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कृषि: गोबर की खाद अपनाने में अड़चन कहां है? आधुनिकता के साथ पारंपरिक तरीके अपनाने की भी जरूरत

Subhash Chandra Kushwaha सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Mon, 10 Mar 2025 06:45 AM IST
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सार
हमें खेती-किसानी के लिए आधुनिक औजारों के साथ-साथ खाद बनाने के परंपरागत तरीकों को अपनाने की जरूरत है।
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What is problem in adopting cow dung manure? There is need to adopt traditional methods along with modernity
गोबर खाद। - फोटो : एजेंसी।

विस्तार

विगत दो दशकों से खेती में रासायनिक खादों पर निर्भरता बढ़ती गई है। रासायनिक खादों के लगातार इस्तेमाल से एक ओर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता खराब होने लगी है, तो दूसरी ओर कृषि लागत लगातार बढ़ती जा रही है। यूरिया, डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) और एमओपी (म्यूरिएट ऑफ पोटाश) के लिए हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं। एमओपी के लिए हम कनाडा, रूस, जॉर्डन, इस्राइल, तुर्कमेनिस्तान और बेलारूस जैसे देशों पर निर्भर हैं।



बेशक हमारे यहां यूरिया की आवश्यकता का अस्सी प्रतिशत उत्पादन होता है, मगर यूरिया बनाने के लिए तरल गैस का आयात कतर, अमेरिका, यूएई और अंगोला से किया जाता है। इन देशों की निर्यात नीतियां हमें प्रभावित करती हैं और यूरिया उत्पादन की लागत बढ़ती जाती है। बीस प्रतिशत यूरिया की कमी पूरी करने के लिए भी हम आयात पर निर्भर हैं। डीएपी की अत्यधिक कीमत और कमी से विगत कई वर्षों से किसान परेशान हैं। यूक्रेन युद्ध के कारण भी इस समस्या में वृद्धि हुई है।


कृषि वैज्ञानिकों ने आयातित रासायनिक खादों के विकल्प के तौर पर अमोनियम फॉस्फेट सल्फेट (एपीएस) जैसे उर्वरकों को बढ़ावा देने की रणनीति तैयार की है, जिसकी कीमत बेशक डीएपी से कम है, मगर इतनी भी कम नहीं है कि उस नीति से बहुत ज्यादा लाभ मिल सके। एपीएस खाद में 20 प्रतिशत नाइट्रोजन, 20 प्रतिशत फॉस्फोरस, शून्य प्रतिशत पोटाश और 13 प्रतिशत सल्फर होता है। एपीएस खाद, रॉक फॉस्फेट और सल्फ्यूरिक एसिड से तैयार की जाती है, जिससे फॉस्फोरिक एसिड की बचत होती है। यह खाद तिलहन, दलहन, मक्का, कपास, प्याज, मिर्च जैसी फसलों के लिए उपयुक्त है, मगर गेहूं, धान और गन्ने के लिए अब भी डीएपी का विकल्प, एपीएस नहीं है। वैज्ञानिक कुछ फसलों के लिए ही एपीएस को डीएपी के विकल्प के रूप में तैयार कर रहे हैं।

ऐसे समय में, गोबर खाद और जैविक खादों को गांव-गांव में व्यापक स्तर पर तैयार करने के लिए एक नीति और अभियान की जरूरत महसूस की जा रही है। हमारी अवैज्ञानिक कृषि नीतियों के कारण गांवों से पशुओं की संख्या घटती गई है। क्रय-विक्रय की अड़चनों ने भी पशुपालन को हतोत्साहित किया है। पशुओं के कम होने से गोबर का उत्पादन कम हुआ है। खेती-किसानी से युवा वर्ग के पलायन के कारण भी गोबर खाद के उत्पादन के प्रति लोग लापरवाह हुए हैं। उसकी कमी को पूरा करने के लिए ही किसान रासायनिक खादों पर निर्भर होते गए हैं, लेकिन लगातार रासायनिक खादों के इस्तेमाल से मिट्टी के बंजर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। गोबर खाद और जैविक खाद तैयार होने में समय जरूर लेती है, मगर वह पूरी तरह से खेती और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता के लिए बेहतर है। इसलिए गोबर और जैविक खादों को तैयार करने के लिए सरकारी ग्राम सभा स्तर पर कृषि यंत्रों को उपलब्ध कराने की जरूरत है, जिससे हर खेत में फसलों के डंठलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर गड्ढों में थोड़ी-सी गोबर घोल और जानवरों के मूत्र छिड़ककर मिट्टी में दबा दिया जाए। इन गड्ढों में गोबर के साथ पशुओं के बिछावन, भूसा और घास-फूस को भी डाला जा सकता है।

हर फसल के समय अगर हम ऐसा करने लगेंगे, तो एक साल बाद, गड्ढों से सड़ी हुई गोबर और जैविक खाद मिलने लगेगी, जो उसी खेत को न केवल उर्वरक बनाएगी, बल्कि रासायनिक खादों पर हमारी निर्भरता कम करती जाएगी। इस प्रक्रिया से खेतों में फसलों के डंठलों को जलाने की जरूरत न पड़ेगी। हम बिना अतिरिक्त लागत के देसी खाद तैयार करेंगे और पर्यावरण को भी दूषित होने से बचाएंगे। साथ ही साथ एमओपी और यूरिया जैसे उच्च पोषक तत्व वाले उर्वरकों की खपत को सीमित करने में मदद मिलेगी।

यह कोई नई विधि नहीं है। पहले किसान मात्र गोबर खाद से ही खेती करते थे। हरित क्रांति के बाद, रासायनिक खादों का इस्तेमाल बढ़ा और कृषि मशीनों के इस्तेमाल के बाद हमने जानवरों को पालना कम कर दिया। हमें खेती-किसानी के लिए आधुनिक औजारों के साथ-साथ खाद बनाने के परंपरागत तरीकों को अपनाने की जरूरत है। पेड़ों के पत्ते, फसलों और सब्जियों के अवशेषों से जैविक खाद बनाने के लिए आगे आना चाहिए।

इसके साथ ही साथ गाय और भैंस पालन, उनके आवागमन और बिक्री में अड़चनंे खत्म कर, गोबर का उत्पादन बढ़ाने और उसे खाद के रूप में इस्तेमाल करने को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आना चाहिए। उर्वरकों की आयात निर्भरता कम करने और किसानों को संतुलित उर्वरकों के उपयोग के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहिए।

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