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सौ दिन के संकल्प का क्या हुआ? 

Tue, 14 Jan 2014 07:46 PM IST
अनुराग दीक्षित
अनुराग दीक्षित Updated Tue, 14 Jan 2014 07:46 PM IST
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What about Promissing hundred days?

संप्रग सरकार के पास अगले चुनाव से पहले बहुत वक्त नहीं बचा है। मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने को है और आम चुनाव से पहले लगता है कि संसद का एक ही सत्र हो पाएगा। 2009 में इस लोकसभा के गठन के बाद से ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तनातनी रही है, मगर पिछले पूरे वर्ष भर कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो संवादहीनता की स्थिति ही रही। वस्तुतः विपक्ष घोटालों और सीबीआई की स्वायत्तता को लेकर सरकार को घेरे रहा। मगर तमाम विरोध के बावजूद महिला सुरक्षा संबधी विधेयक, लोकपाल विधेयक, गेम चेंजर माने जाने वाले खाद्य सुरक्षा विधेयक एवं भूमि अधिग्रहण विधेयक जैसे कई विधेयक पारित करवाने में संप्रग सरकार सफल हो गई। यही नहीं, जेल से चुनाव न लड़ने संबंधी सर्वोच्च अदालत के फैसले को पलटने वाले विधेयक पर भी संसद की मंजूरी मिल गई।

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मगर हकीकत यह है कि 100 दिन संसद चलाने का संकल्प पिछले वर्ष भी भुला दिया गया। संसद जितने दिन चली, दुर्भाग्यवश उसमें भी रिकॉर्ड हंगामा ही हुआ। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष को गंभीर टिप्पणियां करनी पड़ीं। सांसदों को निलंबित किया गया, लेकिन जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं दिख सका।
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अब वर्ष 2014 में संसद के सामने ढेरों चुनौतियों के बीच 126 अहम विधेयक लंबित हैं। इनमें से 72 लोकसभा, जबकि 54 राज्यसभा में हैं। मसलन, देश की आधी आबादी को विधायिका में 33 फीसदी हिस्सेदारी देने संबधी महिला आरक्षण विधेयक पर राजनीतिक ईमानदारी नजर ही नहीं आती है। तभी तो वर्ष 2010 में राज्यसभा में जैसे-तैसे मुहर लगने के बाद यह विधेयक आज तक लोकसभा में नहीं आ सका है। आरक्षण के भीतर आरक्षण का राजनीतिक सुझाव इसे पटरी से उतारता रहा है।
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वैसे वर्ष 2014 में अर्थव्यवस्था को भी पटरी पर लाना बड़ी चुनौती होगा। खासकर तब, जबकि आर्थिक सुधार से जुड़े कई विधेयक राजनीतिक असहमति और राज्यों के विरोध के चलते वर्षों से कानून बनने की बाट जोह रहे हैं। मसलन, जीएसटी विधेयक वर्ष 2011 में पेश हो जाने के बाद आज भी लंबित है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, जीएसटी लागू होने भर से विकास दर में दो फीसदी का इजाफा संभव है। उधर, वित्त मंत्रियों के बदलने पर डीटीसी विधेयक का मसौदा जरूर बदला जाता रहा हो, पर 2010 में एक सदन में पेश हो जाने के बाद इसकी किसी ने सुध नहीं ली है। नागरिकों को समयबद्व सेवाओं के प्रावधान वाले सिटिजन चार्टर विधेयक को कुछ राज्यों ने भले ही लागू कर दिया हो, लेकिन केंद्र के स्तर पर यह वर्ष 2011 में सिर्फ पेश ही हो सका है। इसके अभाव में लोकपाल को भी अप्रभावी बताया जाता रहा है। भ्रष्टाचार विरोधी व्हिसल ब्लोअर विधेयक लोकसभा में पारित हो जाने के बाद करीब दो वर्षों से राज्यसभा में लंबित है।

दरअसल कम बैठकों के बीच यह लंबी सूची दर्शाती है कि माननीय अपने बुनियादी काम भूल रहे हैं। अब नई राजनीतिक चुनौती बनी ‘आप’ के दबाव में ही सही, वर्ष 2014 में कम से कम इन भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों पर मुहर लग जानी चाहिए। खासकर तब, जबकि भ्रष्टाचार और महंगाई अक्सर बड़े चुनावी मुददे रहे हैं। वैसे चुनाव से पहले तेलंगाना का हल निकलना भी मुश्किल ही लगता है। उधर, सर्वोच्च अदालत के राजनीतिक सुधार से जुड़े कई फैसलों के बाद कुछ सकारात्मक बदलाव की उम्मीद की जानी चाहिए। जनप्रतिनिधियों को भी अब समझना होगा कि मतदाता जागरूक हो रहा है, साथ ही, भ्रष्टाचार के मामलों में सदस्यता गंवाते और जेल जाते माननीयों से संसद की छवि धूमिल हो रही है। ऐसे में वर्ष 2014 में सांसदों पर यकीनन काफी दबाव होगा।


लिहाजा देखना होगा कि हमारे ‘माननीय’ संसद के प्रति कितना जबावदेह रह सकेंगे? वैसे तो बैठकों की संख्या बढ़कर 100 दिन होने और हंगामे में कमी आने की संभावना कम ही नजर आती है। फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि मौजूदा हालात में सांसद अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा सकेंगे। सत्ता और प्रतिपक्ष की संवादहीनता कम हो सकेगी। वैसे भी जनता सिर्फ उम्मीद ही तो कर सकती है।

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