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अपनी लड़ाई हमें खुद लड़नी होगी

Mon, 27 Nov 2017 08:36 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Mon, 27 Nov 2017 08:36 AM IST
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We must fight ourselves
हाफिज सईद

मुंबई हमलों के मास्टरमांइड और जमात-उद-दावा के प्रमुख आतंकी सरगना हाफिज सईद को पाकिस्तान ने दस महीने की नजरबंदी के बाद रिहा कर दिया। इससे आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की पाकिस्तान की प्रतिबद्धता की पोल खुल गई है और दुनिया के सामने उसका असली चेहरा उजागर हो गया है। हमारी सरकार ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए अपना विरोध जताया है। यह कौन भूल सकता है कि हाफिज सईद मुंबई हमले का प्रमुख साजिशकर्ता है। सईद की रिहाई से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई कि पाकिस्तानी हुकूमत आतंकवाद के दोषी व्यक्तियों और संगठनों को सजा दिलाने के प्रति थोड़ा भी गंभीर नहीं है और वहां की व्यवस्था आतंकियों को बचाती है। भारत ने पाकिस्तान सरकार से अंतरराष्ट्रीय दायित्व के तहत हाफिज सईद के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने की मांग फिर दोहराई है।


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भारत ही नहीं, दुनिया भर में पाकिस्तान के इस कुकृत्य के खिलाफ नाराजगी है और अमेरिका ने तो बाकायदा बयान जारी कर कहा है कि हाफिज की रिहाई के बाद पाक को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद खराब संदेश गया है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से लड़ने की पाक की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठने लगे हैं। पाकिस्तान ने कहा था कि वह अपनी जमीन पर आतंकवाद को पनपने नहीं देगा, लेकिन हाफिज की रिहाई के बाद पाक का असली चेहरा फिर उजागर हुआ है। अमेरिका ने पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए कहा है कि पाकिस्तान को इसका अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। यही नहीं, अमेरिका ने तो यहां तक कहा कि अगर पाकिस्तान ने जल्द से जल्द हाफिज सईद को गिरफ्तार कर आरोपित नहीं किया, तो इसका अमेरिका एवं पाकिस्तान के रिश्तों पर भी असर पड़ेगा।

स्पष्ट है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पाकिस्तान के प्रति नजरिया पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तुलना में थोड़ा सख्त है। बराक ओबामा और उनके कुछ अधिकारी पाकिस्तान के प्रति नरम रवैया रखते थे और पाकिस्तान को थोड़ी ढील मिली हुई थी। लेकिन ट्रंप के रवैये से ऐसा नहीं लगता। वह आतंकवाद के खिलाफ काफी सख्त हैं, इसलिए उनसे थोड़ी उम्मीद की जा सकती है। लेकिन सवाल उठता है कि अगर पाकिस्तान ने हाफिज सईद को शीघ्र गिरफ्तार नहीं किया, तो अमेरिका किस तरह के सख्त कदम उठाएगा। उसने किस तरह के अंजाम भुगतने की चेतावनी पाकिस्तान को दी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। अमेरिका की कथनी और करनी में कितना तालमेल रहता है, यह देखने वाली बात होगी। हम इसकी उम्मीद तो नहीं कर सकते कि जिस तरह की कार्रवाई अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ की थी, वैसी कोई कार्रवाई वह हाफिज सईद के खिलाफ करेगा। भले ही अमेरिका हाफिज सईद को एक खतरनाक आतंकवादी मानता है, लेकिन उसे ओसामा के जैसा अपना उतना बड़ा दुश्मन नहीं मानता। सईद के खिलाफ अमेरिका ने एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा है, लेकिन आज तक उसका कुछ नहीं हुआ।

ओसामा बिन लादेन अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन था, जिसने अमेरिकी नागरिकों की जान ली थी। उसके खिलाफ कार्रवाई को अपने नागरिकों के सामने सही साबित करने के लिए अमेरिका के पास पर्याप्त कारण थे। पर सईद जितना भारत को नुकसान पहुंचाता है, उतना अमेरिका को नहीं।

अमेरिका को हाफिज सईद से ज्यादा गुस्सा हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ है। हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तानी सेना की तरह से पर्याप्त समर्थन मिलता है। इसलिए हक्कानी नेटवर्क का खात्मा तभी होगा, जब पाकिस्तानी सेना उसकी मदद करना बंद करे। हक्कानी नेटवर्क और पाकिस्तानी सेना के रिश्ते को खत्म करने के लिए अमेरिका को पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी हुकूमत की दुम मरोड़नी पड़ेगी। इसके लिए अमेरिका को अपनी वित्तीय सहायता में कटौती करनी पड़ेगी, जिस पर पाकिस्तानी सेना ऐश करती है। इसके साथ पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के बच्चे और परिजन, जो अमेरिका में शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधा हासिल करने के लिए जाते हैं, उस पर रोक लगानी पड़ेगी। इसी तरह पाक सैन्य अधिकारियों के अमेरिका व विभिन्न देशों के बैंकों में जो पैसे जमा हैं, उसे भी फ्रीज करने की कोशिश करनी चाहिए, अन्यथा उस पर असर नहीं पड़ने वाला।

लेकिन भारत को यह नहीं समझना चाहिए कि हमारी लड़ाई अमेरिका लड़ेगा। अमेरिका वही करेगा, जो उसके अपने हित में होगा, वह कभी भी हमारी लड़ाई नहीं लड़ेगा। हमें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी पड़ेगी। हाफिज सईद की रिहाई के बाद पाकिस्तान के खिलाफ जो अंतरराष्ट्रीय माहौल बन रहा है, उसका फायदा उठाते हुए हमें और मुखर होकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के कारनामों को उजागर करना चाहिए और हरेक देश से कहना चाहिए कि वह पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करे, क्योंकि वह आतंकी संगठनों को पनाह देता है। संयुक्त राष्ट्र में हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान के खिलाफ बहुत अच्छा भाषण दिया था, लेकिन अब जरूरत है कि हम हरेक देश की राजधानी में जाकर पाकिस्तान के खिलाफ अपनी आवाज मुखर करें और उन देशों से दो टूक पूछें कि वे पाकिस्तान के साथ हैं या भारत के साथ। भारत को खुद भी यह तय करना होगा कि हमारे लिए देश और अपने नागरिकों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है या आर्थिक उन्नति। जाहिर है, आर्थिक फायदे के लिए हम अपने देश की सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकते। अमेरिका और चीन जैसे बड़े देशों को भी हमारे बाजार की जरूरत है, इसलिए हम उन पर सख्ती से दबाव बना सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या हमारे देश के राजनेताओं में इसको लेकर मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति है। अब तक तो इसका परिचय नहीं मिला है। जब तक दूसरे देशों पर आतंकवाद के खात्मे के लिए सख्त दबाव बनाने की मजबूत इच्छाशक्ति हमारे पास नहीं होगी, तब तक पाकिस्तान पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा।

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