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हंगामे में गुम होती आवाजें

Fri, 16 Dec 2016 08:19 PM IST
manisha priyam मनीषा प्रियम
Updated Fri, 16 Dec 2016 08:19 PM IST
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Voices are lost in the din
मनीषा प्रियम

संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले विगत आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता के साथ सीधा संवाद किया था। उस संवाद के जरिये उन्होंने अर्थनीति से संबंधित एक महत्वपूर्ण घोषणा की थी। यों तो यह अर्थनीति देश के केंद्रीय बैंक के दायरे में आती है, लेकिन प्रधानमंत्री ने राष्ट्रहित में इस फैसले की नितांत आवश्यकता का ब्योरा देते हुए सीधे संवाद के जरिये बताया कि हमारे देश में जिस तरह से काले धन का उत्पादन और प्रसार हो रहा है, वह देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन चुका है। जिस समय प्रधानमंत्री ने यह उद्घोषणा की, उस समय संसद का सत्र नहीं चल रहा था, लेकिन ऐसा लगता है कि इसकी जरूरत कुछ इतनी जल्दी की थी कि उन्होंने संसद के शीत सत्र शुरू होने का भी इंतजार नहीं किया, जबकि शीत सत्र शुरू होने में बहुत कम दिन रह गए थे। इस घोषणा के वक्त यह आम सहमति थी कि काले धन के खिलाफ सरकार और जनता एकजुट होकर लड़ाई लड़ें। लेकिन जमीनी स्तर पर इस नीति के क्रियान्वित होते-होते ही भयानक दिक्कतें सामने आने लगीं। बैंकों और एटीएम के सामने लंबी-लंबी कतारें लगने लगीं। लोगों के पास नकदी का भारी अभाव हो गया। छोटे और मंझोले उद्योग-धंधे तो ठप हुए ही, व्यवसाय पर भी बुरा असर पड़ा। गौरतलब है कि हमारे देश में एक बड़ी आबादी के पास न तो बैंक खाते हैं और न ही पुराने नोटों को बदले जाने का कोई अन्य सीधा साधन। बहुत से दिहाड़ी मजदूरों को काम मिलना बंद हो गया और कई घंटे कतार में खड़े रहने के कारण बहुत से लोगों की मौत हो गई।


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ऐसे में, यह अपेक्षा थी कि संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार के इस फैसले की उचित आलोचना होगी और हमारे जनप्रतिनिधि संसद में इस पर गहन चर्चा करेंगे। यही नहीं, देश के नागरिकों को सरकार के इस फैसले के कारण जिस तरह भयानक संकट का सामना करना पड़ा, जनप्रतिनिधि संसद के जरिये सरकार को उससे जरूर अवगत कराएंगे। लेकिन अफसोस कि संवाद का माहौल बन ही नहीं पाया और संसद का पूरा शीत सत्र यों ही बेकार चला गया। आशा थी कि सरकार को उसकी विफलता या त्रुटियों का आईना दिखाने का काम संसद के जरिये होगा, लेकिन हुआ ठीक इसके उल्टा।

विपक्ष का सारा राजनीतिक आयोजन संसद के बाहर किया गया। जिस तरह नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए अपना कद्दावर तेवर दिखाते थे, ठीक वैसा ही तेवर इस बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिखाया। ऐसा लगा कि उन्होंने विपक्ष की ओर से सरकारी नीति के विरोध की बागडोर अपने हाथों में ले ली है। सत्र चलने के बावजूद संसद के बाहर आर्थिक मुद्दे पर संघीय प्रणाली का घमासान युद्ध लड़ा जाने लगा, लेकिन संसद में कोई कामकाज नहीं हो सका।

अब आम जनता को यह कत्तई समझ नहीं आया कि जहां राज्यसभा में कांग्रेस के आनंद शर्मा और गुलाम नबी आजाद बोले, बसपा की बहन मायावती बोलीं, माकपा नेता सीताराम येचुरी बोले, जदयू नेता शरद यादव बोले, तो आखिर क्या बात थी कि संसद में चर्चा एक ढर्रे पर नहीं हो पाई। यही नहीं, कुछ दिनों के अंतराल में स्वयं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस नीति को एक 'ऐतिहासिक विफलता' की संज्ञा दी। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार के इस फैसले से गरीबों पर दोहरी मार पड़ेगी। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि इस नीति से देश के सकल घरेलू उत्पाद में दो फीसदी की कमी आ सकती है। गौरतलब बात यह है कि मनमोहन सिंह रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और देश के वित्त मंत्री रह चुके हैं।

यहां यह स्पष्ट नहीं हुआ कि जब राज्यसभा में इतने भाषण दिए जा सकते थे, तो फिर संसद चल क्यों नहीं पाई? यह सवाल उठाए जाने पर बार-बार यह दोहराया गया कि विपक्ष एक ऐसे नियम के तहत संसद में चर्चा करना चाहता है, जिसमें चर्चा के बाद मतदान कराए जाने का प्रावधान है। नरेंद्र मोदी की सरकार को लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त ही है, तो उसे मतदान से क्या डर! और राज्यसभा में तो उसकी आलोचना हो ही रही थी। लोकतंत्र में किसी सरकार को आलोचना से क्यों डरना चाहिए? लोकतंत्र में आलोचना नागरिक संवाद बनाने का एक जरिया भी है, तो ऐसे में मतदान के प्रावधान वाले नियम के तहत ही चर्चा कराने में सरकार को क्या समस्या थी?

सबसे बड़ा शिगूफा यह रहा कि सत्र समाप्त होने के दो दिन पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि उनके पास स्वयं प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार से संबंधित कोई जानकारी है, जो वह संसद के पटल पर रखना चाहते हैं। जनता को यह समझ में नहीं आया कि अगर उनके पास ऐसी कोई जानकारी है, तो वह उसे संसद के बाहर क्यों बता रहे हैं, उसे वह लोकसभा के पटल पर रख क्यों नहीं आए। देश के हित या अहित के बारे में इतनी बड़ी जानकारी देश के सबसे पुराने और प्रमुख विपक्षी पार्टी के नेता के हाथ में हो और वह उसे सार्वजनिक करने से कतरा जाए, तो इससे बड़ी अफसोस की बात क्या होगी?

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर कोई विपक्षी गठबंधन तो अभी उभर नहीं रहा है। इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस जैसी क्षेत्रीय पार्टियां अपने बूते जितना विरोध कर सकती थीं, उसने किया, लेकिन पूरा विपक्ष लामबंद नहीं दिखा। चाहें तो इसे विपक्ष की विफलता कह सकते हैं या क्षेत्रीय दलों की सीमा। इस पूरे प्रकरण से जनता यह समझ नहीं पाई कि विपक्ष आखिर चाहता क्या है! संसद में जितना महत्वपूर्ण है सत्ता पक्ष का होना, उतना ही महत्वपूर्ण है अच्छे विपक्ष का होना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संसद के बाहर विभिन्न जगहों पर इस विषय पर तो बोले, लेकिन संसद में उपस्थित रहने के बावजूद उन्होंने इस पर कुछ नहीं बोला। ऐसे में जनता के सामने अपनी परेशानी को संसद के सामने रखने का क्या विकल्प बचता है? यह भारतीय संसदीय प्रणाली की विफलता ही है कि इतने महत्वपूर्ण फैसले पर संसद चर्चा नहीं कर पाई। यह सांसदों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे जनता की आवाज को संसद में उठाएं। विपक्ष और सत्ता पक्ष, दोनों की जिम्मदारी थी कि वे संसद को चलने देते।

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