'देवरियो! नादान पियो गियो फौज में...'
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संस्कृत साहित्य में एक श्लोक आता है, ‘सर्वप्रिये चारूतरम वसंते’। वसंत में सर्वत्र प्यार सौंदर्य का साम्राज्य। खेतों से आती भीनी-भीनी सुगंध, करवट लेता मस्ती भरा मौसम, हवा तक जैसे नशे में डूबी हुई हो। पीली-पीली सरसों के खेतों का मीलों दूर तक फैला अनंत सिलसिला। आम्र मंजरियों से लहकती-महकती मादक गंध, टेसू और पलाश, केसर और कचनार के खिलते पुष्प गुच्छ, उपवनों की पुष्प कलियों पर मंडराती भंवरों की गुंजित टोलियां, सघन कुंजों में लुका-छिपी करती कोयल की कुहुक चहुंदिशि उल्लास ही उल्लास, मधुरिमा और मादकता का सौंदर्य विशिष्ट मंदिर वातावरण, पुलकित मन और चंचल चेहरे। अद्भुत उमंग और ऊंचाइयों को छूता वासंती मौसम।
ऐसा अनोखा ऋतुराज वसंत, प्रकृति की अनुपम छटाओं के सम्पन्न खजाने से भारतभूमि के हिस्से में सर्वाधिक आया है। ऐसे ही मौसम को चर्मोत्कर्षता प्रदान करता है उल्लास और उमंग का प्यारा-प्यारा न्यारा-न्यारा होली का रंगीन उत्सव। जब निष्ठुर जाड़े की जकड़न से मौसम अंगड़ाई लेता है तो फागुन की आहट अनजाने ही हर मन के द्वारे दस्तक दे जाती है। जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे कहीं से स्वर-संगीत की सरिता के अनेक स्त्रोत फूट पड़ते हैं।
हवाओं के पंखों पर सवार गीत-गुंजन हृदय के आंगन आ मनवीणा के तारों को झंकृत करने लगता है। फागुन के ये बोल अनायास ही नर-नारी की जुबान पर यूं चढ़ बैठते हैं जैसे स्वर लहरी की सरिता उनके हृदय से उमड़ रही हो। ढोल और मृदंग, ढफ और झाल पर, जब सधे हुए हाथों की मस्ती भरी थाप पड़ती है तो वातावरण में स्वर और संगीत का एक झरना सा कल-कल बहने लगता है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फागुन और होली की यह मस्ती विविध रूपों और अनेक रंगों में साकार होती है। होली के इन गीतों को कहीं फाग तो कहीं फागुआ की संज्ञा दी गई है। आमतौर पर फाग टोलियों में गाया जाता है। ढफ और नगाड़े को केंद्र बनाकर आमने-सामने टोलियां संवाद शैली में इन गीतों के रंगा-रंग कारवां को आगे बढ़ाती है। छिटकी हुई मधुर चांदनी से शुरू हुआ यह राग-रंग सम्मेलन टोलियों के उल्लास और उमंग से देर रात गए तक यौवन के उधाम आवेग को रसभीना उत्कर्ष प्रदान करता रहता है।
हरियाणा की होली में ढफ और नगाड़ों से, बृज में मृदंग, झाल और पखावज से, बिहार में झांझ और झाल से, पूर्वी उत्तर प्रदेश में चंग और डमरू से गीतों को संगीत के पंखों पर बैठाया जाता है। नगाड़े की चोट पर मुख्य गवैया गीत का मुखड़ा उठाता है। एक-एक पंक्ति को फिर टोली के अन्य सदस्य बार-बार दोहराते हैं। प्रतिद्वंदी टोलियां गाते समय एक-दूसरे से बढ़ कर अद्भुत जोश उत्पन्न कर देती हैं।
आयोजन में अनेक इलाकों की नारियां भी बढ़-चढ़ कर भाग लेती हैं। अलग से उनके फाग तो निरंतर चलते ही रहते हैं। इन गीतों में प्यार की प्यास का रहस्यमय आमंत्रण किसके हृदय को आंदोलित नहीं कर देता। एक तरफ इन गीतों में प्रणय और विरह का कोमल चित्रण मिलता है तो दूसरी ओर वीर रस का बांका आख्यान भी। कहीं हास्य-व्यंग्य की मीठी चुटकियां होती हैं तो कहीं सामाजिक परिवेश के अछूते पहलुओं पर लोक कवि की नजर अपना अनूठा दृश्यविधान दर्शाती है।
फाग, फगुआ, रसिया, कबीरा, जोगीरा, चौताल, होरी और धमाल के रूप में गीत-संगीत का यह मनभावन प्रस्तुतिकरण विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परंपरा के साथ निर्वाहित किया जाता है। इसमें जहां पक्के रागों का समावेश होता है, वहीं सरल-सरस धुनों में तथा आजकल तो फिल्मी धुनों का प्रभाव ग्रहण किये हुए होली के गीत सुने जा सकते हैं। ‘देवरियो नादान, पियो गियो फौज में...’। जहां हरियाणा का लोकप्रिय फाग है, वहीं अब के लल्ला गोकुल में होरी खेलन अइयो... ब्रज प्रदेश का प्रमुख स्वर है। होली के गीतों में अन्य विषयों के अलावा श्री कृष्ण जीवन के अनेक प्रसंग प्रमुखता से गाए जाते हैं?
लंबा अरसा नहीं बीता है उन बातों को। अभी पांच-छह दशक पहले तक होली के उत्सव की अपनी अलग ही छटा हुआ करती थी। महीना पहले से ही जब ‘डांडे’ का आरोपण हो जाया करता था तो पूरा फागुन मास मस्ती का दूसरा नाम बन कर लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाता था।