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नतीजे तय करेंगे दुनिया की दिशा: मध्यावधि चुनाव जंग की दिशा तय कर सकता है, ट्रंप का शेष कार्यकाल कैसा बीतेगा?

Tue, 03 Nov 2026 09:40 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Tue, 03 Nov 2026 09:40 AM IST
सार

जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं, तब अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में मतदान करना शुरू कर चुके हैं। इस चुनाव से न केवल यह तय होगा कि ट्रंप के कार्यकाल के शेष दो साल कैसे बीतेंगे, बल्कि यह उन दो युद्धों की दिशा भी तय कर सकता है, जिनका असर अमेरिका सहित पूरी दुनिया पर पड़ा है।

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US Midterm poll results will determine direction of world course of conflict and Trump remaining term
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव 2026। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिका के लाखों मतदाताओं ने मध्यावधि चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इन चुनावों के नतीजे न केवल ट्रंप प्रशासन के बाकी दो वर्षों की राजनीतिक दिशा करने वाले हैं, बल्कि दुनिया को प्रभावित कर रहे दो युद्धों के भविष्य पर भी असर डाल सकते हैं। वैश्विक समुदाय…व अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इस पर नजर रख रहे हैं कि अगर ट्रंप कांग्रेस या प्रतिनिधि सभा या दोनों पर अपना नियंत्रण खो देते हैं, तो अमेरिका के बाहर इसके क्या आर्थिक और सैन्य प्रभाव पड़ सकते हैं।

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विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी डेमोक्रेट्स, भले ही भारी जीत हासिल न कर सकें, लेकिन वे चुनाव में आगे रह सकते हैं। प्रतिनिधि सभा जीतने के मामले में उनका पलड़ा भारी है, पर सीनेट की कई कड़े मुकाबले वाली सीटों से यह तय हो सकता है कि कांग्रेस पर किसका नियंत्रण होगा। प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों के लिए मतदान हो रहे हैं। हालांकि, ट्रंप यूक्रेन के युद्ध पर कोई असर डालने में नाकाम रहे, लेकिन ईरान का युद्ध उनके प्रति लोगों के समर्थन को पलटने वाला सबसे बड़ा कारक बनकर उभरा है। चुनावों से पहले हुए सर्वे बताते हैं कि उनकी लोकप्रियता काफी घट गई है। ट्रंप की कूटनीति और बल प्रयोग पूरी तरह विफल रही हैं। उनकी विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है।
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मतदान से कुछ घंटे पहले उन्होंने कहा कि ईरान के साथ युद्ध ‘बहुत जल्द खत्म हो जाएगा’। उन्होंने चेतावनी दी कि या तो तेहरान कोई समझौता कर ले, वरना ‘हम इसे खुद ही खत्म कर देंगे’। लेकिन, ईरान काफी उत्साहित है। उसने घोषणा की कि होर्मुज की खाड़ी में दो और तेल टैंकरों को ‘बारूदी सुरंगों से निशाना’ बनाया गया है। साथ ही, चेतावनी दी कि अमेरिका के साथ कोई भी नया युद्ध पिछले संघर्ष की तुलना में लंबा खिंच सकता है, और अमेरिकी राष्ट्रपति तय नहीं करेंगे कि यह युद्ध कितने समय तक चलेगा।
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जहां तक यूक्रेन का सवाल है, अमेरिका में डीजल की ऊंची कीमतों को काबू में करने के लिए ट्रंप द्वारा रूस से डीजल की खरीद ने पुतिन की स्थिति को मजबूत किया है। इसी तरह, भारत पर ज्यादा से ज्यादा डीजल रिफाइन करने का दबाव डालने से ट्रंप प्रशासन की उस आलोचना की पोल भी खुल गई है, जिसमें कहा गया था कि रूस से तेल खरीदकर भारत, पुतिन के यूक्रेन युद्ध में ‘मदद’ कर रहा है।

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले हिस्से में दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं डगमगा गई हैं और अमेरिका ने अपने दोस्त और सहयोगी खो दिए हैं। अमेरिकी मतदाताओं की तरह, वे भी शायद मध्यावधि चुनावों के नतीजों का ही इंतजार कर रहे हैं। वेनेजुएला का तेल हथियाने के लिए वहां की सत्ता बदलने के लिए दबाव डालना चिंता का विषय बन गया है। इस्राइल में राजनीतिक गतिरोध भी ट्रंप के लिए एक निराशाजनक बात है।

हालांकि, पहले भी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति की पार्टी को अक्सर कांग्रेस की सीटें गंवानी पड़ती थीं। अगर ट्रंप चुनाव हार जाते हैं, तो उनका प्रशासन गतिरोध और कड़ी जांच के घेरे में आ जाएगा। यही नहीं, उन पर महाभियोग चलाने को लेकर एक लंबी विधायी लड़ाई छिड़ने का खतरा है। ट्रंप के विधायी एजेंडे पर असर पड़ेगा, जिससे टैक्स में कटौती और राहत की गुंजाइश सीमित हो जाएगी। डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाली कांग्रेस द्वारा पारित विधेयकों को रोकने के लिए ट्रंप संभवतः अपने राष्ट्रपति के वीटो अधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इससे सरकारी खर्च, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर गतिरोध पैदा हो सकता है। ट्रंप संभवतः आव्रजन, व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्रों में अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए एकतरफा कार्यकारी आदेशों, नियामक कदमों और प्रशासनिक उपायों पर अधिक निर्भर रहेंगे। विश्लेषकों का मानना है कि डेमोक्रेटिक पार्टी की ताकत बढ़ने से कड़े नियंत्रण या संस्थागत टकराव की चर्चा फिर से शुरू हो सकती है, जो अतीत की विभाजित सरकारों के दौरान देखे गए दबावों की याद दिलाती है। उनकी हार रिपब्लिकन पार्टी के भीतर तनाव को और गहरा कर सकती है। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ आंदोलन ट्रंप के बाद के अपने भविष्य की राह तलाश रहा है। पिछले 22 महीनों में, ट्रंप ने कूटनीति के हर उस क्षेत्र को अस्त-व्यस्त कर दिया है, जिससे अमेरिका जुड़ा है।

ट्रंप ने टैरिफ और व्यापार विवादों के मामले में अपने कार्यकारी अधिकारों का भरपूर इस्तेमाल किया है। भारत ने विपरीत परिस्थितियों में भी पूरी शालीनता के साथ इन झटकों को झेला है। चीन ने एक ताकतवर नेता की तरह खामोशी साधे रखी है। लेकिन, कनाडा और अन्य व्यापारिक साझेदारों के साथ टकराव बना हुआ है। अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स का दबदबा होने के बावजूद ट्रंप ने उन व्यापक कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल किया है, जो अमेरिकी राष्ट्रपति को हासिल हैं। चाहे वह चुनाव जीतें या हारें, यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। घरेलू विरोध, जांच-पड़ताल और विदेशी मामलों (जैसे ईरान के साथ तनाव या ऊर्जा/डीजल/टैरिफ नीतियां) को लेकर कांग्रेस की तीखी पूछताछ से परेशान होकर, ट्रंप अपने पारंपरिक सहयोगियों के खिलाफ बयानबाजी और तेज कर सकते हैं। साथ ही, वे उनसे बोझ साझा करने या एकतरफा रियायतें देने की मांग भी कर सकते हैं। देश के भीतर कमजोर होती स्थिति उन्हें विदेश में जल्दी और चर्चित ‘जीत’ हासिल करने के लिए प्रेरित कर सकती है, ताकि खबरों का रुख बदला जा सके। देश में कमजोर होने पर वह अमेरिका की आर्थिक और सैन्य ताकत का इस्तेमाल उन संघर्षों को प्रभावित करने के लिए शायद न कर पाएं, जिनमें वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं। खाड़ी क्षेत्र के कई संघर्षों और रूस-यूक्रेन युद्ध में यह दौर पहले ही शुरू हो चुका है।


अगर ट्रंप चुनाव हार जाते हैं, तो क्या वह फिर से ‘मामले को जनता के बीच ले जाने’ की कोशिश करेंगे? अमेरिकी अध्ययन की विशेषज्ञ लॉरिक हेनेटॉन ने फ्रांसीसी दैनिक ले मोंडे में लिखा है: ‘संभावना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति तीन नवंबर के मध्यावधि चुनावों को ‘चुरा’ नहीं पाएंगे। हालांकि, वह चुनाव की वैधता पर सवाल उठाने वाली बात को फिर से हवा देंगे, ताकि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव को बदले की लड़ाई में बदला जा सके।’ उनका निष्कर्ष है: ‘ट्रंप के पास मध्यावधि चुनावों में बाधा डालने के कई तरीके हैं, लेकिन हार को जीत में बदलने के साधन बहुत कम हैं।’

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