क्या होगा आखिर फैसले के बाद

जगदीश उपासने Updated Mon, 05 May 2014 07:15 PM IST
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What will happen after the decision

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मजेदार बात यह है कि अबकी बार मोदी सरकार के लिए वोट देने वाले भी दोस्तों-परिचितों से पूछकर आश्वस्त होना चाहते हैं कि एनडीए अपने दम पर सरकार बना लेगा? भले मोदी और भाजपा-सहयोगी दलों ने इस चुनाव को नाराज देश का रुख भांपकर कांग्रेस से छुटकारा दिलाने के मुद्दे पर केंद्रित कर रखा हो, लेकिन मोदी का समर्थन या उनका विरोध सारे चुनावी अभियान और प्रचार का केंद्रबिंदु बना हुआ है। आर या पार के इस माहौल का ही असर है कि मोदी समर्थक और विरोधी समान रूप से शंकाग्रस्त हैं। ऐसे में देश का कौल क्या वर्तमान माहौल के उलट होने की कोई संभावना है? क्या यूपीए-एनडीए से इतर दलों के सांसदों की तादाद इतनी अधिक हो सकती है कि वे भानुमति का कुनबा जोड़ने की कोशिश कर सकें?
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तथ्यों के आईने में देखने से कुछ बातें स्पष्ट होंगी। मसलन, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि मोदी अपने आप को अभी से प्रधानमंत्री समझने लगे हैं। इसे आप तंज कह सकते हैं, लेकिन इसका एक निहितार्थ यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष को भी एनडीए की सरकार बनने की आशंका है। सोनिया के सलाहकार और मोदी के ‘अच्छे दोस्त’ अहमद पटेल से लेकर कांग्रेस के कई बड़े नेता कह चुके कि मोदी की सरकार को रोकने के लिए वह कुछ भी करेंगे, यानी तीसरे-चौथे मोर्चे, फेडरल फ्रंट वगैरह को समर्थन पर गौर करेंगे। हालांकि पटेल तो, शायद ऊपर से झिड़की मिलने के बाद दूसरे ही दिन अपनी बात से मुकर गए, जिससे कांग्रेस की हार की स्वीकारोक्ति झलकती थी।
बाकी कसर राहुल गांधी ने पूरी कर दी, ‘हम तीसरे मोर्चे का समर्थन नहीं करेंगे। कोई जोड़-तोड़ नहीं करेंगे। हमारे पूरे नंबर आएंगे।’ अब तक हमने देखा कि प्रत्याशियों के चयन के नए फॉर्मूलों से लेकर संगठन में बदलाव की राहुल की ज्यादातर योजनाएं पार्टी के बड़े नेताओं ने ताक पर ही रखीं। ऐसे में राहुल के बयान पर कितना भरोसा करें? मोदी की दौड़ जरा भी कम रह गई, भाग्य से कहीं छींका टूटा, तो कांग्रेस वही करना पसंद करेगी, जैसा उसने चौधरी चरण सिंह और चंद्रशेखर जैसे विपक्ष के दिग्गजों से लेकर एच डी देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल को लेकर किया था। सियासत के अखाड़े के थके हुए पहलवान मुलायम सिंह यादव और गरीब ओडिशा के नवीन पटनायक से लेकर भारतीय सेक्यूलर राजनीति की नई क्षत्रप ममता बनर्जी और जयललिता में से कौन नहीं चाहेगा कि उसका नाम प्रधानमंत्रियों की लिस्ट में दर्ज हो!
लेकिन ये परिदृश्य तो तब, जब एनडीए बहुमत से कुछ ज्यादा ही दूर रह जाए। सात चरणों के मतदान से जो तस्वीर उभरी है, उससे ऐसे संकेत नहीं मिलते। बाकी के दो चरणों में भी पांच राज्य—आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ऐसे हैं, जहां एनडीए का भारी दांव है। आखिर मोदी इतने आश्वस्त यों ही नहीं हो सकते। उनके हावभाव में भावी अधिकार की धमक है। वह अब 300 सीटों की बात कर रहे हैं। राजनाथ सिंह नई सरकार में पद न लेने का दम भर रहे हैं, ताकि सरकार के ‘दो शक्तिकेंद्र न बनें।’ उमा भारती ‘कसूरवारों’ को जेल भेजने और अरुण जेटली यूपीए के ‘परंपरा विरुद्ध लिए गए फैसले’ पलटने के दावे कर रहे हैं। भाजपा और सहयोगी दल 280-290 सीटें जुटाने को लेकर ज्यादा पसोपेश में नहीं हैं।

हालांकि मोदी विरोधी खेमे इस उम्मीद में जरूर हैं कि हो सकता है, एनडीए को मोदी-विरोधी कुछ दलों की जरूरत पड़ जाए और तब वह सरकार बनाने के लिए मोदी के बजाय किसी और को आगे करने को विवश हो जाए? यह खामखयाली है। एनडीए, सरकार बनाने की संख्या से कुछ ज्यादा पीछे भी रह जाए, तब भी वह मोदी को अलग करने की सोच नहीं सकता। आखिर मोदी हैं, इसलिए आज का ताजादम एनडीए है।

अच्छा, अगर मोदी सच में प्रधानमंत्री बन ही गए, तो क्या देश में अराजकता मच जाएगी? ‘22,000 लोग मारे जाएंगे’, जैसी कि राहुल ने सोलन में भविष्यवाणी की? ‘कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा’, जैसा फारूक अब्दुल्ला साहब ने फरमाया? ‘देश चंद उद्योगपतियों के हाथों बिक जाएगा’, जैसा अरविंद केजरीवाल प्रचार कर रहे हैं? या कि ‘मोदी की सरकार न तो आधुनिक (सोच वाली) होगी, न ईमानदार, और न ही न्यायसंगत’, जैसा कि यूरोप के कुछ बुद्धिजीवियों ने फतवा दिया है? प्रधानमंत्री पद के सबसे करीब पहुंचे किसी नेता को लेकर इतनी आशंकाएं इससे पहले शायद ही कभी जाहिर की गई हों।

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के प्रशासन में आंतरिक सुरक्षा के सहायक सचिव रहे डेविड बी. कोहेन ने अपने एक लेख में मोदी और राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन में अद्भुत समानताएं गिनाई हैं। मोदी और रीगन, दोनों की पृष्ठभूमि सामान्य, दोनों अपने राज्यों के लोकप्रिय और कामयाब मुख्यमंत्री (अमेरिकी गर्वनर का पद मुख्यमंत्री जैसा), दोनों खरी-खरी कहने वाले, दोनों मुक्त अर्थव्यवस्था के पक्षधर और दोनों के आलोचक भी समान! रीगन का आलोचक अमेरिकी सांस्कृतिक अभिजात तबका, जिसने उनके राष्ट्रपति बनने पर अमेरिका में विनाश की भविष्यवाणियां की थीं, तो मोदी के आलोचकों का भी ऐसा ही ख्याल! आलोचक रीगन को ‘रेसिस्ट’ कहते, तो मोदी को ‘सांप्रदायिक’ कहा जाता है। रीगन ने सोवियत संघ से ‘जैसे को तैसा रिश्ते’ रखे, तो मोदी पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों से ‘आंख से आंख मिलाकर संबंध रखने’ की बात करते हैं। कोहेन ने लिखा है कि रीगन ने आलोचकों को बेमानी कर दिया और उनके शासनकाल में अमेरिका और मजबूत होकर उभरा। मोदी भी क्या ऐसा कर पाएंगे?
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