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पाकिस्तान में हिंदी की हत्या

Thu, 13 Aug 2020 08:06 AM IST
vivek shukla विवेक शुक्ला
Updated Thu, 13 Aug 2020 08:06 AM IST
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vivek shukla opinon, hindi ending in pakistan
पाकिस्तान का झंडा - फोटो : Social media

यशपाल, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, देवेंद्र सत्यार्थी, उपेंद्रनाथ अश्क, नरेंद्र कोहली समेत हिंदी के दर्जनों लेखक बंटवारे से पहले मौजूदा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के स्कूलों-कॉलेजों में हिंदी सीख चुके थे या उन्होंने अपना रचनाकर्म शुरू कर दिया था। लाहौर में 1947 तक कई हिंदी प्रकाशन सक्रिय थे, जिनमें राजपाल ऐंड संस खास था। हिंदी के प्रसार-प्रचार के लिए कई संस्थाएं प्रतिबद्धता के साथ जुटी हुई थीं, जिनमें धर्मपुरा स्थित हिंदी प्रचारिणी सभा के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान के दुनिया के मानचित्र में आते ही हिंदी शत्रु की जुबान हो गई। हिंदी के प्रकाशन बंद हो गए। बेशक पंजाब में तब उर्दू और पंजाबी का वर्चस्व था।


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पर हिंदी ने अपने लिए जगह बनाई हुई थी।लाहौर से आर्य गजट, प्रकाश  तथा अमर भारत नाम से हिंदी के अखबार प्रकाशित हो रहे थे, जिनकी प्रसार संख्या हजारों में थी। बंटवारे के बाद वहां के स्कूलों-कॉलेजों में हिंदी की कक्षाएं लगनी समाप्त हो गईं। वर्ना लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज, फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज, खालसा कॉलेज, दयाल सिंह कॉलेज, डीएवी वगैरह में हिंदी की स्नातकोत्तर स्तर तक की पढ़ाई की व्यवस्था थी। पंजाब के ही रावलपिंडी में डीएवी तथा गॉर्डन कॉलेज में भी हिंदी पढ़ी-पढ़ाई जा रही थी।

वहां रहकर ही बलराज साहनी, भीष्म साहनी तथा आनंद बख्शी ने हिंदी जानी-समझी थी। सिंध की राजधानी कराची, बलूचिस्तान और  पाकिस्तान के शेषभागों में भी हिंदी पढ़ी-लिखी जा रही थी। कराची यूनिवर्सिटी का हिंदी विभाग भी काफी समृद्ध हुआ करता था। यह बात समझ से परे है कि पाकिस्तान के निर्माण के साथ ही हिंदी को समाप्त करने के लिए चले अभियान पर अभी तक गहराई से अध्ययन क्यों नहीं हुआ? पाकिस्तान में भाषा को लेकर सरकारी नीति प्रारंभ से ही बेहद तर्कहीन रही।

हां उर्दू को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला, जो वहां की मिट्टी की जुबान ही नहीं थी। इससे पाकिस्तान को आगे चलकर बड़ा नुकसान हुआ। भाषा के सवाल पर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) की अनदेखी पाकिस्तान के दो-फाड़ होने की मुख्य वजह रही।

अब पंजाब प्रांत में पंजाबी की अनदेखी के सवाल पर आंदोलन चल रहा है। पंजाब विधानसभा तक में पंजाबी में संवाद पर निषेध है। पाकिस्तान में हिंदी को फलने-फूलने देने के सारे रास्ते बंद कर देने के बावजूद वह अपने लिए जगह बना रही है। हिंदी फिल्मों और भारतीय टीवी सीरियलों के चलते हिंदी के दर्जनों शब्द आम पाकिस्तानी की आम बोलचाल चाल में शामिल हो गए हैं। उनकी जुबान में अब जन्मतिथि, भूमि, विवाद, अटूट, विश्वास,

आशीर्वाद, चर्चा, पत्नी, शांति जैसे शब्द सुने जा सकते हैं। इसकी एक वजह यह है कि खाड़ी देशों में लाखों भारतीय-पाकिस्तानी एक साथ काम कर रहे हैं। दुबई, अबूधावी, रियाद, शारजहां जैसे शहरों में हजारों पाकिस्तानी भारतीय कारोबारियों की कंपनियों, होटलों, रेस्तरां वगैरह में काम कर रहे हैं। इसके चलते वे हिंदी के अनेक शब्द सीख लेते हैं। भारतीय समाज और संस्कृति को और अधिक गहनता से जानने की इच्छा के कारण भी अनेक पाकिस्तानी इंटरनेट के माध्यम से हिंदी सीख रहे हैं। सिंध प्रांत और उसकी राजधानी कराची में हिंदुओं की ठीक-ठाक आबादी है।

हालांकि पाकिस्तान के हिंदुओं की मातृभाषा हिंदी नहीं है और वहां हिंदी अध्यापन की व्यवस्था भी नहीं है। इसके बावजूद हिंदी से उनका भावनात्मक जुड़ाव है और खासकर मध्यवर्गीय हिंदू तो हिंदी सीखते ही हैं। उनमें अपने धर्मग्रंथों को हिंदी में पढ़ने की लालसा रहती है। सिंध और कराची में रहने वाले हिंदू सिंधी के माध्यम से हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से इस्लामाबाद स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी आफ मॉडर्न लैंग्वेज (एनयूएमएल) में हिंदी की कक्षाएं शुरू हुई हैं।

वहां हिंदी में डिप्लोमा कोर्स से लेकर पीएच.डी. तक करने की सुविधा है और इसके लिए कुल पांचmप्राध्यापक हैं। पर उसमें गिनती के ही छात्र दाखिला लेते हैं। जाहिर है, पाकिस्तान में हिंदी के प्रति छिटपुट कोशिशें चाहे हों, पर वहां हिंदी अब पहले वाली स्थिति में तो नहीं आ सकती।

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