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समर्थन मूल्य में नया क्या है
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वी एम सिंह
लाल बहादुर शास्त्री ने खाद्यान्न आयात की निर्भरता कम करने के लिए किसानों से आह्वान किया था कि वे और अधिक खाद्यान्न उगाएं तो किसानों ने आगे बढ़कर इस पर अमल किया था। नतीजतन देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया। लेकिन अधिक उत्पादन होने के कारण किसानों को गेहूं और धान को उत्पादन लागत से कम में बेचना पड़ता था।
किसानों की मदद के लिए केंद्र सरकार को आगे आना पड़ा। उसने बड़ी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करने की व्यवस्था शुरू की और वायदा किया कि यदि बाजार के दाम एमएसपी से कम होंगे, तो सरकारी एजेंसियों के जरिये वह उपज की खरीद करेगी। हालांकि दशकों तक गन्ने को छोड़कर हर तरह की फसलों का बाजार दाम एमएसपी से कम रहा और सिर्फ पांच से छह फीसदी उपज की खरीद ही सरकार ने की। किसानों के पास कम दाम में उपज बेचकर कर्ज का बोझ बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
पिछले साल खरीफ की बड़ी फसलों के लिए किसानों को जो दाम मिले वह इस तरह से थे, धान 1,550 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी के मुकाबले सिर्फ 1,200 रुपये, सोयाबीन 3,050 रुपये एमएसपी के मुकाबले सिर्फ 1,800 रुपये और ज्वार 1,700 रुपये एमएसपी के मुकाबले सिर्फ 1,300 रुपये।
किसान संगठनों ने देशभर में आंदोलन कर स्वामीनाथन कमेटी की समग्र लागत (सी2) पर आधारित सिफारिशों के अनुरूप लाभकारी एमएसपी तय करने की मांग की थी, जिसमें लागत (ए2)+ पारिवारिक श्रम (एफएल)+ जमीन का किराया और ब्याज आदि शामिल हैं। विपक्ष में रहते भाजपा इसके पक्ष में थी। उसने 2014 के अपने घोषणा पत्र में इसका वायदा किया था और नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में इसे दोहराया था। किसानों ने इस उम्मीद में भाजपा को वोट दिए कि वह सी2 के तहत एमएसपी तय करेगी।
बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस वर्ष के लिए खरीफ के लिए जो लागत से पचास फीसदी अधिक का एमएसपी घोषित किया है, वह नई बोतल में पुरानी शराब जैसा है। एमएसपी पर यह फैसला सी2 के आधार पर नहीं, बल्कि सिर्फ ए2 और एफएल के आधार पर लिया गया है। मनमोहन सिंह सरकार ने गेहूं सहित कुछ फसलों के लिए इसी फॉर्मूले से एमएसपी दिया था। मोदी सरकार ने यूपीए द्वारा छोड़ी गई फसलों, जिसमें धान भी शामिल था, ए2+एफएल फॉर्मूले से ही एमएसपी देने की घोषणा की है। यदि इसी फॉर्मूले पर ही चलना था, तो यह घोषणा 2014 में खरीफ फसल के समय से कर देनी चाहिए थी, क्योंकि इस देरी से धान उगाने वाले किसानों को पिछले चार वर्षों में प्रति क्विंटल दो सौ रुपये की दर से प्रति एकड़ करीब बीस हजार रुपये का नुकसान हुआ है।
सरकार इसे बड़ी उपलब्धि बता रही है और कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने अपना चुनावी वायदा पूरा किया है। किसान आंदोलनों और कुछ राज्यों के चुनावों के कारण सरकार को लागत से पचास फीसदी अधिक एमएसपी देने का निर्णय लेना पड़ा। लागत से पचास फीसदी की सीमा तय करने के पीछे लगता है कि सरकार को उपभोक्ताओं की फिक्र है, जिन्हें कीमत बढ़ने से खाद्यान्न के लिए अधिक भुगतान करना पड़ सकता है।
इस खरीफ के लिए एमएसपी की घोषणा देर से तो की ही गई है और यह कम भी है। यही नहीं, यह बजट में की गई वित्त मंत्री की घोषणा से अलग नहीं है। तो फिर प्रधानमंत्री ने कुछ दिनों पहले किसानों से यह क्यों कहा था कि वह कोई ऐतिहासिक फैसला लेने वाले हैं।
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किसानों की मदद के लिए केंद्र सरकार को आगे आना पड़ा। उसने बड़ी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करने की व्यवस्था शुरू की और वायदा किया कि यदि बाजार के दाम एमएसपी से कम होंगे, तो सरकारी एजेंसियों के जरिये वह उपज की खरीद करेगी। हालांकि दशकों तक गन्ने को छोड़कर हर तरह की फसलों का बाजार दाम एमएसपी से कम रहा और सिर्फ पांच से छह फीसदी उपज की खरीद ही सरकार ने की। किसानों के पास कम दाम में उपज बेचकर कर्ज का बोझ बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
पिछले साल खरीफ की बड़ी फसलों के लिए किसानों को जो दाम मिले वह इस तरह से थे, धान 1,550 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी के मुकाबले सिर्फ 1,200 रुपये, सोयाबीन 3,050 रुपये एमएसपी के मुकाबले सिर्फ 1,800 रुपये और ज्वार 1,700 रुपये एमएसपी के मुकाबले सिर्फ 1,300 रुपये।
किसान संगठनों ने देशभर में आंदोलन कर स्वामीनाथन कमेटी की समग्र लागत (सी2) पर आधारित सिफारिशों के अनुरूप लाभकारी एमएसपी तय करने की मांग की थी, जिसमें लागत (ए2)+ पारिवारिक श्रम (एफएल)+ जमीन का किराया और ब्याज आदि शामिल हैं। विपक्ष में रहते भाजपा इसके पक्ष में थी। उसने 2014 के अपने घोषणा पत्र में इसका वायदा किया था और नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में इसे दोहराया था। किसानों ने इस उम्मीद में भाजपा को वोट दिए कि वह सी2 के तहत एमएसपी तय करेगी।
बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस वर्ष के लिए खरीफ के लिए जो लागत से पचास फीसदी अधिक का एमएसपी घोषित किया है, वह नई बोतल में पुरानी शराब जैसा है। एमएसपी पर यह फैसला सी2 के आधार पर नहीं, बल्कि सिर्फ ए2 और एफएल के आधार पर लिया गया है। मनमोहन सिंह सरकार ने गेहूं सहित कुछ फसलों के लिए इसी फॉर्मूले से एमएसपी दिया था। मोदी सरकार ने यूपीए द्वारा छोड़ी गई फसलों, जिसमें धान भी शामिल था, ए2+एफएल फॉर्मूले से ही एमएसपी देने की घोषणा की है। यदि इसी फॉर्मूले पर ही चलना था, तो यह घोषणा 2014 में खरीफ फसल के समय से कर देनी चाहिए थी, क्योंकि इस देरी से धान उगाने वाले किसानों को पिछले चार वर्षों में प्रति क्विंटल दो सौ रुपये की दर से प्रति एकड़ करीब बीस हजार रुपये का नुकसान हुआ है।
सरकार इसे बड़ी उपलब्धि बता रही है और कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने अपना चुनावी वायदा पूरा किया है। किसान आंदोलनों और कुछ राज्यों के चुनावों के कारण सरकार को लागत से पचास फीसदी अधिक एमएसपी देने का निर्णय लेना पड़ा। लागत से पचास फीसदी की सीमा तय करने के पीछे लगता है कि सरकार को उपभोक्ताओं की फिक्र है, जिन्हें कीमत बढ़ने से खाद्यान्न के लिए अधिक भुगतान करना पड़ सकता है।
इस खरीफ के लिए एमएसपी की घोषणा देर से तो की ही गई है और यह कम भी है। यही नहीं, यह बजट में की गई वित्त मंत्री की घोषणा से अलग नहीं है। तो फिर प्रधानमंत्री ने कुछ दिनों पहले किसानों से यह क्यों कहा था कि वह कोई ऐतिहासिक फैसला लेने वाले हैं।