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नई दोस्ती का स्वागत है

Mon, 10 Jul 2017 10:21 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Mon, 10 Jul 2017 10:21 AM IST
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Welcome of this new friendship
तवलीन सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्राइल में देखकर अच्छा लगा। इसलिए नहीं कि उनका यह दौरा अति सफल रहा। केवल इसलिए भी नहीं कि उनकी यात्रा से इतिहास रचा गया, क्योंकि वह इस्राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। ऐसा नहीं है कि ये दोनों तथ्य महत्वपू्र्ण नहीं हैं। लेकिन इनसे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस्राइल जाकर नरेंद्र मोदी ने साबित किया है कि भारत की विदेश नीति अब भावनाओं पर नहीं, भारत के हित पर निर्भर है। हम इस्राइल से दोस्ती इसलिए नहीं कर सकते थे, क्योंकि जवाहरलाल नेहरू की दृष्टि में इस्राइल का निर्माण गलत था। उनकी राय में इस्राइल बनाने से फलस्तीन के साथ अन्याय हुआ था। भारत ने अरब देशों को दोस्त और इस्राइल को दुश्मन माना। अरब देशों ने कभी भारत का साथ नहीं दिया, लेकिन हम उनके तलवे चाटते रहे।
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मुझे 1983 के गुटनिरपेक्ष देशों का वह सम्मेलन याद है, जिसमें भाग लेने के लिए यासर अराफात और फिदेल कास्त्रो दिल्ली आए थे। इंदिरा गांधी से वे दोनों ऐसे गले मिले थे, जैसे कोई पुराना रिश्तेदार बहुत दिनों बाद मिला हो। जबकि कास्त्रो तानाशाह थे और अराफात साबित कर चुके थे कि उनके जीवित रहते हुए इस्राइल के साथ कभी कोई समझौता नहीं होगा। भारत के लिए गुटनिरपेक्षता धोखा थी, क्योंकि पर्दे के पीछे हम पूर्व सोवियत संघ के इतने करीब थे कि हमने अफगानिस्तान पर सोवियत हमले को भी सही ठहराया। राजीव गांधी को सोवियत संघ की शक्ति पर इतना विश्वास था कि सद्दाम हुसैन ने जब कुवैत पर आक्रमण किया और उसके बाद अमेरिका ने इराक से युद्ध लड़ा, तो राजीव गांधी युद्ध रोकने की आशा लेकर मास्को पहुंचे। राजीव गांधी उस समय  प्रधानमंत्री नहीं थे, फिर भी इस आधार पर विदेश नीति में भावुक होकर हस्तक्षेप करने का प्रयास करते रहे कि उनके नाना के दौर में जो विदेश नीति तय हुई थी, उसे बदलना महापाप है।
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सच तो यह है कि विदेश नीति में परिवर्तन की गुंजाइश हमेशा होनी चाहिए। जब हालात बदलते हैं, तब नीति भी बदलनी चाहिए। पर भारत में ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि आजादी के बाद कांग्रेस का राज ज्यादा रहा है। इस्राइल जाने से पहले प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका गए थे और उनका वह दौरा इतना सफल रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि आश्वासन देता हूं कि व्हाइट हाउस में आपका एक दोस्त है। इस दोस्ती की भारत को इन दिनों विशेष आवश्यकता है, क्योंकि चीन फिर साबित करने की कोशिश कर रहा है कि हिंदी-चीनी भाई-भाई न कभी थे, न होंगे। इस्राइल के साथ दोस्ती भारत के हित में इसलिए है, क्योंकि  कई क्षेत्रों में यह छोटा-सा देश दुनिया के अन्य देशों से कहीं ज्यादा आगे निकल चुका है।
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सिंचाई के नए तरीकों से इस्राइल ने रेगिस्तान को हरा-भरा करके दिखाया है। भारत के किसानों को इससे बहुत लाभ हो सकता है। इस्राइल से हमें गंगा की सफाई में भी सहायता मिलने वाली है और सुरक्षा मामलों में भी। इस्राइल की तरह भारत भी एक ऐसे पड़ोस में रहने को मजबूर है, जहां चारों तरफ अशांति और अराजकता का माहौल है। इस नए दोस्त की मदद से संभव है कि हम इन हानिकारक ताकतों का मुकाबला कर सकें। इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मोदी का स्वागत करते हुए कहा था, 'सत्तर वर्षों से आपका स्वागत करने की प्रतीक्षा में थे हम।’ हमारे प्रधानमंत्री देर से इस्राइल गए, लेकिन दुरुस्त गए। इस नई दोस्ती का स्वागत है।
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