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जब सिलते थे रिश्ते...

Fri, 11 Jan 2013 12:23 AM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Fri, 11 Jan 2013 12:23 AM IST
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when relationships stitched...

अगर दर्जी समय पर कपड़े नहीं दे, जिस पर कोई मुकदमा कर दे और दर्जी को सजा हो जाए, तो यह मान लेने में हर्ज नहीं है कि रेडीमेड युग पूरी तरह पैर पसार चुका है, क्योंकि दर्जी और ग्राहक के बीच ऐसे रिश्ते तो हो ही नहीं सकते कि मामला किसी तीसरे के पास जाए। टाइम पर कोई दर्जी कपड़े सिलकर देता है भला! इसके बावजूद यह संभव नहीं कि दर्जी के खिलाफ ग्राहक केस कर दे। खानदानी दर्जी के खानदानी ग्राहक होते हैं। ऐसा थोड़े ही है कि मुंह उठाया और घुस गए किसी भी दुकान में।

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सोच रहा हूं एकाध जोड़ी कपड़े सिलवा लूं, ग्राहक ने यों ही सवाल हवा में छोड़ दिया।
हां, देख लो। पिछले साल ही तो दो जोड़ी सिले थे-गणपत की शादी के लिए भी कमीज सिलवाई थी तुमने। क्या करोगे इतने कपड़े का। टेलर मास्टर ने याद दिलाया।
अरे, क्या है कि फिर ईद आ जाएगी, तो तुम्हारे पास टाइम नहीं रहेगा, और मुझे जाना है बड़े भिया की ससुराल! एकाध कपड़ा नया हो, तो ठीक रहता है। ग्राहक ने मजबूरी बताई!
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तो यह बात है। चाय पिएं, टेलर मास्टर ने कपड़ा काटते हुए पूछा। आ रही होगी, बोलते हुए आया था। ग्राहक ने बताया।
तो इस बार कपड़ा जरा ढंग का लेना! वही नीला-नीला पैंट पीस मत ले आना। टेलर मास्टर ने समझाया।
तुम ही चले चलना साथ में। वह तो भिया की ससुराल से आ गए थे कपड़े, इसीलिए नीले-नीले हो गए। मस्त कलर लेंगे इस बार। खाना खाने जाओगे न, तब मिल जाऊंगा कोठारी सेठ की दुकान पर। ले लेंगे वहीं से।
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कोठारी के यहां कपड़े अच्छे नहीं मिलते। नीमाजी के यहां से क्यों नहीं लेते, दर्जी ने विकल्प सुझाया।
वहीं से लेता था। उधारी चुका नहीं पाया, तो कोठारी सेठ के यहां खाता खोल लिया। इसलिए वहीं से लेना पड़ेगा। हाथ जरा तंग चल रहा है इन दिनों। ठीक है। तो मैं ले लूंगा। नीमाजी के यहां मेरा भी खाता है! दे देना पैसे बाद में। टेलर मास्टर ने सिगरेट सुलगाते हुए पैकेट ग्राहक की तरफ बढ़ा दिया। तुम्हारे पहले ही सिलाई के पैसे बहुत बाकी हो गए हैं। देना है यार। ग्राहक ने याद दिलाया।
दे देना-दे देना। पैसे भगे जा रहे हैं कि तुम भगे जा रहे हो। टेलर मास्टर नाराज हो गया।
तो इस तरह सिलते थे कपड़े, जब रेडीमेड काल का उदय नहीं हुआ था।

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