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बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आएंगी

Ghulam Mustafa Khan गुलाम मुस्तफा खान
Updated Thu, 30 Apr 2020 08:03 AM IST
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ustad ghulam mustafa khan editorial on music ,baharen fir bhee aati hain baharen fir bhee aaengi
उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान, विख्यात गायक - फोटो : facebook

जिंदगी संगीत के सात सुरों की तरह है। एक भी सुर ऊंचा या नीचा लगा, तो बंदिश टूट जाती है। कुछ ऐसा ही हाल कोरोना के फैलाव के कारण हुआ है। कहने को सब कुछ है, फिर भी जैसे किसी चीज की कमी है। अरसे बाद शहरों की हवाओं में ताजगी है, लेकिन यह हवा सांसों में ताजगी का अहसास नहीं जगा पाती। गलियों में पसरा हुआ सन्नाटा किसी नकाबपोश कातिल जैसा लगता है। फिर भी इस दौर में कुछ नई बातें तो हो रही हैं। सांय-सांय करती हुई हवाओं में कुदरत की मिठास और रुमानियत फिर से महसूस की जा सकती है। दरिया का पानी फिर से अपना अक्स दिखाता हुआ बहने लगा है।


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अरसे बाद कोयल की कूक कानों में मिश्री घोल रही है। यह सब अनायास तो नहीं है। ये फिजा इंसान के लिए नई है। ये कुछ अंदेशे दे रही हैं और कुछ संदेशे भी। बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं खाली, बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आएंगी...। जो हमारे पास नहीं है उसका रोना रोने में हम इस कदर मशगूल हो जाते हैं कि जो है वह बेमोल और मिट्टी हो जाता है। जब मसरूफ थे, तब लगता था कि किसी तरह सुकून के कुछ पल चुरा लें। अब फुर्सत है, तो वक्त काटने को दौड़ रहा है। महीना भर बीतते-बीतते लोगों के सब्र का पैमाना छलकने को आ गया है।

और यह बेसबब भी नहीं। यही तो जिंदगी की खूबसूरती है। जिंदगी ठहर नहीं सकती। इसकी फितरत ही कुछ ऐसी है। तनिक गहरे जाकर अपनी जिंदगी से रूबरू होने का जज्बा तो दिखाइए,यकीनन यह अपने सवाल-जवाब से आपको लाजवाब कर देगी। ऐसे नाजुक पलों में इशारों की भाषा समझ में आती है। इन दिनों अकेले बैठकर संगीत के सुरों का जिंदगी की मात्राओं से मिलान करता हूं। इस कोशिश में अक्सर इंसानियत को चोट पहुंचाने वाले दर्द छलक उठते हैं। बार-बार उन्हें रफू करने की कोशिश करता हूं और कुछ रागों को मिलाकर एक मिली-जुली धुन छेड़ देता हूं।

मेलजोल इंसानियत के लिए बहुत जरूरी है। यह मुल्क में तहजीब और तरक्की के लिए बहुत जरूरी है। कोरोना काल में इन चीजों की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है। 'लॉकडाउन' शब्द सुनने में बहुत भारी लगता है, लेकिन इससे डरने के बजाय क्यों न कुछ दिन के लिए इसको हमसफर बना लिया जाए। लॉकडाउन का पालन करने से मेरा घर बचेगा, मेरा मोहल्ला बचेगा, मेरा शहर बचेगा और मेरा मुल्क बचेगा।जिंदगियां बचेंगी, तो मुल्क भी तरक्की करेगा। यह सबकी बेहतरी के लिए है। समय, इतिहास और प्रकृति से कोई जीत नहीं पाया है।

इस समय जो भी घट रहा है, शायद वह इन्हीं के माध्यम से नियंत्रित हो रहा है। जिंदगी से उम्मीदें बहुत होती हैं। लेकिन कल क्या होगा, यह भविष्य की रोशनी में दीये-सा टिमटिमा रहा है। दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक कोरोना वायरस की काट को लेकर अनुसंधान कर रहे हैं। एक दिन इस काम में कामयाबी भी जरूर मिलेगी। तब तक के लिए क्यों न सारे गिले-शिकवे स्थगित कर दिए जाएं। इस दौर में परेशान और मजबूर लोगों के मन को सुकून देने की कोशिश तो की ही जा सकती है।

यह सभी चीजों की तुलना में अधिक मूल्यवान है, लेकिन आजकल सबसे अधिक इसी चीज की कमी है। प्रकृति धरती से शुरू होती है और अंत में मन, बुद्धि तथा अहंकार पर जाकर पूर्ण होती है। स्वाभिमान की प्रकृति से, अभिमान की प्रकृति में जाना बहुत बड़ी इंसानी भूल है। कोरोना वायरस ने इन सब बातों पर सोचने का बहाना दिया है। सबको जिंदगी की तराजू में अपना-अपना वजूद आंकने की जरूरत है। (लेखक विख्यात गायक हैं।)

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