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नए समय के आंदोलन: विरोध-प्रदर्शन की आड़ में बढ़ती अराजकता लोकतंत्र के लिए खतरा
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विस्तार
देश फिर आंदोलन की चपेट में है। पहले तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग थी, तो अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के। पिछले आंदोलन में जंतर-मंतर से निकलकर हजारों की संख्या में पुलिस बैरिकेड तोड़ते हुए समूह उग्र तेवर के साथ संसद भवन तक पहुंच गया था। पुलिस के सामने संसद भवन की सुरक्षा की चुनौती थी।यह स्थिति पहली बार नहीं हुई है। हाल के वर्षों में सारे आंदोलनों में अराजक हिंसा के दृश्य हमने देखे हैं। कृषि कानूनों को लेकर धरना और आंदोलन इतना अराजक व हिंसक हुआ कि प्रदर्शनकारी लाल किले पर चढ़ गए, तिरंगा उतारकर दूसरा झंडा लगा दिया। हालिया जंतर-मंतर आंदोलन में भी पुलिस की गाड़ियों को उलटना, तोड़ना, घेरकर पीटना और पत्थरबाजी भी प्रदर्शन के भाग थे। अग्निवीर योजना के विरुद्ध हुए आंदोलन में भी जबर्दस्त हिंसा हुई। मसलन, बिहार में कुछ नेताओं के घरों पर हमले हुए, ट्रेन, बस और थाने तक जले। क्या आंदोलनों का यह चरित्र डराता नहीं है? देश का दुर्भाग्य है कि राजनीतिक दलों में भी दूरदृष्टि, विवेक और देश के भविष्य को ध्यान में रखकर सोचने वालों की संख्या बेहद कम है। जो हैं भी, वे अक्सर पार्टी में प्रभावी भूमिका में नहीं हैं। इसलिए, पार्टियां या तो मौन रहतीं हैं या सिर्फ दमन और अत्याचार जैसे मुहावरों का उपयोग कर छुट्टी पा लेती हैं।
वास्तव में हम एक ऐसे डरावने दौर में हैं, जहां से जितना आगे बढ़ेंगे, उतना अनर्थ होगा। लोकतंत्र में किसी को भी धरना-प्रदर्शन और आंदोलन करने का अधिकार है। सत्ता अथवा किसी स्तर पर कोई फैसला या कार्रवाई जनविरोधी या अन्यायपूर्ण है, तो उसके प्रतिकार का रास्ता हमें अतीत से अहिंसक आंदोलनों के रूप में मिला है। लेकिन, इनकी मर्यादा और गरिमा रही है। आजकल सभी महात्मा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण (जेपी) का नाम लेते हैं। तिरंगा और संविधान लहराते हैं, पर क्या गांधीजी की भाषा का मर्म आत्मसात करते हैं? जयप्रकाश जी ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध छात्र आंदोलन के नेतृत्व का दायित्व लिया, तो छात्र नेताओं से लिखवाया कि वे हिंसा न करने के साथ अभद्र और उग्र भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे। गांधीजी ने चौरी-चौरा घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था।
जयप्रकाश जी ने नारा भी दिया था-‘चाहे चले लाठी-गोलियां, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’ इन महापुरुषों के लिए साध्य और साधन, दोनों की पवित्रता सर्वोच्च मायने रखती थी। आज तो भाषा में हिंसा, उग्रता और अभद्रता स्पष्ट दिखती है। जैसे नारे लगते हैं या पोस्टर दिखाए जाते हैं, वैसी भाषा व उग्रता अकल्पनीय है। वास्तविक आंदोलनकारी-सत्याग्रही, अपनी मांग को लेकर धरना देते हैं, प्रदर्शन करते हैं, पर कभी अराजकता की सीमा तक नहीं पहुंचते। अब तो ऐसा लगता है, मानो आंदोलन नहीं, युद्ध के मोर्चे में उतरे हैं।
प्रश्न है कि ऐसी स्थिति पैदा हुई क्यों? जब भी कोई आंदोलन हिंसक हो, उसमें अवांछित तत्वों की भूमिका की पुष्टि हो जाए, तो प्रशासन का दायित्व है कि बिना देर किए उसे कठोरता से नियंत्रित करे। नहीं तो, अराजक तत्व उसे उग्रवादी और हिंसक बनाने की कोशिश कर सकते हैं। कुछ लोग श्रीलंका से लेकर बांग्लादेश और नेपाल तक के उग्र हिंसक आंदोलनों की परिणतियों को मिसाल बनाने में लगे हैं। एक नेता का बयान भी था कि ‘हमसे गलती हो गई, ट्रैक्टर परेड के दिन ही हम संसद तक चले जाते और बांग्लादेश दोहरा देते।’ इस तरह की अतिवादी मानसिकता सामान्य मानी जाने लगी है, जिससे निहित स्वार्थी तत्वों को मौका मिल जाता है।
एक विचित्र पैटर्न देखने में आता है-पहले धरना शुरू होता है, फिर सड़क घेर ली जाती है और कुछ स्थायी निर्माण भी हो जाते हैं। अंततः दंगे की स्थिति बन जाती है। ऐसे में, शेष नागरिकों के अधिकारों का क्या? देश की राजधानी की नाकेबंदी और जनता में दहशत का माहौल बने, इससे पहले ही प्रशासनिक प्रयास क्यों नहीं होते? एक आंदोलन के वक्त तो पूरी दिल्ली हलकान हो गई थी, औद्योगिक क्षेत्रों के लिए कच्चे माल व सामग्रियों की आपूर्ति का संकट पैदा हो गया था, लोग त्राहि-त्राहि करते रहे, पर कार्रवाई नहीं हुई। भारत के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को केंद्र बनाकर अमेरिका से अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी का गठन किया, तो किसी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। यहां तक कि जंतर-मंतर पर पहले से धरने की अनुमति भी नहीं थी। दिल्ली पुलिस ने त्वरित अनुमति दी। आगे चलकर प्रशासनिक हल्केपन से अराजक, अवांछित तत्वों को भी इसकी आड़ में मौका मिल गया। आज लंबे समय से निष्क्रिय, छटपटाते लोगों के लिए भी इस बैनर के नाम पर एक माध्यम मिल गया है।
कानून व्यवस्था और देश में शांति व स्थिरता प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। समग्र रूप से विचार कर इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया, तो अराजक तत्वों का आंदोलनों में प्रवेश सामान्य हो जाएगा और फिर हिंसा को एक सीमा के बाद रोकना निहायत मुश्किल होगा।