कुओं से बुझ सकती है प्यास
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बुंदेलखंड की प्यास, पलायन, अल्प वर्षा अब किसी की संवेदना को जागृत नहीं करती। सभी मान बैठे हैं कि यह इस इलाके की नियति है। होली बीतते-बीतते गांव के गांव खाली हो जाएंगे। कई हजार करोड़ का बुंदेलखंड विशेष पैकेज यहां के कंठ तर नहीं कर पाया। एक दशक के दौरान तीन बार उम्मीद से कम मेघ बरसना बुंदेलखंड की सदियों की परंपरा रही है। यहां के पारंपरिक कुएं, तालाब और पहाड़ कभी समाज को इंद्र की बेरुखी के सामने झुकने नहीं देते थे। समझना होगा कि इस क्षेत्र की प्यास का हल किन्हीं बड़ी परियोजनाओं में नहीं है, इसका स्थायी समाधान पारंपरिक जल स्रोतों को स्थानीय स्तर पर सहेजने में ही है। खासकर मजरे-गांव- मुहल्लों की प्यास की कुंजी उन कुओं के पास ही है, जिन्हें समाज नल से घर तक पानी आने की आस में नष्ट कर चुका है।
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बुंदेलखंड की असली समस्या अल्प वर्षा नहीं है, वह तो यहां सदियों, पीढ़ियों से होती आई है। बड़े करीने से यहां के आदि-समाज ने बूंदों को बचाना सीखा था। दो तरह के तालाब- एक केवल पीने के लिए, दूसरे केवल मवेशी और सिंचाई के लिए होते थे। पहाड़ की गोदी में बस्ती और पहाड़ की तलहटी में तालाब। तालाब के इर्द-गिर्द कुएं, ताकि समाज को जितनी जरूरत हो, उतना पानी खींच कर इस्तेमाल कर ले। छठे दशक तक इस अंचल में 60 हजार से ज्यादा कुएं और कोई 25 हजार छोटे-बड़े तालाब हुआ करते थे। बुंदेलखंड की पुश्तों पुरानी परंपरा रही है कि घर में बच्चे का जन्म हो या फिर नई दुल्हन आए, घर-मुहल्ले के कुंए की पूजा की जाती है। जिस इलाके में जल की कीमत जान से ज्यादा हो, वहां अपने घर के इस्तेमाल का पानी देने वाले कुएं को मान देना तो बनता ही है। बीते तीन दशकों के दौरान भले ही प्यास बढ़ी हो, लेकिन सरकारी व्यवस्था ने घर में नलकूप का ऐसा प्रकोप बरपाया कि कुएं गुम होने लगे। यह सभी जानते हैं कि बुंदेलखंड की जमीन की गहराई में ग्रेनाइट जैसे कठोर चट्टानों का बसेरा है और इसे चीर कर भूजल निकालना लगभग नामुमकिन। असल में यहां स्थापित अधिकांश हैंडपंप बरसात के सीपेज जल पर टिके हैं, जोकि गरमी आते सूखने लगते हैं।
छतरपुर जिला मुख्यालय के पुराना महोबा नाके की छोटी तलैया के आसपास वर्ष 90 तक दस से ज्यादा कुएं होते थे। पुराने नाके के सामने का एक कुआं लगभग दो सौ साल पुराना है। पतली ककैया ईंटों व चूने की लिपाई वाले इस कुएं के पानी का इस्तेमाल पूरा समाज करता था। विभिन्न मुहल्लों के कुओं में सालभर पानी रहता था और समाज सरकार के भरोसे पानी के लिए नहीं बैठता था। ठीक यही हाल टीकमगढ़, पन्ना और दमोह के थे।
बांदा शहर में तो अब भी 67 कुएं जिंदा है। इस शहर के मुहल्लों के नाम कुओं पर ही थे, जैसे- राजा का कुआं, कुन्ना कुआं आदि। 2018 में वहां जिला प्रशासन ने 470 पंचायतों में जनता के सहयोग से कुओं को जिंदा करने का एक कार्यक्रम चलाया था और उसका सकारात्मक असर पिछले साल यहां दिखा भी। वहीं इलाके के सैकड़ों कुएं ऐसे भी हैं, जहां यदि किसी ने कूद कर आत्महत्या कर ली तो समाज ने उसे मिट्टी से भर कर समाप्त कर दिया। झांसी के खंडेराव गेट के शीतला मंदिर की पंचकुईयां में आज भी सैकड़ों मोटरें पड़ी हैं, जो यहां के कई सौ परिवारों के पानी का साधन हैं। ये कुएं कभी सूखे नहीं।
छतरपुर में ही कोई पांच सौ पुराने कुएं इस अवस्था में हैं कि उन्हें कुछ हजार रुपये खर्च कर जिंदा किया जा सकता है। यदि बुंदेलखंड के सभी कुओं का अलग से सर्वेक्षण करा कर उन्हें पुनर्जीवित करने की एक योजना शुरू की जाए, तो यह बहुत कम कीमत पर जन भागीदारी के साथ हर घर को पर्याप्त पानी देने का सफल प्रयोग हो सकता है।