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जल संरक्षण: धरती बचाने का अभियान... लोगों की अपनी और लोगों के लिए लाई गई क्रांति है वाटरशेड विकास घटक योजना

Shivraj singh chouhan शिवराज सिंह चौहान
Updated Wed, 20 Aug 2025 06:55 AM IST
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सार
वाटरशेड विकास घटक योजना, सिर्फ सरकारी योजना न होकर लोगों की अपनी और लोगों के लिए लाई गई एक क्रांति है।
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Water Conservation campaign to save earth Watershed Development Component Scheme revolution by the people
वाटरशेड विकास घटक योजना (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

आज बिगड़ते पर्यावरण के चलते कई जगह भूजल का स्तर डेढ़ हजार फुट नीचे तक चला गया है। अगर हमारी उपजाऊ मिट्टी इसी तरह बहती रही और जमीन बंजर होती रही, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसा होगा? इसी दूरदर्शी सोच और भविष्य की चिंता को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने एक बीड़ा उठाया है।



भारत सरकार का भूमि संसाधन विभाग, ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ के तहत ‘वाटरशेड विकास घटक (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई)’ को पूरे देश में लागू कर रहा है, लेकिन यह काम अकेले सरकार नहीं कर सकती। इस महायज्ञ में सरकार के साथ समाज को भी खड़ा होना होगा।


यह योजना विशेष रूप से उन क्षेत्रों में लागू की जा रही है, जो सूखे और वर्षा पर निर्भर हैं और इन इलाकों में बसे हमारे किसान भाई-बहनों के जीवन में समृद्धि लाने का एक महाभियान है, जहां कभी पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करना पड़ता था।

कई लोग मुझसे पूछते हैं कि आखिर यह वाटरशेड योजना है क्या? मैं उन्हें सरल भाषा में बताता हूं कि यह केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि लोगों की अपनी, लोगों के लिए लाई गई एक क्रांति है। इस योजना का मूलमंत्र है-‘खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में।’ इसके तहत हम सब मिलकर खेतों की मेड़ें मजबूत करते हैं, खेत में ही छोटे तालाब बनाते हैं, और छोटे-छोटे नालों पर चेक डैम जैसी जल-संरचनाएं खड़ी करते हैं।

इससे बारिश का पानी बहकर बेकार नहीं जाता, बल्कि धीरे-धीरे धरती की प्यास बुझाता है, जिससे भूजल का स्तर बढ़ता है और मिट्टी में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। इस योजना की सबसे बड़ी शक्ति इसकी जन-भागीदारी है। गांव के लोग खुद बैठकर यह तय करते हैं कि तालाब कहां खोदना है, मेड़ कहां बनानी है और पेड़ कहां लगाने हैं। भूमिहीन परिवारों और महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को भी मुर्गी पालन और मधुमक्खी पालन जैसे कामों से जोड़कर उनकी आमदनी बढ़ाने का काम किया जा रहा है।

इस योजना के बहुत सुखद परिणाम मिल रहे हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ हमारे किसान भाई-बहनों को मिला है, जिनकी आमदनी में आठ फीसदी से लेकर 70 फीसदी तक की ठोस वृद्धि हुई है। यह इसलिए संभव हुआ है, क्योंकि 2015 से अब तक, सरकार ने 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च करके देश भर में 6,382 से अधिक परियोजनाएं चलाई हैं और लगभग तीन करोड़ हेक्टेयर भूमि को फिर से उपजाऊ बनाने का काम किया है।

मध्य प्रदेश के झाबुआ में, जहां कभी सूखा एक बड़ी समस्या थी, आज आदिवासी गांवों में पानी भरपूर है और मिट्टी की उर्वरक शक्ति भी बढ़ गई है। परियोजना क्षेत्र के 22 गांवों में भूजल स्तर एक मीटर तक बढ़ गया है। किसान भाई बताते हैं कि गांव में चेक डैम बनने से अब वे मक्का के साथ-साथ चने की फसल भी ले रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी 50 से  60 हजार रुपये तक बढ़ गई है। झाबुआ की ही परवलिया पंचायत में 12 खेतों में बने खेत तालाबों से किसानों की आमदनी एक लाख से डेढ़ लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक बढ़ी है। इस योजना के तहत नौ लाख से ज्यादा चेक डैम, रिसाव तालाब, खेत तालाब, जैसी वाटरशेड संरचनाएं बनी हैं। 5.6 करोड़ से ज्यादा श्रम दिवस उपलब्ध हुए हैं, जिससे ग्रामीण रोजगार में वृद्धि हुई है। वाटरशेड विकास परियोजनाओं के लागू होने से गांवों में उल्लेखनीय बदलाव आया है।

राजस्थान के बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी इलाके में, जहां पानी की कमी किसानों को पलायन करने पर मजबूर कर रही थी, आज अनार की खेती से हरियाली लौट आई है। योजना के अंतर्गत 120 से अधिक किसानों को अनार के पौधे उपलब्ध कराए गए, जो वहां की बालू मिट्टी और सीमित पानी जैसी कठिन परिस्थितियों में भी आसानी से पनप जाते हैं। अनार की खेती ने न केवल आमदनी बढ़ाई, बल्कि बूड़ीवाड़ा गांव के मांगीलाल परांगी का कहना है कि उनके जैसे किसान अब अरंडी की खेती छोड़कर बागवानी की ओर बढ़ गए हैं।

हमने इस योजना में तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया है। ‘भुवन जियोपोर्टल (सृष्टि)’ और ‘दृष्टि’ मोबाइल एप जैसे डिजिटल उपकरणों से योजनाओं की प्रगति की सटीक निगरानी हो रही है। सैटेलाइट से मिले आंकड़े बताते हैं कि फसल क्षेत्र में लगभग दस लाख हेक्टेयर और जल स्रोतों के क्षेत्र में 1.5 लाख हेक्टेयर का इजाफा हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि 8.4 लाख हेक्टेयर से ज्यादा बंजर जमीन अब फिर से खेती के योग्य बन चुकी है। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, यह हमारे किसानों की मेहनत और उनके बेहतर भविष्य की जीती-जागती कहानी है।

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