शहरीकरण पर तैयारी क्या है?
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अगले दो दशकों में भारत की सबसे गंभीर समस्या शहरीकरण को लेकर हो सकती है। विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की तरफ इतनी बड़ी तादाद में लोग पलायन कर रहे हैं कि 2030 तक देश की आधी से ज्यादा आबादी शहरों में रहेगी। इस शहरीकरण के लिए हमारी तैयारी क्या है? पिछले सप्ताह दिल्ली में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के शिखर सम्मेलन में इस पर खूब विचार-विमर्श हुआ और अंत में तय हुआ कि हमारी तैयारी अभी तक न के बराबर है। देश-विदेश से आए विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरफ हमारे राजनेता इसलिए ध्यान नहीं दे रहे हैं, क्योंकि आज भी यह माना जाता है कि भारत कृषि प्रधान देश है। सो वे ग्रामीण समस्याओं की चिंता ज्यादा करते हैं और शहरी समस्याओं की कम। राजनेताओं को यह भी नहीं दिखा है कि चुपके से कितने गांव छोटे शहरों में परिवर्तित होने लग गए हैं।
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इस शहरीकरण के लिए न राजनीतिक दल तैयार हैं और न ही राज्य सरकारें, सो सुनियोजित शहरीकरण के बदले ऐसा अव्यवस्थित शहरीकरण हो रहा है, जो भारत माता को एक विशाल झुग्गी बस्ती में बदल सकता है। कई राज्यों में इसके आसार दिखने लगे हैं। मेरी आदत सड़क के रास्ते भारत दर्शन करने की है, और मैं जहां भी जाती हूं, मुझे ऐसे शहर देखने को मिलते हैं, जो विश्व के किसी अन्य देश में शहर न कहला कर बस्तियां कहलाते। इन नए शहरों में अगर एक भी सुंदर इमारत दिख जाए, तो मैं गनीमत मानती हूं, क्योंकि ज्यादातर बदसूरत, अर्धनिर्मित इमारतें दिखती हैं, जिनके आसपास की तंग गलियों में अक्सर गंदी नालियों और सड़ते कूड़े के ढेर दिखाई देते हैं। जब शहरीकरण की तैयारी इतनी थोड़ी की गई है कि न नगरपालिकाओं को जरूरी अधिकार दिए गए हैं और न ही प्रशासन चलाने के लिए पैसे, तो ऐसा क्यों न हो?
सो नगरपालिकाएं उन सुविधाओं में कैसे निवेश कर पाएंगी, जो सुनियोजित शहरीकरण की बुनियादी ईंटें मानी जाती हैं? नरेंद्र मोदी से पहले देश के किसी प्रधानमंत्री ने शहरीकरण का जिक्र तक नहीं किया था। मोदी ने प्रधानमंत्री बन जाने के बाद कई बार ध्यान दिलाया है कि भारत निकट भविष्य में ग्रामीण देश नहीं रहेगा, और इस परिवर्तन के लिए उन्होंने अपनी स्मार्ट सिटी योजना भी घोषित की थी। पर अभी तक इस योजना का प्रभाव कम ही रहा है। सम्मेलन में अमेरिका से आए एक विशेषज्ञ ने कहा कि परिवर्तन तभी दिखेगा, जब बड़े राजनीतिक दल स्वीकार करेंगे कि उनके मतदाता अब गांवों में नहीं, शहरों और महानगरों में रहने लग गए हैं। वे इस यथार्थ को जब पहचानेंगे, तब यह भी पहचान लेंगे कि प्रशासनिक सुधार लाने होंगे, जिनके द्वारा शहरों का शासन मुख्यमंत्रियों से छीनकर शक्तिशाली महापौरों को दिया जाना चाहिए। विकसित पश्चिमी देशों में तो ऐसा बहुत पहले हो गया था और अब चीन तथा अन्य दक्षिण पूर्व के देशों में भी ऐसा हो गया है। जब तक इस परिवर्तन को भारत के शहरों में नहीं लाया जाएगा, तब तक हमारे शहरों का वही हाल रहेगा, जो आज है। इस परिवर्तन को लाना आसान नहीं होगा, क्योंकि मुख्यमंत्री नहीं चाहेंगे कि उनके अधिकार वहां कम किए जाएं, जहां उनके राज्यों के धनवान रहते हैं। लेकिन इस परिवर्तन को लाने की चर्चा तो शुरू हो जानी चाहिए। विशेष तौर पर ऐसे देश में, जहां हजारों वर्ष पहले ऐसे दौर में मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे विशाल नगर हुआ करते थे, जब बाकी दुनिया में शहरों की कल्पना तक नहीं थी।