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सिर्फ कानून बदलने से क्या होगा
सुनील खिलनानी
Updated Thu, 03 Jan 2013 12:13 AM IST
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राष्ट्रीय राजधानी में 23 वर्षीय युवती के साथ बलात्कार एवं हत्या की घटना ने महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की तरफ सामूहिक ध्यान खींचा है। दोषियों को कठोर सजा दिए जाने की मांग लाजिमी है। इस घटना के खिलाफ आयोजित रैलियों में कई तख्तियों पर साफ-साफ लिखा था-बलात्कारियों को मृत्युदंड अनिवार्य हो, बलात्कारियों को फांसी दो।
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जिस बर्बरतापूर्ण ढंग से इस अपराध को अंजाम दिया गया, उसके लिए ऐसी प्रतिक्रिया हैरान नहीं करती। इसलिए सुषमा स्वराज से लेकर जयललिता तक कई राजनेता, अब यही मांग कर रहे हैं। लेकिन सिर्फ नैतिक कारणों से नहीं, बल्कि कुछ व्यावहारिक कारणों से भी यह एक खतरनाक प्रतिक्रिया है।
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यदि हम वास्तव में देश में बलात्कार की घटनाओं को कम करना चाहते हैं, तो हमें उस युवती की त्रासद मौत से कुछ सबक लेने की जरूरत है। एक समाज एवं सरकार के रूप में ये सबक हमसे कुछ नए कानून पारित करने के बजाय ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अधिक से अधिक प्रयास की मांग करती है।
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इस पर जनमत बंटा हुआ है कि फांसी की ऐसी सजा, जिसमें पेरोल पर बाहर आने की संभावना न हो, अपराध को कम कर सकती है या उम्रकैद की सजा। लेकिन एक चीज जो अपराध पर अंकुश लगाती और समाज को सुरक्षित बनाती है, वह है कानून के राज के कुछ मूल तत्वों का नियमित रूप से उचित ढंग से काम करना। आज हमारे देश में उनमें से कई मूल तत्व बुरी तरह से विफल हैं।
उदाहरण के लिए, पुलिस तंत्र को ही ले लीजिए। एक सक्रिय पुलिस तंत्र का मतलब मात्र सिपाहियों का दल नहीं है, जो सार्वजनिक जगहों की सुरक्षा करता है। इसका मतलब एक ऐसी पुलिस सेवा से है, जिसमें अधिकारी कर्तव्यनिष्ठा से महिलाओं के खिलाफ हुई हिंसा और बलात्कार के मामले दर्ज करता है, पीड़िता का सम्मान करते हुए मामले की जांच करता है तथा उत्साहपूर्वक निष्पक्ष सुबूत इकट्ठा करता है। लेकिन हाल ही में ब्लूमबर्ग में प्रकाशित पत्रकार लिजा बेयर की रिपोर्ट एक अनोखे आंकड़े की तरफ ध्यान खींचती है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा संकलित आंकड़ों के मुताबिक, स्वीडन में प्रतिवर्ष एक लाख की आबादी पर 63 बलात्कार होते हैं, जबकि ब्रिटेन में यह आंकड़ा 29, अमेरिका में 27 और भारत में 1.8 है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि हमारे देश में बलात्कार के मामलों में समस्या सजा और दंड के स्तर से काफी पहले शुरू हो जाती है। यानी महिलाओं के खिलाफ हिंसा और बलात्कार के ज्यादातर मामले दर्ज ही नहीं हो पाते।
कई बार पीड़िता भय, शर्म या पुलिस तंत्र पर भरोसा नहीं होने के कारण मामला दर्ज करने से पीछे हट जाती है। अक्सर पुलिस तंत्र के अपने कर्मी भी ऐसे अपराधों में लिप्त होते हैं, ऐसे में पुलिस हस्तक्षेप एवं सुरक्षा की मांग करने गई पीड़िता के खिलाफ ही पुलिस तंत्र का होना असामान्य नहीं है। कई बार पुलिस पीड़िता के परिजनों से मामला दर्ज करने के लिए रिश्वत मांगती है। और बलात्कार के मामलों का जो छोटा-सा हिस्सा हमारे देश में दर्ज होता है, उसमें से भी मुश्किल से एक चौथाई अपराधियों को ही वास्तव में सजा मिल पाती है।
निरंकुश शासनों का झुकाव कठोर दंड की ओर होता है, जबकि बहुलतावाद एवं विविध मूल्यों को फैलने देने के प्रति प्रतिबद्ध आधुनिक लोकतंत्र अनिश्चित सामाजिक दुनिया को अधिक न्यायप्रिय बनाना चाहता है, जिसके मूल में कानून के राज की स्थापना का लक्ष्य होता ही है। इस लिहाज से गैंगरेप की घटना की पृष्ठभूमि में पुलिस-प्रशासन और न्याय के पालन में कमी पर टिप्पणी किए बगैर गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए सख्त कानून बनाने के वास्ते तमाम लोगों से सुझाव मानने की पहल मूर्खतापूर्ण ही है।
आज हमारे देश की पुलिस एवं न्याय प्रणाली अनिश्चित है। प्रभावशाली लोग अपराधों से बच निकलते हैं, चाहे बलात्कार हो, हत्या हो या भ्रष्टाचार। लेकिन सामान्य लोग अक्सर फंस जाते हैं या गलत तरीके से दोषी ठहराए जाते हैं। जब तक दोषी खुले में घूमते रहेंगे, समाज सुरक्षित नहीं होगा। ऐसे तंत्र के हाथों में मृत्युदंड का अधिकार सौंपना तात्कालिक तौर पर कुछ लोगों को संतुष्ट कर सकता है, लेकिन यह एक खतरनाक नजीर होगी। मौजूदा व्यवस्था में निर्दोष लोगों के फांसी पर चढ़ने की आशंका ज्यादा है।
न्याय-हत्या अब रोजमर्रा की घटना है। आने वाले दिनों में जब बलात्कार के मामलों के निष्पादन की कम दर पर मीडिया ध्यान केंद्रित करेगा, तो यह विडंबना और ज्यादा दिखेगी। संभव है कि तब पुलिस और कर्मचारियों की कमी से जूझ रही फास्ट-ट्रैक अदालतों पर लंबित मामलों को निपटाने का दबाव पड़े। ऐसी स्थितियों में अक्सर बलात्कार के बाद साक्ष्य जुटाने में शिथिलता बरती जाती है। ऐसे में वे सामान्य लोग दोषी करार दिए जाएंगे, जो अपने कानूनी अधिकारों की रक्षा करने में अक्षम होंगे।
यह एक अलग तरह की नागरिक त्रासदी है, लेकिन जिस संदर्भ में मृत्युदंड की मांग हो रही है, उसे अवश्य समझा जाना चाहिए। एक गंभीर संकट से निपटने के लिए उससे भी गंभीर गलत उपाय ढूंढना तत्काल राजनीतिक रूप से प्रभावी हो, लेकिन यह हमें एक मजबूत या न्यायिक समाज नहीं बना सकता।
उम्मीद करनी चाहिए कि समाज में महिलाओं के प्रति बदसुलूकी को लेकर पैदा आक्रोश अब उत्प्रेरक का काम करेगा। हमें लंबे एवं कठोर कारावास की मांग करनी चाहिए, जिसे लगातार लागू किया जाए। लेकिन जहां तक दंड की बात है, तो हमें समस्या को इतने संकीर्ण नजरिये से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि वैसे में हम न्यायिक संस्थानों की विफलता एवं सार्वजनिक सुरक्षा मुहैया कराने की सरकारी लाचारी की अनदेखी कर देंगे।