गब्बर क्या जाने लूटपाट का गणित
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गब्बर सिंह आज बहुत उदास है। कालिया और सांभा ने उसका साथ छोड़कर अलग-अलग गैंग बना लिए हैं। दोनों ने बाकायदा प्रेस रिलीज जारी कर साफ कर दिया कि अब वे गब्बर के साथ नहीं हैं। गब्बर के कुनबे में पड़ी इस फूट से रामगढ़वासी खुश हैं। पर गब्बर चिंतित है। उसके लिए डाके डालना अब उतना आसान नहीं रहा। मुकाबले में मोगैंबो, शाकाल जैसे बड़े हाईटेक डॉन हैं। गब्बर की चिंता यह है कि गैंग में विघटन के बाद इतने परम प्रतापी डकैतों का मुकाबला वह कैसे कर पाएगा? उसकी आधी जिंदगी तो रामगढ़ के बीहड़ों में लूटपाट करने और ठाकुर से निपटने में खप गई। जबकि मोगैंबो, शाकाल जैसे शहरी विलेन भले गब्बर जितने बलिष्ठ न रहे हों, मगर हत्या, लूटपाट जैसी विधाओं में वे तकनीकी तौर पर उन्नत रहे हैं। सूचना-प्रौद्योगिकी ने समाज का कुछ भला किया हो या नहीं, अपने समय के खलनायकों का बड़ा भला किया है।
जबकि गब्बर एकदम देसी, गंवई खलनायक है। बात-बात पर खैनी चबाने का शौकीन। जाने कब से दांतों और टूथब्रश की मुलाकात नहीं करा पाया। वह कालिया, सांभा और कुछ निचले दर्जे के डाकुओं के सहारे रामगढ़ में लूटपाट में बिजी रहा और इधर सरकार ने उदारीकरण के जरिये विदेशी कंपनियों को भी लाइसेंस दे दिया। अब गब्बर को कौन समझाए कि लूटपाट जब बंदूक के दम पर होती है, तो वह कानूनन जुर्म होती है और जब लाइसेंस देकर कराई जाती है, तो वह लीगल हो जाती है। ऐसी लूटपाट आर्थिक प्रगति का सूचक भी मानी जाती है। पर गब्बर क्या जाने आर्थिक उदारीकरण का गणित? वह तो रामगढ़ के दीन-हीन गांववालों को अपनी बंदूक का डर दिखाकर अनाज की बोरियां ऐंठकर ही खुश होता रहा।
गब्बर सिंह की असल चिंता कुछ और है। वह सोच रहा है कि साइबर युग में पैदा हुए शहरी लुटेरों का मुकाबला वह कैसे कर पाएगा? उसके पास जो देसी बम हैं, उनसे ज्यादा धमाका तो चाइनीज पटाखे कर डालते हैं। गब्बर सिंह लाचार नजर आ रहा है। तकनीक के विकास ने उसे बेबस बना दिया है।