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पंचायत: बंगाल में चुनाव जीतने का हिंसक मॉडल, आयुक्त के पक्षपाती फैसलों पर लोग चिंतित

Wed, 05 Jul 2023 07:30 AM IST
Bimal Rai बिमल राय
Updated Wed, 05 Jul 2023 07:30 AM IST
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सार
राज्य में पंचायत चुनाव को लेकर हिंसा जारी है और राज्य चुनाव आयुक्त जिस तरह से पक्षपाती फैसले ले रहे हैं, उससे एक बड़ी आबादी चिंतित है।
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West bengal Panchayat polls new model of winning elections with violence people worried over SEC decisions
बंगाल चुनाव - फोटो : पीटीआई

विस्तार

पश्चिम बंगाल में हो रहे पंचायत चुनावों में एक बार फिर सत्ता के लिए किसी भी हद तक जाने का रक्तपाती रिवाज दोहराया जा रहा है। लोग इसके लिए वामपंथी शासन के जमाने या उसके पहले सिद्धार्थ शंकर राय के जमाने तक की मिसालें भी पेश करते हैं, पर वे शायद हिंसक वारदातों का सही अनुपात निकालने में भूल कर बैठते हैं। उस समय भी विपक्ष को कमजोर करने या पंगु बनाकर रखने का छिटपुट इरादा जरूर था, पर उसे जीरो पर आउट करार देने का नशा नहीं था।



पंचायत चुनावों में केंद्रीय बलों की तैनाती के कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सरकार और चुनाव आयोग, दोनों सुप्रीम कोर्ट गए और उन्हें चोट खाकर वापस हाईकोर्ट की शरण में आना पड़ा। चालाकी देखिये कि अदालत की अवमानना से बचने का विफल प्रयास करते हुए राज्य चुनाव आयुक्त राजीव सिन्हा ने राज्य के 22 जिलों के लिए 22 कंपनी केंद्रीय बल बुलाने की बात कही। इस पर हाईकोर्ट ने लताड़ लगाई। यहां तक कह दिया कि अगर आप हमारे आदेशों को नहीं लागू कर सकते हैं, तो पद छोड़ दें। अदालत ने तत्कालीन चुनाव आयुक्त मीरा पांडे का नाम लिए बिना कहा कि 2013 के पंचायत चुनावों में जितनी संख्या में बलों की तैनाती हुई थी, उससे ज्यादा फोर्स मंगवाने का आवेदन करें। मालूम हो कि उस समय 825 कंपनी केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बलों की तैनाती हुई थी। इसीलिए कहा जा रहा है कि एक वह चुनाव आयुक्त थीं, जो शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए शीर्ष अदालत तक गईं और आज एक ऐसा चुनाव आयुक्त है, जो पद की गरिमा को ताक पर रखकर केंद्रीय बलों की तैनाती रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट गया। राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने तो 21 जून को और कड़ा कदम उठाते हुए ज्वाइनिंग रिपोर्ट को लौटा दिया। अब एक नई सांविधानिक बहस छिड़ी कि एक बार नियुक्त करने के बाद राज्यपाल क्या चुनाव आयुक्त को हटा सकते हैं।


इस बार के चुनावों में पुलिस, कैडर, प्रखंड विकास अधिकारी और राज्य चुनाव आयुक्त इस जनादेश हरण की योजना कार्यान्वित करते दिन दहाड़े पकड़े गए हैं। नहीं तो केंद्रीय बलों को रोकने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाने की क्या जरूरत थी? क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चाहतीं है कि खून-खराबा हो?

आठ जून को राजीव सिन्हा राज्य चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए और उसी दिन शाम को उन्होंने पंचायत चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी। कायदे से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्ष की राय लेने के बाद घोषणा करनी चाहिए थी। 2018 के चुनावों में तृणमूल 34 प्रतिशत सीटों पर निर्विरोध जीत गई थी। चस्का लगा था, तो सरकार की सारी इकाइयां कमर कसकर तैयार हो गईं। हालत यह है कि अब तक 15 लाशें गिर चुकी हैं, दर्जनों लोग घायल हुए। एक कानूनी जंग हाईकोर्ट में चल रही है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य के सात संवेदनशील जिलों में 48 घंटों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती का आदेश दिया।

इतना कुछ होने के बाद भी 63 हजार से कुछ ज्यादा पंचायतों में से केवल 10 प्रतिशत सीटें ही तृणमूल निविरोध जीतने में कामयाब हुई है। इनमें सबसे बड़ा आंकड़ा-893 वीरभूम जिले का है, जिसके प्रभारी तिहाड़ जेल में बंद अणुव्रत मंडल हुआ करते थे। केंद्रीय जांच एजेंसियों के कसते शिकंजे और खिसकते जनाधार से पैदा अवसाद मुख्यमंत्री ममता के असंतुलित बयानों में झलक रहा है। अभी कुछ दिन पहले उन्होंने चुनावी सभा में कहा कि तृणमूल नहीं रहेगी, तो हर महीने 500 और 1000 का लक्ष्मी भंडार कौन देगा?

पंचायत चुनावों घोषणा तब हुई, जब ओडिशा की दुर्भाग्यजनक ट्रेन दुर्घटना में 288 से ज्यादा लोग मारे गए, जिसमें अकेले बंगाल के 81 यात्री थे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के विशालकाय नेताजी इनडोर स्टेडियम में एक जलसा बुलाकर मृतकों के परिजनों को सहायता राशि दी, जबकि यह राशि घर-घर जाकर देनी चाहिए थी।

चुनावी हिंसा के लिए कभी बदनाम रहे यूपी-बिहार में किसी नए बुद्ध ने अवतार लेकर शांति नहीं बहाल की। वहां के नए शासकों ने पुलिस व सरकारी अफसरों का राजनीतिक इस्तेमाल न कर अपराधियों में कानून का भय पैदा किया। पश्चिम बंगाल में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? हिंसा पर रोक क्यों नहीं लग सकती?

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