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अमेरिका में सत्ता परिवर्तन: रिपब्लिकन खेमे की जीत से सदमे और विस्मय की लहर, क्या दुनिया ट्रंप के लिए तैयार है?
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डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
‘शक्ति कोई साधन नहीं है, यह साध्य है। शक्ति का उद्देश्य शक्ति ही है।’ डोनाल्ड जे ट्रंप ने जॉर्ज ऑरवेल के अमर वाक्य को आत्मसात किया है और इसे अक्षरशः एवं भावना के स्तर पर मूर्त रूप दिया है। लगभग एक महीने बाद यानी 20 जनवरी को अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शपथ लेंगे। उनकी 1927 में बनी, 20 एकड़ में फैली 128 से अधिक कमरों वाली ‘मार-ए-लागो’ प्राचीन वस्तुओं से सजी हवेली, जिसके ऊपर 70 फुट ऊंचा अमेरिकी झंडा लहराता है, राजनीतिक तीर्थस्थल है।तीर्थयात्रियों में कीर स्टार्मर, वोलोदिमीर जेलेंस्की, जेवियर माइली और जस्टिन त्रूदो शामिल हैं, जबकि मेक्सिकन राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम जैसे अन्य लोग उन्हें फोन करते हैं। उनकी वापसी पर संदेह करने वाले मेटा के मार्क जुकरबर्ग और एपल के टिम कुक जैसे कॉरपोरेट दिग्गजों ने भी आकर उनका अभिवादन किया।
अमेजन के जेफ बेजोस अगले हफ्ते ट्रंप से मिलने वाले हैं। और सभी शपथ ग्रहण समारोह के लिए लाखों डॉलर का योगदान दे रहे हैं। उनके दर्शनार्थ आने वाले महानुभावों के मद्देनजर प्रयुक्त रूपकों में 18वीं और 19वीं शताब्दी के शाही दरबारों में देखी गई मुद्राएं शामिल हैं या फ्रांसिस फोर्ड कोपोला की द गॉडफादर फिल्म में छोटे डॉन द्वारा वफादारी दिखाने के लिए अंगूठी चूमने का सिनेमाई चित्रण।
ट्रंप खुद को न केवल कमांडर इन चीफ के रूप में देखते हैं, बल्कि मुख्य राजनयिक, मुख्य व्यापार वार्ताकार और भू-राजनीति और महत्वपूर्ण मुद्दों के मध्यस्थ के रूप में भी देखते हैं। ट्रंप के पास प्रोटोकॉल की बारीकियों के लिए समय नहीं है। उनकी घोषणाएं ट्रुथ सोशल पर स्ट्रीम करती हैं और एक्स (पूर्व ट्विटर) पर फिर से पोस्ट की जाती हैं। चीन पहले ही उनके निशाने पर है, जिसे 50 फीसदी से ज्यादा टैरिफ लगाने की धमकी दी गई है। हाल में, उन्होंने अवैध प्रवासन और ड्रग्स के मुद्दे पर मेक्सिको और कनाडा को धमकी दी है। उन्होंने ब्रिक्स देशों को चेतावनी दी है कि वे ‘शक्तिशाली अमेरिकी डॉलर को बदलने की कोशिश न करें अन्यथा उन पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया जाएगा।’ ट्रंप की वापसी ने अमेरिकी बाजारों को चुनाव के बाद की शानदार ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।
हालांकि, दुनिया भर में घबराहट है। वैश्विक स्तर पर रुपया सहित सभी मुद्राएं गिर रही हैं। ओसाका से लेकर मुंबई और न्यूयॉर्क तक के बाजारों में निवेशक 20 जनवरी के बाद के परिदृश्यों को समझने के लिए जूझ रहे हैं। सम्मेलनों में ट्रंप की अदृश्य मौजूदगी है और वैश्विक बैठकों, सरकारों और कंपनी सी-सूट्स में उनका नाम चर्चा में रहता है। हालांकि बाइडन प्रशासन अब भी सत्ता में है, लेकिन ट्रंप अपने नाम और काम की ताकत को पेश करने में लगे हैं। बस दो मनोनयन पर विचार कीजिए। मनोनीत विदेश मंत्री मार्को रुबियो जाने-माने कट्टर चीन विरोधी हैं और पैट्रियोटिक इन्वेस्टमेंट एक्ट के लेखक हैं, जिसका उद्देश्य अमेरिकी कर संहिता को चीन में निवेश को प्रोत्साहित करने से रोकना है।
रुबियो यह भी चाहते हैं कि अमेरिकी कंपनियां चीन से बाहर निकल जाएं। वाणिज्य सचिव पद के लिए चुने गए हॉवर्ड लुटनिक को सभी क्षेत्रों में उच्च टैरिफ के समर्थक के रूप में जाना जाता है। लक्ष्य के प्रति निष्ठा सर्वोपरि है। इरादा यह है कि बाहर से आने वाली सभी चीजों के मार्ग को कठिन बनाया जाए-खासतौर पर वस्तुओं और प्रवासियों को और केवल एफडीआई को अनुमति दी जाए। बड़े पैमाने पर व्यवधान पैदा करने का साधन है टैरिफ, इसके साथ ही एलन मस्क के नेतृत्व वाले प्रस्तावित सरकारी दक्षता विभाग द्वारा हल्के विनियमन और छोटी सरकार का वादा, और अमेरिका में निवेश के लिए कर छूट।
ट्रंप पहले से कहीं ज्यादा तैयार दिखते हैं। उनकी शक्ति अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आकार और ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ के वादे से उपजी है। ट्रंप अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फिर से संगठित करना चाहते हैं। 1970 के दशक के बाद अमेरिकी कंपनियों ने एक त्रिपक्षीय मॉडल विकसित किया, जहां उन्होंने उत्पाद डिजाइन किए, टेक्नोलॉजी का पेटेंट अपने पास रखा और विनिर्माण एवं श्रम आउटसोर्स किया। नीति पर नियंत्रण से निवेश, विनिर्माण नौकरियों, आय और विकास का निर्यात हुआ। इसने समाज में एक उच्च आय का क्षेत्र बनाया और अमेरिकी अर्थव्यवस्था से निवेश और रोजगार खत्म कर दिया, जिससे आम जनता आय और उपभोग के दायरे से बाहर हो गई। ट्रंप को इसका एहसास है कि उन्हें भारी बहुमत मिला है और वह अपने मतदाताओं की भावनाओं के प्रति संवेदनशील हैं।
अप्रवासियों के जबरन निर्वासन के खिलाफ तर्क
ट्रंपोनॉमिक्स, मूलतःअतीत के गौरव को बहाल करने और मौजूदा व्यवस्थाओं को खत्म करने का वादा है। हालांकि विशेषज्ञ उच्च टैरिफ दीवार और अप्रवासियों के जबरन निर्वासन के खिलाफ तर्क दे रहे हैं कि दोनों ही मुद्रास्फीति को बढ़ा सकते हैं, लेकिन ट्रंप दृढ़ हैं। ट्रंप की योजना चीन से आने वाले सामान और अन्य देशों द्वारा माल के उत्पादन के लिए आयात किए जाने वाले घटकों को लक्षित करने की है। इससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा-डॉलर के मजबूत होने से पैसे की लागत बढ़ सकती है, टैरिफ से इनपुट महंगे हो जाएंगे और अमेरिकी सामानों के लिए बाजार खोलने से स्थानीय उत्पादकों पर असर पड़ेगा।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था और सहयोगियों के साथ संबंधों को होने वाले संभावित नुकसान को कोई खास महत्व नहीं दिया जा रहा है। आशावादी लोग मानते हैं कि ट्रंप व्यापारी हैं और टैरिफ की धमकी बातचीत का एक साधन है। यह कुछ हद तक सच हो सकता है। लेकिन एक असमान दुनिया में-डॉलर सबसे बड़ी आरक्षित मुद्रा है और अमेरिका सबसे बड़ा आयातक है-जुड़ाव की शर्तें फिर से तय होंगी और समझौते करने होंगे।
ऐसा लगता है कि धमकियों का असर हो रहा है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड ने यूरोपीय संघ को अमेरिकी (हथियार और तरल प्राकृतिक गैस) खरीदने और ट्रंप के व्यापार युद्ध से बचने की सलाह दी। नाटो सदस्य, जो पहले अपने रक्षा खर्च को जीडीपी के दो प्रतिशत तक नहीं बढ़ाते थे, अब इसे तीन प्रतिशत तक बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं।