अमेरिकी चुनाव: पूर्वाग्रह के चश्मे से ट्रंप को समझना जटिल, 'राष्ट्र के सम्मान' ने फासीवादी नहीं उद्धारक बनाया
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पीछे मुड़कर देखें, तो उनका वह अंदाज अमेरिकी पौराणिक कथाओं की प्रमुख छवि की याद दिलाने वाला था। खून से लथपथ चेहरा, हवा में तनी हुई मुट्ठी, वह व्यक्ति, जिसने हत्यारे की गोली को चुनौती दी और मौत के कगार से उठकर नारा लगाया-लड़ो, लड़ो, लड़ो...। एक उम्मीदवार और एक सजायाफ्ता अपराधी के रूप में, लोगों को उकसाने वाले और एक बहिष्कृत व्यक्ति के रूप में, अपनी महत्वाकांक्षा में अकेले, लेकिन अपने मिशन पर लाखों लोगों के साथ डोनाल्ड ट्रंप हमेशा लड़ते ही रहे हैं। अमेरिकी चुनाव की रात वह उस मंच पर खड़े थे, जिसे इतिहास ने सिर्फ हार न मानने वालों के लिए बनाया है, ताकि वह उस नियति को हासिल कर सकें, जिसके बारे में उनका दावा था कि चार साल पहले उनसे छीन ली गई थी। वह लड़ते रहे, लड़ते रहे, लड़ते रहे और जीत गए। वह प्रगतिशीलों के फैलाए हुए भय के बावजूद जीते। 20 जनवरी, 2017 को जब डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तो उदारवादियों के काल्पनिक ब्रह्मांड में अमेरिकी सर्वनाश का औपचारिक शुभारंभ हो गया और वह व्यक्ति जिसने वाशिंगटन में सत्ता संभाली, वह असभ्य था, जिसे वे ऑरेंज मैन कहते थे, जो समृद्धि के सुनहरे टावर से उतरा था।
सत्ता के गलियारे से बाहर का वह व्यक्ति आदर्श भंग करने वाला था और अभिजात वर्ग के सांस्कृतिक चित्रण में एक पोर्नोग्राफर, जो बगैर किसी नैतिक बाधा के सत्ता का दुरुपयोग करने के लिए तैयार था और अपनी जीत में गरिमा नहीं, बल्कि शिकायत जाहिर करता था। उदारवादियों ने चेतावनी दी कि सबसे बुरे हालात के लिए तैयार रहें, क्योंकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता कम होने वाली है और संस्थाओं का पतन होने वाला है। ऐसा नहीं हुआ, लेकिन उनकी चेतावनियां कम नहीं हुईं।
ऐसा लग रहा था, मानो वामपंथियों के दयनीय और निर्दयी लोगों ने मिलकर इस बुराई को दूर भगाने के लिए हाथ मिला लिया हो, क्योंकि काल्पनिक कथाओं की प्रगतिशील प्रचुरता में ट्रंप ने राष्ट्र की सबसे बुरी प्रवृत्ति को मूर्त रूप दिया। उनकी राजनीति, आरोपों और शिकायतों का महाकाव्य, अमेरिका के विचार के खिलाफ एक साजिश के अलावा और कुछ नहीं था। सदी के इस राजनीतिक भूत को भगाने में अभियोक्ताओं ने प्रगतिशीलों से हाथ मिला लिया। दो बार महाभियोग का सामना करने वाले राष्ट्रपति गुंडागर्दी के 34 मामलों के लिए अपराधी बन गए। अमेरिका के महान दिखावटी मुकदमे में राजनीतिक रूप से प्रेरित अभियोजकों द्वारा ट्रंप की क्रमिक सजा को आसान बनाया गया, जिससे कोई खलनायक पैदा नहीं हुआ। मध्य अमेरिका के गरीब लोगों के लिए वह पीड़ित था। जाहिर है, प्रगतिशीलों द्वारा निर्मित भय कामयाब नहीं हो सका। न ही इसके खिलाफ कोई जाग्रत लहर पैदा कर सका।
ट्रंप का पहली बार राष्ट्रपति बनना उस उदारवादी मीडिया के लिए सबसे अच्छी बात थी, जिनके पाठकों की संख्या घटती जा रही थी। उसे नैतिक आघातों का सामना करने में सक्षम एक दुष्ट व्यक्ति की तलाश थी, जो राष्ट्रपति ट्रंप से बेहतर कोई नहीं था।
व्हाइट हाउस पर दोबारा दावेदारी के ट्रंप के अभियान को उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने फासीवाद बताया, मानो वह सांस्कृतिक रूप से एकध्रुवीय गणराज्य का वादा करने व नफरत फैलाने वाले व्यक्ति हों। ट्रंप का उदारवादी मीडिया चित्रण भी इससे अलग नहीं था: संपादकीय पृष्ठों की मौखिक यातना से उभरने वाला व्यक्ति एक 78 वर्षीय कल्पनाशील व्यक्ति है, जो स्वतंत्रता को रौंद रहा था। टिमोथी स्नाइडर जैसे इतिहासकारों ने उन्हें एक क्लासिक तानाशाह के सांचे में फिट करने के लिए पहले ही बौद्धिक रूपरेखा प्रदान कर दी थी।
ट्रंप के राष्ट्रपतित्व काल की शुरुआत में एक छोटी-सी किताब, ऑन टायरनी: ट्वेंटी लेसंस फ्रॉम ट्वेंटिएथ सेंचुरी में उन्होंने अमेरिका से कहा, 'हम उन यूरोपीय लोगों से ज्यादा समझदार नहीं हैं, जिन्होंने बीसवीं सदी में लोकतंत्र को फासीवाद, नाजीवाद या साम्यवाद के सामने झुकते देखा। हमारा एक फायदा यह है कि हम उनके अनुभवों से सीख सकते हैं। ऐसा करने का यह सही समय है।' ट्रंपवाद की ताकत को रोकना उदारवादी मीडिया का मिशन था, जिसने यह पूछने से इन्कार कर दिया कि इसे सांस्कृतिक आंदोलन में बदलने की अनुमति क्यों या कैसे दी गई। उदारवादी मीडिया ने जितना ट्रंप का अपमान किया, उतना अन्य किसी भी राजनेता का शायद कभी नहीं हुआ।
ट्रंप दरअसल, इसलिए जीते, क्योंकि उन्होंने अमेरिकी सपने की फिर से ब्रांडिंग की। एमएजीए (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) एक रूपक था। यह अमेरिकी राजनीति का एक विरोधाभास था कि पारंपरिक वामपंथियों और दक्षिणपंथियों द्वारा त्याग दिए गए, सपने से बाहर रहने वाले अमेरिकियों की आहों और दुखों को संगठित करने के लिए एक अरबपति की जरूरत पड़ी। एमएजीए आह्वान में, 'महान' को 'अमीर' के साथ अदला-बदला जा सकता था। विशेषाधिकार के शिखर से उतरा वह व्यक्ति जमीन पर एक आंदोलन के अग्रदूत के रूप में खड़ा था।
अंततः यह एक वर्ग युद्ध था। एक वर्ग के लिए ट्रंप एक रोगग्रस्त झूठा था, जिसकी महत्वाकांक्षा उसके झूठ से बड़ी थी। हिलेरी क्लिंटन की किताब में ट्रंप समर्थक केवल 'घृणित' थे; बाइडन के विक्षिप्त प्रकोप में वह 'कचरा' बन गए। ब्रेग्जिट के साथ शुरू हुआ नियंत्रण वापस लेने का आग्रह उनके जैसे लोगों के खिलाफ ट्रंप के गुस्से में चरम पर दिखता है। सिद्धांतवादी पहचान की राजनीति को आधार बनाकर कट्टरपंथी दुनिया में देशभक्त होना, नागरिक समाज की सांस्कृतिक भलाई के खिलाफ अपराध था। जॉर्ज फ्लॉयड के बाद अमेरिकी उदारवाद की नैतिक समरूपता में, राष्ट्रवाद एक दमनकारी, नस्लीय दृष्टिकोण था। राष्ट्र को क्षमाप्रार्थी होने के लिए मजबूर किया गया, और इसकी पूजा से नव-आदिवासीवाद को बढ़ावा ही मिल सकता था।
फिर भी अधिकांश अमेरिकियों का राष्ट्रवाद से एक भावनात्मक लगाव बना रहा। ट्रंप ने अनियंत्रित आप्रवासन और सांस्कृतिक युद्धों से खतरे में पड़े राष्ट्र को फिर से चर्चा में लाया। राष्ट्र के सम्मान ने उन्हें फासीवादी नहीं बनाया, बल्कि उद्धारक (मुक्तिदाता) बनाया। और चुनाव की रात, सत्ता के लिए इस सदी के सबसे भयंकर तर्क के विजेता