{"_id":"5cc854acbdec22079179079f","slug":"what-will-change-bengal","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"लोकसभा चुनाव 2019: बंगाल में सियासी घमासान, क्या कुछ चमत्कार हो पाएगा?","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया","slug":"opinion"}}
लोकसभा चुनाव 2019: बंगाल में सियासी घमासान, क्या कुछ चमत्कार हो पाएगा?
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
बंगाल
प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में इतनी रैलियों को संबोधित किया है, जितना किसी संसदीय चुनाव में इससे पहले किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता ने नहीं किया था। यह स्पष्ट है कि मोदी चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सीटों की संख्या नाटकीय रूप से बढ़ जाए, क्योंकि उनकी पार्टी को हिंदी पट्टी के राज्यों में होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई करनी है। भाजपा के नेता अपने प्रदर्शन को लेकर बड़े-बड़े दावे कर भी रहे हैं।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में इतनी रैलियों को संबोधित किया है, जितना किसी संसदीय चुनाव में इससे पहले किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता ने नहीं किया था। यह स्पष्ट है कि मोदी चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सीटों की संख्या नाटकीय रूप से बढ़ जाए, क्योंकि उनकी पार्टी को हिंदी पट्टी के राज्यों में होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई करनी है। भाजपा के नेता अपने प्रदर्शन को लेकर बड़े-बड़े दावे कर भी रहे हैं।
अमित शाह ने कहा है कि भाजपा को बंगाल की 42 में से 23 सीटें मिलेंगी। 29 अप्रैल को रेल मंत्री पीयूष गोयल ने दावा किया कि इस राज्य में भाजपा का सीटों का आंकड़ा 30 को पार कर जाएगा। इसी दिन मोदी ने उत्तरी कोलकाता में एक सभा को संबोधित करते हुए दावा किया, 'दीदी आपके 40 विधायक हमारे संपर्क में हैं।' और यह दावा मोदी के उस खुलासे के तीन दिन बाद आया, जब उन्होंने कहा था कि दीदी उन्हें मिठाइयां और कुर्ते भेजती हैं; यह तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों को भ्रमित करने की स्पष्ट कोशिश थी।
यानी बंगाल की लड़ाई सिर्फ संसदीय चुनाव में अधिक सीटें जीतने तक सीमित नहीं है। ऐसा लगता है कि बांग्लाभाषी बहुल त्रिपुरा में मिली नाटकीय जीत से प्रेरित भाजपा की नजर 2022 के विधानसभा चुनाव पर है। ममता की तरह, जिन्होंने 2009 में लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद 2011 में विधानसभा चुनाव में भी बुनियादी तौर पर जीत दर्ज की थी, भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव को बंगाल के लिहाज से सेमीफाइनल मान रही है। मोदी और अमित शाह उम्मीद कर रहे हैं कि इतिहास खुद को इस बार उनके लिए दोहराएगा।
पश्चिम बंगाल में भाजपा जिस तरह से जोर लगा रही है, वह संघ परिवार द्वारा राज्य में सदस्यता के लिए चलाए गए अभियान के क्रम में ही है। आरएसएस दक्षिण बंगाल के महासचिव जिश्नु बसु कहते हैं, 'पिछले तीन से चार सालों में पश्चिम बंगाल में आरएसएस की सदस्यता के लिए चलाए गए अभियान के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। नियमित शाखाओं में आने वाले युवक और युवतियों की संख्या में खासी बढ़ोतरी हुई है। 2013 में पश्चिम बंगाल में संघ की 750 शाखाएं लगती थीं, जो 2018 में बढ़कर 1,279 हो गईं।'
अमित शाह ने कहा है कि भाजपा को बंगाल की 42 में से 23 सीटें मिलेंगी। 29 अप्रैल को रेल मंत्री पीयूष गोयल ने दावा किया कि इस राज्य में भाजपा का सीटों का आंकड़ा 30 को पार कर जाएगा। इसी दिन मोदी ने उत्तरी कोलकाता में एक सभा को संबोधित करते हुए दावा किया, 'दीदी आपके 40 विधायक हमारे संपर्क में हैं।' और यह दावा मोदी के उस खुलासे के तीन दिन बाद आया, जब उन्होंने कहा था कि दीदी उन्हें मिठाइयां और कुर्ते भेजती हैं; यह तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों को भ्रमित करने की स्पष्ट कोशिश थी।
यानी बंगाल की लड़ाई सिर्फ संसदीय चुनाव में अधिक सीटें जीतने तक सीमित नहीं है। ऐसा लगता है कि बांग्लाभाषी बहुल त्रिपुरा में मिली नाटकीय जीत से प्रेरित भाजपा की नजर 2022 के विधानसभा चुनाव पर है। ममता की तरह, जिन्होंने 2009 में लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद 2011 में विधानसभा चुनाव में भी बुनियादी तौर पर जीत दर्ज की थी, भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव को बंगाल के लिहाज से सेमीफाइनल मान रही है। मोदी और अमित शाह उम्मीद कर रहे हैं कि इतिहास खुद को इस बार उनके लिए दोहराएगा।
पश्चिम बंगाल में भाजपा जिस तरह से जोर लगा रही है, वह संघ परिवार द्वारा राज्य में सदस्यता के लिए चलाए गए अभियान के क्रम में ही है। आरएसएस दक्षिण बंगाल के महासचिव जिश्नु बसु कहते हैं, 'पिछले तीन से चार सालों में पश्चिम बंगाल में आरएसएस की सदस्यता के लिए चलाए गए अभियान के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। नियमित शाखाओं में आने वाले युवक और युवतियों की संख्या में खासी बढ़ोतरी हुई है। 2013 में पश्चिम बंगाल में संघ की 750 शाखाएं लगती थीं, जो 2018 में बढ़कर 1,279 हो गईं।'
ममता का राजनीतिक अस्तित्व इस बात पर टिका हुआ है कि वह भाजपा को अपने राज्य में कितनी कम सीटों पर रोक पाती हैं
2019 में इनकी संख्या 2,000 को पार कर सकती है, क्योंकि नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के प्रवास के बाद राज्य में आरएसएस की सदस्यता का आवेदन देने वालों की संख्या पांच गुना बढ़ गई। आरएसएस के वरिष्ठ नेता बिप्लव राय ने पत्रकारों से कहा था, एक जून (पिछले साल) से लेकर छह जून तक औसतन हमें हमारी वेबसाइट 'ज्वाइन आरएसएस' के जरिये राष्ट्रीय स्तर पर 378 आवेदन मिले। सात जून को जिस दिन मुखर्जी ने हमारे शिक्षा वर्ग को संबोधित किया था, हमें 1,779 आवेदन मिले। सात जून के बाद से हमें रोजाना 1200 से 1300 आवेदन मिल रहे हैं, जिनमें से चालीस फीसदी बंगाल से हैं।'
बंगाल के राजनीतिक और बौद्धिक जीवन के मजबूत वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष उन्मुखीकरण से निपटना भाजपा-आरएसएस के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के निर्माण जैसी बड़ी चुनौती है। अल्पसंख्यकों के बचाव की अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता के कारण ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस पार्टी को एक मजबूत राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, भले ही भाजपा इसे अल्पसंख्यकों का सबसे खराब तुष्टीकरण कहती है।
ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस या उसके बिना भी जब क्षेत्रीय दलों को मिलाकर फेडरल फ्रंट के गठन का वादा किया गया, तो उनकी चुनौती और बढ़ गई। फेडरल फ्रंट के पीछे क्षेत्रीय दलों की प्रधानता के साथ भारतीय राज्यों की क्षेत्रीय और भाषायी पहचान को कायम रखने का विचार है, जो कि बहुसंख्यक धार्मिक पहचान के साथ भाजपा-आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के दृष्टिकोण के लिए चुनौती है।
जाहिर है, ममता का राजनीतिक अस्तित्व इस बात पर टिका हुआ है कि वह भाजपा को अपने राज्य में कितनी कम सीटों पर रोक पाती हैं, ताकि वह केंद्र में मजबूत सरकार न बना सके। वह जानती हैं कि मोदी को यदि एक और कार्यकाल मिलता है, तो उससे उनकी पार्टी के लिए बड़ी मुश्किल पैदा होगी। उनके मन में कोई संदेह नहीं है कि मोदी बंगाल में तृणमूल के साथ ही धर्मनिरपेक्ष वाम राजनीतिक परंपरा के सभी अवशेषों को नष्ट करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। इसलिए वह इस लड़ाई को दिल्ली तक ले जाना चाहती हैं।
उनकी राष्ट्रीय आकांक्षा, जैसा कि कई लोग इसे प्रधानमंत्री पद से जोड़कर भी देखते हैं, का संबंध उनके राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। उन्हें पड़ोसी राज्य असम से सबक मिला है, जहां भाजपा ने असम गण परिषद (अगप) के साथ लंबे गठबंधन के बाद अगप के आधार को हड़प लिया। दीदी के लिए पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बचाने का एक ही रास्ता है और वह है दिल्ली में मोदी की पराजय सुनिश्चित करना। इसलिए अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह ममता भी चाहती हैं कि केंद्र में एक कमजोर गठबंधन सरकार बने जोकि उनके समर्थन पर निर्भर रहे, जिससे वे राज्य के हित में रियायतें हासिल कर सकें। इससे उन्हें अपना राजनीतिक आधार बनाए रखने में मदद मिलेगी। यह बेताबी चुनाव के दौरान हो रही हिंसा में देखी जा सकती है।
मोदी ने जहां बंगाल में बेहतर शासन और विकास के वादे पर ध्यान केंद्रित किया है, वहीं ममता ने एनआरसी का मुद्दा उठाया है, ताकि भाजपा को बंगाली विरोधी पार्टी साबित किया जा सके। असम में एनआरसी के पहले मसौदे में चालीस लाख बांग्लाभाषी हिंदू और मुस्लिमों को बाहर किए जाने और मोदी द्वारा नागरिकता संशोधन विधेयक को संसद से पारित न करवा पाने के कारण ममता को असम में बंगालियों के समर्थन का एक मुद्दा मिल गया। बेरोजगारी, कृषि क्षेत्र की हताशा और सुस्त विकास दर जैसे मुद्दे को कालीन के नीचे दबाकर मोदी बालाकोट में आतंकी शिविर पर किए गए हवाई हमले को प्रमुखता से उठा रहे हैं, वहीं ममता बंगाल में अपना किला बचाने के लिए एनआरसी का भय दिखाकर भाजपा पर हमले कर रही हैं।
बंगाल के राजनीतिक और बौद्धिक जीवन के मजबूत वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष उन्मुखीकरण से निपटना भाजपा-आरएसएस के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के निर्माण जैसी बड़ी चुनौती है। अल्पसंख्यकों के बचाव की अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता के कारण ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस पार्टी को एक मजबूत राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, भले ही भाजपा इसे अल्पसंख्यकों का सबसे खराब तुष्टीकरण कहती है।
ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस या उसके बिना भी जब क्षेत्रीय दलों को मिलाकर फेडरल फ्रंट के गठन का वादा किया गया, तो उनकी चुनौती और बढ़ गई। फेडरल फ्रंट के पीछे क्षेत्रीय दलों की प्रधानता के साथ भारतीय राज्यों की क्षेत्रीय और भाषायी पहचान को कायम रखने का विचार है, जो कि बहुसंख्यक धार्मिक पहचान के साथ भाजपा-आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के दृष्टिकोण के लिए चुनौती है।
जाहिर है, ममता का राजनीतिक अस्तित्व इस बात पर टिका हुआ है कि वह भाजपा को अपने राज्य में कितनी कम सीटों पर रोक पाती हैं, ताकि वह केंद्र में मजबूत सरकार न बना सके। वह जानती हैं कि मोदी को यदि एक और कार्यकाल मिलता है, तो उससे उनकी पार्टी के लिए बड़ी मुश्किल पैदा होगी। उनके मन में कोई संदेह नहीं है कि मोदी बंगाल में तृणमूल के साथ ही धर्मनिरपेक्ष वाम राजनीतिक परंपरा के सभी अवशेषों को नष्ट करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। इसलिए वह इस लड़ाई को दिल्ली तक ले जाना चाहती हैं।
उनकी राष्ट्रीय आकांक्षा, जैसा कि कई लोग इसे प्रधानमंत्री पद से जोड़कर भी देखते हैं, का संबंध उनके राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। उन्हें पड़ोसी राज्य असम से सबक मिला है, जहां भाजपा ने असम गण परिषद (अगप) के साथ लंबे गठबंधन के बाद अगप के आधार को हड़प लिया। दीदी के लिए पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बचाने का एक ही रास्ता है और वह है दिल्ली में मोदी की पराजय सुनिश्चित करना। इसलिए अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह ममता भी चाहती हैं कि केंद्र में एक कमजोर गठबंधन सरकार बने जोकि उनके समर्थन पर निर्भर रहे, जिससे वे राज्य के हित में रियायतें हासिल कर सकें। इससे उन्हें अपना राजनीतिक आधार बनाए रखने में मदद मिलेगी। यह बेताबी चुनाव के दौरान हो रही हिंसा में देखी जा सकती है।
मोदी ने जहां बंगाल में बेहतर शासन और विकास के वादे पर ध्यान केंद्रित किया है, वहीं ममता ने एनआरसी का मुद्दा उठाया है, ताकि भाजपा को बंगाली विरोधी पार्टी साबित किया जा सके। असम में एनआरसी के पहले मसौदे में चालीस लाख बांग्लाभाषी हिंदू और मुस्लिमों को बाहर किए जाने और मोदी द्वारा नागरिकता संशोधन विधेयक को संसद से पारित न करवा पाने के कारण ममता को असम में बंगालियों के समर्थन का एक मुद्दा मिल गया। बेरोजगारी, कृषि क्षेत्र की हताशा और सुस्त विकास दर जैसे मुद्दे को कालीन के नीचे दबाकर मोदी बालाकोट में आतंकी शिविर पर किए गए हवाई हमले को प्रमुखता से उठा रहे हैं, वहीं ममता बंगाल में अपना किला बचाने के लिए एनआरसी का भय दिखाकर भाजपा पर हमले कर रही हैं।