिकेट और फिल्मों की मरीचिका ने जितना अहित इस देश का किया है, उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
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बहरहाल उस इनसान की अक्ल पर तरस ही खाया जा सकता है, जिसे लगता है कि अरबों रुपये की इस शानदार-जानदार तिजारत का नाता किसी खेल से है या यह मासूम मनोरंजन है या आम लोगों के दुख-दर्द भरे जीवन को कुछ लम्हों के लिए रोमांचक बनाता है। मशहूर शख्सियतें क्रिकेट के मैदान तक ही सीमित नहीं, अनगिनत फिल्मी सितारे, शौकीन अय्याश उद्योगपति, ताकतवर राजनीतिक परिवारों के शहजादे इस बिरादरी में शुमार किए जा सकते हैं।
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मयप्पन अगर बड़े बाप का बेटा और क्रिकेट में सर्वशक्तिमान व्यक्ति का दामाद नहीं होता, तो ज्यादा पढ़ा-लिखा न होने के बावजूद पैसे और प्रसिद्धि के इस मोड़ पर नहीं होता। दरअसल बड़े बाप के बेटों के सामने यह समस्या नहीं है कि वे क्या करें। अगर वे एक काम में विफल होते हैं, तो दूसरा पेशा हाजिर है।
विंदू दारा सिंह ग्लैमर के व्यवसाय में बहुत सफल नहीं हुए, तो सट्टेबाजी में सेट्ल हो गए। कोई किसी का बेटा-बेटी होने की वजह से तो कोई दामाद के रिश्ते से लाल बत्ती एवं जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है, तो किसी को पुरखों के बलिदान के कारण यह मुगालता होने लगता है कि उसको करिश्मा विरासत में मिला है।
मशहूर हस्ती को पूजने की मानसिकता ने ही इस देश का बेड़ा गर्क किया है। हमें यह सोचने की फुर्सत ही नहीं कि किसी भी हस्ती की मशहूरी की बुनियाद कितनी खोखली और छल-कपट से भरी है। चौबीस घंटे ‘ब्रेकिंग न्यूज’ दिखाकर प्रतिस्पर्धा में दूसरों से आगे रहने के लालच में खासकर टेलीविजन चैनल किसी न किसी सेलिब्रिटी के पीछे पड़े रहते हैं।
कुछ यार लोग इसका भी फायदा उठाना जानते हैं- बदनामी गुमनामी से बेहतर मानकर! यह मौका भी मिल जाता है कि मीडिया ट्रायल के कारण न्यायालय के विचाराधीन सुनवाई में उनको नुकसान हो रहा है या यह सब विपक्ष की साजिश है, उन्हें बदनाम करने के लिए। कलमाडी से लेकर वाड्रा, पूर्व वायुसेनाध्यक्ष त्यागी, कोलगेट से जुड़े मंत्रीगण, नौकरशाह, उद्यमी, पवन बंसल आदि यही तर्क देते हैं।
सार्वजनिक जीवन में सक्रिय कोई भी व्यक्ति उस तरह के एकांत तथा निजता का सुख नहीं भोग सकता, जो आम लोगों को नसीब है। ‘मीडिया ट्रायल’ या ‘कंगारू कोर्ट’ कहकर हर भंडाफोड़ को खारिज नहीं किया जा सकता। विधायकों-सांसदों तथा कार्यरत न्यायाधीशों के विशेषाधिकारों के अपवाद को छोड़ किसी को यह छूट नहीं दी जानी चाहिए कि वह निजी एकांत को बुनियादी अधिकार बना ढाल की तरह इस्तेमाल करे।
मजेदार और दुखदाई कड़वा सच यह है कि देश में मशहूर शख्सियतें-हस्तियां एक-दूसरे का इस्तेमाल परस्पर लाभप्रद ढंग से सुनियोजित साजिश की गंध के साथ करती दिखलाई देती हैं। कल तक गुल्ली-डंडा खेलने वाले पलक झपकते पोलो प्रेमी या गोल्फ के शौकीन बन जाते हैं।
जो उजड़े रजवाड़े या मुसीबतजदा पूंजीपति सहारे की तलाश में होते हैं, वे इन उदीयमान राजनेताओं, बिचौलियों और सत्ता के दलालों को मुंहमांगा दाम देने को तैयार रहते हैं। पिछले दशक से यह खेल पर्दे के पीछे नहीं, बल्कि खुला खेल फर्रुखाबादी शैली में सबके सामने खेला जा रहा है।
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बेलगाम घोड़ा नजर आता है, तो सिर्फ इसीलिए कि उसकी कमान देश के चोटी के राजनेताओं के हाथ है। दूसरे खेलों का हाल कुछ बेहतर नहीं। पानसिंह हों या फूलन देवी, जो लोग अपनी हस्ती या मशहूरी को भुनाना नहीं जानते, वे भून दिए जाते हैं या भुला दिए जाते हैं। जो सुपर स्टार नवकुबेरों की शादियों में किन्नरों को पछाड़ते हुए नाचने में नहीं सकुचाते, वे कभी कष्ट नहीं पाते।
इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिए कि नौजवान हिंदुस्तानियों में बहुतों की दिलचस्पी ईमानदारी से कुछ हासिल करने की नहीं रह गई है। लॉटरी खुलने की तरह या जात-बिरादरी-धरम का छींका टूटने से अचानक शोहरत और दौलत पा जाने का सपना करोड़ों होनहारों को नशेड़ी की तरह गाफिल बना चुका है। एक बार दाढ़ में थोड़ा-सा खून लग जाए, तो मासूम, विपन्न और उत्पीड़ित को भी आदमखोर बनते देर नहीं लगती। क्रिकेट और फिल्मों की मरीचिका ने जितना अहित इस देश का किया है, उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।