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हम साफ शहरों के सपने नहीं देखते
तवलीन सिंह
Updated Tue, 28 May 2013 03:09 PM IST
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जब भी मैं भारत माता की कल्पना किसी विदेशी शहर में बैठकर करती हूं, तब उसके ऐसे पहलू दिखने लगते हैं, जो हमारे अपने शहर में रहते हुए नहीं दिखते। इस सप्ताह मैं इस्तांबुल में हूं, जो दुनिया का इकलौता ऐसा शहर है, जिसका आधा हिस्सा एशिया में है और आधा यूरोप में।
मैं यूरोप में यह लेख लिख रही हूं, लेकिन होटल की खिड़की से बोसफोरस दरिया के उस पार एशिया देख सकती हूं। कल जब घूमने निकली थी इस्तांबुल की गलियों में, तो हर गली में दिखी यहां की मिली-जुली सभ्यता।
जिस गली में मेरा होटल है, उसमें मिठाई और कबाब की ऐसी दुकानें हैं, जो याद दिलाती हैं एशिया की, और उनकी बगल में हैं वैसे कैफे, जो यूरोप के शहरों में दिखते हैं। इनकी मेजें बाहर फुटपाथ पर रखी जाती हैं, जहां तुर्की महिलाएं सिगरेट खुलेआम पीते हुए दिखती हैं यूरोपीय लिबास में। साथ-साथ दिखती हैं हिजाब पहनी हुई महिलाएं और कुछ ऐसी भी, जो पूरे बुर्कों में ढकी हैं।
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तो कौन से हैं वे पहलू भारत के, जो यहां आने के बाद दिखे हैं मुझे? एक तो हमारे शहरों की गंदगी, जो मुख्य वजह है कई बीमारियों के फैलने की, लेकिन जिसकी परवाह न हमारे शासकों को है, न हमको। फिक्सिंग के मामले छाए हैं मीडिया में। लेकिन मुंबई की झुग्गी-बस्तियों में अनेक बच्चे मरते हैं गंदगी की वजह से। न तो मीडिया वालों में इसकी चिंता दिखी है, न नगरपालिका के अफसरों में।
आम नागरिक को तो हमसे भी कम चिंता है। अगर उनसे पूछा जाए गंदगी के बारे में, तो अक्सर जवाब मिलता है, शहर है भाई, इतनी आबादी जब होती है, तो गंदगी तो होती ही होगी। हमारे शासकों से गंदगी के बारे में पूछा जाए, तो मिलता है वही गरीब देश वाला बहाना।
अब सुनिए, इस्तांबुल पहुंचने के बाद मेरा पहला अनुभव। हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही मेरी टैक्सी अटक गई एक ऐसे जाम में, जो मैंने कभी मुंबई में भी नहीं देखा है। हम एक घंटा जब अटके रहे जाम में, तो टैक्सीवाले ने शहर की अंदरूनी गलियों में से निकालने की कोशिश की। सो हुआ यह कि हम एक ऐसे इलाके में जा पहुंचे, जहां गुरबत साफ जाहिर थी। वहां बेहाल बच्चे गलियों में खेल रहे थे, झुग्गीनुमा टूटे-फूटे मकान थे और साफ दिखता था कि यहां पर ऐसे लोग बसे हुए हैं, जो मजदूरी करके बमुश्किल अपना गुजारा करते हैं।
लेकिन खास बात मुझे यह दिखी कि इतनी गरीबी के बावजूद गलियां साफ थीं। नहीं थे सड़ते कूड़े के वे ढेर, जो हमारे शहरों में जगह-जगह दिखते हैं। नहीं थी गंदे शौचालय की बदबू। न ही मुझे दिखे अपने शहरों के वे घिनौने नजारे, जिनमें छोटे बच्चे कूड़े के ढेरों में से खाना ढूंढते हुए दिखते हैं।
कहने का मेरा मतलब यह है कि जरूरी नहीं है कि भारत के शहर गंदे हों। जब चांद तक पहुंचने के सपने हमारे शासक देख सकते हैं, तो साफ शहरों के सपने क्यों नहीं देख सकते? अगर एटम बम बना सकते हैं हम, तो गंगा-यमुना जैसी नदियों को साफ क्यों नहीं कर सकते?
इस्तांबुल की खासियत है बोसफोरस का साफ, चमकता हुआ पानी। यही भूमिका दिल्ली शहर में यमुना नदी अदा कर सकती है, अगर हम उसको साफ करने की कोशिश करें। यही भूमिका गंगा जी की हो सकती है वाराणसी और कोलकाता जैसे शहरों में। समस्या यह है कि ऐसे मुद्दों को न हमारे नेताओं ने अहमियत दी, न हम पत्रकारों ने और न ही आम लोगों ने।
हम उलझे रहते हैं सनसनीखेज खबरों में, जो कुछ क्षणों में ही अपनी अहमियत खो बैठते हैं। हम इतने उलझे रहते हैं कि भूल जाते हैं उन चीजों को, जिन पर निर्भर है किसी देश का स्वास्थ्य, उसका चरित्र, उसका भविष्य और दुनिया के नजरों में उसकी छवि। ऐसा भी नहीं है कि हमारे राजनेता जानते नहीं हैं कि भारत के शहरों में जितनी गंदगी दिखती है, वह अफ्रीका के गरीब देशों में भी नहीं दिखती है आज।
गर्मियां शुरू होते ही शुरू हो जाते हैं हमारे मंत्रियों और सांसदों के विदेशी दौरे। जनता के पैसों पर खूब सैर करके आते हैं विदेशों में। वास्तव में कुछ सीखने के इरादे से जाते अगर वे, तो उनको बहुत कुछ सीखने को मिलता। ज्यादा कष्ट उठाने की भी जरूरत नहीं है, बस जरूरी है आंखें खोलकर देखने की।
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मैं यूरोप में यह लेख लिख रही हूं, लेकिन होटल की खिड़की से बोसफोरस दरिया के उस पार एशिया देख सकती हूं। कल जब घूमने निकली थी इस्तांबुल की गलियों में, तो हर गली में दिखी यहां की मिली-जुली सभ्यता।
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जिस गली में मेरा होटल है, उसमें मिठाई और कबाब की ऐसी दुकानें हैं, जो याद दिलाती हैं एशिया की, और उनकी बगल में हैं वैसे कैफे, जो यूरोप के शहरों में दिखते हैं। इनकी मेजें बाहर फुटपाथ पर रखी जाती हैं, जहां तुर्की महिलाएं सिगरेट खुलेआम पीते हुए दिखती हैं यूरोपीय लिबास में। साथ-साथ दिखती हैं हिजाब पहनी हुई महिलाएं और कुछ ऐसी भी, जो पूरे बुर्कों में ढकी हैं।
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तो कौन से हैं वे पहलू भारत के, जो यहां आने के बाद दिखे हैं मुझे? एक तो हमारे शहरों की गंदगी, जो मुख्य वजह है कई बीमारियों के फैलने की, लेकिन जिसकी परवाह न हमारे शासकों को है, न हमको। फिक्सिंग के मामले छाए हैं मीडिया में। लेकिन मुंबई की झुग्गी-बस्तियों में अनेक बच्चे मरते हैं गंदगी की वजह से। न तो मीडिया वालों में इसकी चिंता दिखी है, न नगरपालिका के अफसरों में।
आम नागरिक को तो हमसे भी कम चिंता है। अगर उनसे पूछा जाए गंदगी के बारे में, तो अक्सर जवाब मिलता है, शहर है भाई, इतनी आबादी जब होती है, तो गंदगी तो होती ही होगी। हमारे शासकों से गंदगी के बारे में पूछा जाए, तो मिलता है वही गरीब देश वाला बहाना।
अब सुनिए, इस्तांबुल पहुंचने के बाद मेरा पहला अनुभव। हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही मेरी टैक्सी अटक गई एक ऐसे जाम में, जो मैंने कभी मुंबई में भी नहीं देखा है। हम एक घंटा जब अटके रहे जाम में, तो टैक्सीवाले ने शहर की अंदरूनी गलियों में से निकालने की कोशिश की। सो हुआ यह कि हम एक ऐसे इलाके में जा पहुंचे, जहां गुरबत साफ जाहिर थी। वहां बेहाल बच्चे गलियों में खेल रहे थे, झुग्गीनुमा टूटे-फूटे मकान थे और साफ दिखता था कि यहां पर ऐसे लोग बसे हुए हैं, जो मजदूरी करके बमुश्किल अपना गुजारा करते हैं।
लेकिन खास बात मुझे यह दिखी कि इतनी गरीबी के बावजूद गलियां साफ थीं। नहीं थे सड़ते कूड़े के वे ढेर, जो हमारे शहरों में जगह-जगह दिखते हैं। नहीं थी गंदे शौचालय की बदबू। न ही मुझे दिखे अपने शहरों के वे घिनौने नजारे, जिनमें छोटे बच्चे कूड़े के ढेरों में से खाना ढूंढते हुए दिखते हैं।
कहने का मेरा मतलब यह है कि जरूरी नहीं है कि भारत के शहर गंदे हों। जब चांद तक पहुंचने के सपने हमारे शासक देख सकते हैं, तो साफ शहरों के सपने क्यों नहीं देख सकते? अगर एटम बम बना सकते हैं हम, तो गंगा-यमुना जैसी नदियों को साफ क्यों नहीं कर सकते?
इस्तांबुल की खासियत है बोसफोरस का साफ, चमकता हुआ पानी। यही भूमिका दिल्ली शहर में यमुना नदी अदा कर सकती है, अगर हम उसको साफ करने की कोशिश करें। यही भूमिका गंगा जी की हो सकती है वाराणसी और कोलकाता जैसे शहरों में। समस्या यह है कि ऐसे मुद्दों को न हमारे नेताओं ने अहमियत दी, न हम पत्रकारों ने और न ही आम लोगों ने।
हम उलझे रहते हैं सनसनीखेज खबरों में, जो कुछ क्षणों में ही अपनी अहमियत खो बैठते हैं। हम इतने उलझे रहते हैं कि भूल जाते हैं उन चीजों को, जिन पर निर्भर है किसी देश का स्वास्थ्य, उसका चरित्र, उसका भविष्य और दुनिया के नजरों में उसकी छवि। ऐसा भी नहीं है कि हमारे राजनेता जानते नहीं हैं कि भारत के शहरों में जितनी गंदगी दिखती है, वह अफ्रीका के गरीब देशों में भी नहीं दिखती है आज।
गर्मियां शुरू होते ही शुरू हो जाते हैं हमारे मंत्रियों और सांसदों के विदेशी दौरे। जनता के पैसों पर खूब सैर करके आते हैं विदेशों में। वास्तव में कुछ सीखने के इरादे से जाते अगर वे, तो उनको बहुत कुछ सीखने को मिलता। ज्यादा कष्ट उठाने की भी जरूरत नहीं है, बस जरूरी है आंखें खोलकर देखने की।