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क्या चाहिए, अमेरिका या चीन?

Tue, 01 Jan 2013 11:18 PM IST
सुरेंद्र कुमार (पूर्व राजनयिक)
सुरेंद्र कुमार (पूर्व राजनयिक) Updated Tue, 01 Jan 2013 11:18 PM IST
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what want usa or china

अमेरिका के प्रति कई भारतीयों के पाखंडी एवं दोहरे व्यवहार को केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के मुकाबले प्रभावशाली ढंग से नहीं व्यक्त किया जा सकता। शिकागो विदेश संबंध परिषद के एक सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि 'अक्सर भारतीय चिल्लाकर कहते हैं कि अंकल सैम वापस जाओ, लेकिन फिर फुसफुसाकर कहते हैं, और मुझे भी साथ ले चलो।'

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आपातकाल के बाद कांग्रेस की पराजय के बाद बनी सरकार में एक प्रमुख भारतीय राजनेता, जो दशकों तक सोशलिस्ट इंटरनेशनल के सदस्य रहे और अपनी सभ्य छवि बनाए रखने के लिए खादी का कुरता-पायजामा पहनकर ट्रेड यूनियन हड़ताल के समर्थन में उग्र भाषण देते थे, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री बने।
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उन्हें पूंजीवाद के प्रतीक के रूप में वैश्विक पेय दिग्गजों कोक एवं पेप्सी को भारत से भगाने के लिए याद किया जाता है। इसलिए मैं तब थोड़ा हैरान हुआ, जब वह 2001 में एनडीए सरकार में रक्षा मंत्री के पद पर रहते हुए शिकागो विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से स्नातक करने वाले अपने बेटे के दीक्षांत समारोह में शामिल होने के लिए खास तौर पर वहां पहुंच थे। मुझे हैरानी इस बात को लेकर थी कि क्या अमेरिका अब पूंजीवाद का गढ़ नहीं रहा या वह अब समाजवादी नहीं रहे!'
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शायद वह अपने समय से आगे थे। अमेरिका में आर्थिक मंदी के मद्देनजर वित्त एवं ऑटोमोबाइल क्षेत्र को सहारा देने के लिए राष्ट्रपति ओबामा ने कुछ उपाय किए हैं, जिसे कुछ लोग समाजवाद से प्रेरित कह सकते हैं। दूसरी ओर चीन अब भी साम्यवाद से चिपका हुआ है। पिछले तीन दशकों से वह 'साम्यवादी पूंजीवाद' की नीति पर चल रहा है, जिसके चलते उसने स्पृहणीय आर्थिक विकास किया है।
 
हम बदलाव के दौर में जी रहे हैं। एक राजनीतिक दल, जिसने सत्ता में रहते हुए अमेरिका से बातचीत की पहल की, असैन्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की बात की, लेकिन इस दिशा में अपने बाद वाली सरकार के प्रयासों का सदन में तीव्र विरोध किया। हालांकि जैसा कि विकिलीक्स ने खुलासा किया, उसी पार्टी ने निजी तौर पर अमेरिकी सरकार के प्रतिनिधियों से कहा कि संसद में उसके विरोध को प्रमुखता से नहीं लेना चाहिए।

एक दशक पहले 24 दलों के गठबंधन का नेतृत्व करते हुए उसी पार्टी ने खुदरा क्षेत्र में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव रखा था, जिसे बाद में घटाकर 26 फीसदी किया। लेकिन अब वह खुदरा में एफडीआई को जनविरोधी बता रही है! लेकिन दोतरफा बयान देने और उससे पलटने के एकाधिकार का कोई दावा राजनयिक भी नहीं कर सकते, मुलायम और मायावती, दोनों उन्हें सबक सिखा सकते हैं।

दूसरी ओर, चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। सबसे बड़ा उत्पादक देश, हालांकि उसका उत्पादन थोड़ा घटा है। सबसे बड़ा निर्यातक भी। वह विदेशी मुद्रा भंडार के ढेर पर बैठा है। कोई गिन भी नहीं सकता कि कितने अरब अमेरिकी ट्रेजरी बांड उसके पास हैं। आश्चर्य नहीं कि यूरो जोन के संकट से निपटने के लिए यूरोपीय संघ उसकी वित्तीय मदद चाहता है। उसकी आर्थिक एवं राजनीतिक ताकत एशिया ही नहीं, अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका में तेजी से बढ़ी है।

एशिया के साथ उसका व्यापार अमेरिका और यूरोप के साथ व्यापार से ज्यादा है। नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव में चीन की ताकत का एहसास भारत को हो रहा है। दशकों से पाकिस्तान एवं म्यांमार में उसका बढ़ता प्रभाव एक सचाई है, लेकिन दक्षिण चीन सागर और जापान, वियतनाम, फिलीपींस एवं अन्य देशों के साथ द्वीप व सीमा विवाद को लेकर उसकी आक्रामकता भारत समेत उसके तमाम पड़ोसी देशों के लिए चिंता की बड़ी वजह है।

हमारे प्रधानमंत्री ने पिछले महीने इसका उल्लेख किया था, लेकिन चीन ने इसके उलट भारत एवं वियतनाम, दोनों को दक्षिण चीन सागर  से दूर रहने के लिए एक अस्पष्ट चेतावनी जारी की। क्या भारत अपने बल पर चीन की इस आक्रामकता का जवाब देने में सक्षम है?

चीन भारत के सबसे बड़े व्यापार सहयोगी के रूप में उभरा है, लेकिन वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी नवोन्मेष, अंतरिक्ष अनुसंधान, सुपर टेक्नोलॉजी, अपने बाजार में अधिकाधिक पहुंच, आईटी, कृषि, आधारभूत संरचना, हरित ऊर्जा, शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग एवं अंतरराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय मंचों तथा आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जो मदद अमेरिका कर सकता है, वह चीन नहीं कर सकता। लोकतांत्रिक सरकारें, कानून के राज में विश्वास, मानवाधिकार, बहुधार्मिक, बहुजातीय एवं धर्मनिरपेक्ष समाज-ये ऐसे कारक हैं, जिसके आधार पर अमेरिका चीन से बेहतर है।

भारत को अपनी आपत्तियां छोड़कर अमेरिका के साथ मजबूती से अपना रणनीतिक सहयोग बढ़ाना चाहिए। क्षेत्रफल, आबादी, संसाधन, प्रतिभा, उद्यम कौशल के लिहाज से हमारा देश इतना बड़ा है और हमें अपनी विरासत पर इतना गर्व है कि कोई भी देश पिछलग्गू नहीं बना सकता। फिर भी महाशक्ति देश की ओर से संभावित दबाव के मद्देनजर हमें हर मसले का फैसला अपनी प्रतिभा के बल पर और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर करने का आत्मविश्वास होना चाहिए। इससे अधिक कुछ मायने नहीं रखता।


ठीक है कि ईरान, सीरिया, परमाणु जवाबदेही विधेयक, जलवायु परिवर्तन आदि के मसले पर अमेरिका से हमारे मतभेद हैं। तो क्या हुआ? सबसे पुराना और बड़ा लोकतंत्र हर मसले पर उससे सहमत नहीं हो सकता। ईरान एवं पाकिस्तान के मामले में हमारी धारणा हमारे अपने अनुभवों पर आधारित है। एक सामान्य कदम अमेरिका को भारत में प्रिय बना सकता है- अगर ओबामा की दूसरी पारी में अमेरिका अपने वीटो पावर का इस्तेमाल करते हुए सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्य बनाने का ऐलान कर दे। क्या वे इसके लिए तैयार हैं?

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