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न्यायतंत्र में सुधार कब

Thu, 10 Aug 2017 03:41 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Thu, 10 Aug 2017 03:41 PM IST
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When reforms in judiciary
तवलीन सिंह

हम जानते हैं कि अपने इस भारत महान में कानून-व्यवस्था इतनी बेहाल है कि देश का आम आदमी न्यायालयों तक अक्सर पहुंच ही नहीं पाता। न उसकी क्षमता वकीलों की फीस भरने की है और न ही न्याय होने की प्रतीक्षा में अपना पूरा जीवन गंवाने की। हम यह भी जानते हैं कि न्याय की रफ्तार इतनी धीमी है कि हत्या और आतंकवाद जैसे गंभीर मुकदमों की सुनवाई पूरी होने में भी दशकों लग जाते हैं। फिर जब हम किसी जाने-माने विदेशी अखबार में पढ़ते हैं कि इराक और सूडान जैसे युद्धग्रस्त देशों में भारत की तुलना में जल्दी न्याय मिलता है, तो दिल दुखता है।

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पिछले सप्ताह वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भारत की न्याय व्यवस्था पर एक लंबी-चौड़ी स्टोरी की। उसके दो पत्रकारों ने इलाहबाद हाई कोर्ट में छह घंटे गुजारे और अपने अनुभवों को विस्तार से व्यक्त किया। यह रिपोर्ट पढ़कर मुझे गहरी निराशा हुई। यह रिपोर्ट पढ़कर याद आया, कोई बीस साल पहले बिबेक देबरॉय ने मुझे बताया था कि हमारे यहां न्याय व्यवस्था का इतना बुरा हाल है कि पुराने मुकदमों को समाप्त करने में तीन सौ वर्ष लग सकते हैं। बिबेक देबरॉय अब नीति आयोग के सदस्य हैं। सो परिवर्तन लाने के लिए वह प्रधानमंत्री को सुझाव दे सकते हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकारों ने हाई कोर्ट के कमरा नंबर 41 में देखा कि हत्या का एक मुकदमा 1983 से चला आ रहा है और इस बीच आरोपी जमानत लेकर पूरी आजादी के साथ घूम रहा है।
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वॉल स्ट्रीट जर्नल बिजनेस अखबार है, सो ये  पत्रकार भारतीय न्याय व्यवस्था की नाकामियों को आर्थिक दृष्टि से देख रहे थे। उन्होंने निष्कर्ष यह निकाला कि न्याय व्यवस्था की बैलगाड़ी की रफ्तार ही मुख्य कारण है कि 2017 के एक वैश्विक सर्वेक्षण के मुताबिक, 190 देशों की सूची में भारत की जगह 172 वीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी विदेश यात्रा पर गए हैं, एक मुख्य लक्ष्य को ध्यान में रखकर गए हैं। वह लक्ष्य है विदेशी निवेशकों को भारत आमंत्रित करना। यहां विदेशी निवेशक क्यों आएंगे, जब निवेश करने के बाद उन्हें अपने साथ हुए किसी अन्याय के लिए न्याय मिलने में कई दशक लग सकते हैं? वॉल स्ट्रीट ने दक्षिण कोरिया की पोस्को कंपनी का उदाहरण दिया, जो बीती सदी के नौवें दशक में निवेश की उम्मीद से ओडिशा आई थी। पर ओडिशा सरकार उसके लिए जमीन उपलब्ध नहीं करा सकी। 2016 तक मुकदमा चला, और इसके समाप्त होते ही पॉस्को भारत से चली गई। कई विदेशी कंपनियों का यही अनुभव रहा है। समस्या अति गंभीर क्यों न हो, जब भारत में केवल 17,000 न्यायाधीश हैं और तीन करोड़ से अधिक पुराने मुकदमे हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 40 फीसदी पद खाली हैं।
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न्यायालयों की समस्याएं दशकों पुरानी हैं, इसलिए सारा दोष मोदी सरकार पर नहीं डाला जा सकता। लेकिन प्रधानमंत्री से यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि जिस तरह पुराने बेकार कानूनों को आपने हटा दिया है, उतनी ही दृढ़ता से आप न्यायालयों में अभी तक सुधार क्यों नहीं ला पाए हैं। यह उत्तरदायित्व आपके विधि मंत्री का है, सो मेहरबानी करके उनसे उत्तर मांगिए। न्यायतंत्र हमारे लोकतंत्र का बेहद महत्वपूर्ण स्तंभ है। अगर इस स्तंभ में कमजोरी आती है, तो फिर लोकतांत्रिक ढांचे में भी कमजोरी आ जाती है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि न्यायतंत्र में सुधार के बिना भारत का भविष्य रोशन नहीं होगा।

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