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चीन से सबक ले सकते हैं हम

Thu, 25 Jan 2018 06:54 PM IST
mohandas pai मोहनदास
Updated Thu, 25 Jan 2018 06:54 PM IST
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भारत और चीन दोनों ने ही युद्ध और उथल-पुथल का लंबा दौर देखने के बाद 1950 में अपनी अर्थव्यवस्था का नए सिरे से निर्माण शुरू किया था। दोनों ही स्वतंत्र देश थे, एक कम्युनिस्ट और दूसरा लोकतांत्रिक। भारत कहीं अधिक व्यवस्थित रूप में था और अपेक्षाकृत परिष्कृत अर्थव्यवस्था के साथ एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था। चीन ने उथल-पुथल भरा रास्ता चुना और विध्वंसक सांस्कृतिक क्रांति और ग्रेट लीप फॉरवर्ड (चीन की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के औद्योगिकीकरण की पहल) के जरिये आगे बढ़ा।


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1978 में माओ की मौत के बाद चीन की अर्थव्यवस्था आबादी के बोझ और गरीबी से जूझ रही थी। भारत ने अपने पूंजीवादी इतिहास से मुंह मोड़ते हुए राज्य के नियंत्रण वाली समाजवादी अर्थव्यवस्था को अपनाया। चीन की विकास दर औसतन 3.2 फीसदी की दर से और आबादी 2.5 फीसदी की दर से आगे बढ़ी, वहीं इसने देखा कि जापान, जर्मनी और भारत किस चमत्कारिक ढंग से आगे बढ़ रहे हैं। सरकारी नियंत्रण, बढ़ते भ्रष्टाचार और बढ़ते नागरिक असंतोष से इसकी स्थिति और बदतर होने लगी।
 
1978 में चीन ने विदेशी पूंजी को आमंत्रित किया और अपने तटीय क्षेत्रों को इसने निवेश के लिए खोल दिया, कृषि को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया, एक बच्चे की नीति अपना ली और आधारभूत ढांचे में निवेश किया। आज चीन 12.5 खरब डॉलर के साथ दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है। वहीं भारत ने आर्थिक संकट के बाद 1991 में आर्थिक सुधार किए और अपना बाजार खोला और 8.8 फीसदी की विकास दर के साथ आगे बढ़ा। भारत की अर्थव्यवस्था आज 2.5 खरब डॉलर की हो चुकी है, मगर अब भी वह चीन से काफी पीछे है। चीन की इस तरक्की में भारत के लिए क्या सबक निहित हैं? चीन ने सबसे पहले श्रम आधारिक उद्योगों मसलन कपड़ा, खिलौने, हल्के इंजीनियरिंग के सामान आदि में निवेश किया, ताकि इसके श्रमिकों की बड़ी फौज को रोजगार मिल सके। इसने विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए और तटीय जिलों के लिए कारोबार संबंधी कानून बनाए। बड़ी संख्या में रोजगार बढ़ने से खपत बढ़ी, जिससे संसाधनों का निर्माण बढ़ा और कर संग्रह में वृद्धि से ढांचागत निवेश बढ़ा। चीन ने विकेंद्रीकृत आर्थिक मॉडल को अपनाया, जहां प्रांत कई आर्थिक फैसले ले सकते हैं, प्रोत्साहन दे सकते हैं और बिना किसी लाल फीताशाही के उद्योगों को बढ़ावा दे सकते हैं। मुख्य लक्ष्य है रोजगार सृजन। चीन ने कौशल विकास और विश्वविद्यालयों में भारी निवेश किया है। इसने कई नए शहरों का निर्माण किया है और शहरीकरण को बढ़ावा दिया है, जिससे उसे काफी फायदा हुआ। चीन ने जल्द ही 1.5 खरब डॉलर विदेशी निवेश आकर्षित किया और दुनिया की फैक्टरी बन गया। चीन दुनिया का सबसे बड़ा आयातक और निर्यातक है।

भारत ने प्रोत्साहनों और कर सब्सिडी के जरिये पूंजीगत उद्योगों को प्रोत्साहित किया और रोजगार सृजन को हतोत्साहित किया। आज उद्योगों को 25 फीसदी का कॉरपोरेट टैक्स देना होता है और सर्विस सेक्टर को तीस फीसदी। इसकी श्रम नीति रोजगार सृजन में रोड़े अटकाती है। विगत पच्चीस वर्षों में इसके श्रम आधारित उद्योगों में वैश्विक रूप से गिरावट आई है। भारत आधारभूत संरचना में पर्याप्त निवेश नहीं करता, यह जीडीपी का महज 4.7 फीसदी है, जबकि चीन 6.5 फीसदी निवेश करता है। नतीजतन भारत की आपूर्ति शृंखला की लागत जीडीपी के 14 फीसदी के बराबर है, जबकि चीन की सिर्फ छह फीसदी। जीएसटी से कुछ सुधार होगा, मगर आधारभूत संरचना में भारी निवेश की जरूरत है। चीन की सफलता से भारत बहुत कुछ सीख सकता है। 

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